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खुशियों का विरोधाभास: आखिर वास्तविक खुशी है क्या? कटघरे में ऑक्सफोर्ड जैसे वैश्विक सूचकांकों की विश्वसनीयता...

Fri, 21 Mar 2025 04:44 AM IST
ज्योति भास्कर अमर उजाला, नई दिल्ली
अमर उजाला, नई दिल्ली Published by: ज्योति भास्कर Updated Fri, 21 Mar 2025 04:44 AM IST
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सार
ऑक्सफोर्ड यूनिवर्सिटी के खुशियों के मीटर में भारत को पाकिस्तान सहित युद्धग्रस्त यूक्रेन व फलस्तीन से भी ज्यादा दुखी बताया जाना इन वैश्विक सूचकांकों की विश्वसनीयता पर सवाल तो खड़े करता ही है, यह संशय भी पैदा करता है कि आखिर वास्तविक खुशी है क्या?
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Paradox of happiness What is real happiness Credibility of recent global indices like Oxford in dock
हैप्पीनेस इंडेक्स - फोटो : adobe stock

विस्तार

ऑक्सफोर्ड यूनिवर्सिटी के वेलबीइंग रिसर्च सेंटर की ओर से जारी विश्व खुशहाली सूचकांक-2025 की रिपोर्ट, जिसमें भारत को पाकिस्तान समेत युद्धग्रस्त यूक्रेन व फलस्तीन से भी ज्यादा अवसादग्रस्त व असंतुष्ट बताया गया है, ने एक बार फिर इस बहस को जन्म दिया है कि क्या इस तरह के वैश्विक सूचकांक वाकई तथ्यों पर आधारित होते हैं? इससे यह सवाल भी पैदा होता है कि वास्तविक खुशी और उसे मापने की कसौटी आखिर है क्या।


विश्व खुशहाली सूचकांक पर युद्धग्रस्त देशों का हाल
भले ही रैंकिंग में पिछले वर्ष की तुलना में भारत की स्थिति में सुधार आया हो, लेकिन आर्थिक दिवालिएपन और गृहयुद्ध जैसे हालात से जूझ रहे पाकिस्तान को अगर उससे ऊपर रखा गया है, तो स्वाभाविक रूप से संदेह तो उत्पन्न होगा ही। युद्धग्रस्त देशों की बात करें, तो इस्राइल आठवें, फलस्तीन 108 वें, रूस 66वें और यूक्रेन 111वें स्थान पर है, जबकि भारतीय बगैर किसी युद्ध या विनाश के भी दुखी हैं, ऐसा रिपोर्ट का कहना है।


चौंकाने वाली बात यह भी है कि...
बावजूद इसके कि वैश्विक अनिश्चितताओं के बीच भी विभिन्न अंतरराष्ट्रीय एजेंसियां भारत की विकास दर से उम्मीदें लगाए हुए हैं, खुशियों के मीटर में भारत का स्कोर चाड, बुर्किना फासो, बेनिन और सोमालिया जैसे देशों से थोड़ा ही ऊपर है। तो क्या यह माना जाना चाहिए कि इन देशों की तरह की अराजकता व संघर्ष ही वास्तविक खुशियों का मूल है और हमें इसका ही अनुसरण करना चाहिए? चौंकाने वाली बात यह भी है कि सकल खुशहाली सूचकांक का विचार देने वाला भूटान, जिसकी 2024 की रिपोर्ट में 79वीं रैंकिंग थी, इस वर्ष कोई रैंकिंग नहीं पा सका है।

आर्थिक संकट, महंगाई, राजनीतिक अस्थिरता और सामाजिक अशांति के बावजूद खुशहाली!
यही नहीं, मध्य अमेरिकी राष्ट्र बेलिज, जिसे दुनिया में सर्वाधिक हत्या दर वाले देशों में से एक माना जाता है, खुशियों के मीटर में अमेरिका से ठीक नीचे 25वें पायदान पर है। हैरान करने वाली बात है कि आखिर वहां के लोग इतने खुश क्यों हैं। रिपोर्ट की मानें, तो वर्षों से आर्थिक संकट, महंगाई, राजनीतिक अस्थिरता और सामाजिक अशांति से जूझ रहा वेनेजुएला भारत से ज्यादा खुशहाल है, तो क्या अराजकता और अस्थिरता ही अब वैश्विक खुशी के मापदंड बन चुके हैं?

क्या सूचकांकों का स्तर महज एक दिन की सनसनी...
अगर ऐसा है, तो पूरी सभ्यता की कसौटियों का क्या? हत्यारे को हत्या करने में, तो किसी को बदला लेने में, तो किसी और को परोपकार करने में खुशी मिल सकती है। खुशी के पैमाने सबके अलग-अलग हो सकते हैं, लेकिन उन पैमानों को सामान्य बताकर ऐसा संशय पैदा करना कि लोग जान ही न सकें कि वास्तविक खुशी क्या है, कहां तक उचित है? जो सूचकांक ऐसा करते हैं, उनका स्तर महज एक दिन की सनसनी तक सीमित रह जाए, तो हैरत नहीं!
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