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महामारी: अराजक नीतियों में फंसे कोविड काल के यात्री

Wed, 22 Sep 2021 06:14 AM IST
Shankar Ayair शंकर अय्यर
Updated Wed, 22 Sep 2021 06:14 AM IST
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सार
दुनिया भर में फैली अराजकता विश्व स्वास्थ्य संगठन की बुजदिली को दर्शाती है, खासकर टीकाकरण, परीक्षण मानकों और यात्रा प्रोटोकॉल के संबंध में। विभिन्न देशों की जबरन यात्रा केवल वायरस के दायरे को बढ़ा सकती है।
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Pandemic: Travelers of the Covid period trapped in chaotic policies
प्रतीकात्मक तस्वीर - फोटो : पीटीआई

विस्तार

यूनानी गणितज्ञ आर्कमिडीज के हवाले से अक्सर एक पुरानी कहावत कही जाती है कि दो बिंदुओं के बीच की न्यूनतम दूरी दोनों के बीच सरल रेखा खींचकर हासिल की जा सकती है। जहां तक कोविड-19 के काल में यात्रा की बात है, तो विभिन्न देशों द्वारा इसे उलट दिया जा रहा है! सनकी नीतियों से पैदा अराजकता ने यात्रियों को उनके गंतव्य तक पहुंचने के लिए दुनिया के उन हिस्सों से होकर जाने को मजबूर किया है, जहां शायद वे नहीं जाना चाहते, और यह सब उनके पूर्ण टीकाकरण और आरटी-पीसीआर की जांच रिपोर्ट रखने के बावजूद हो रहा है।  



उत्तर भारत के छात्रों को इस्तांबुल और एथेंस होकर दिल्ली से मालदीव और फिर टोरंटो की यात्रा करने के लिए ज्यादा भुगतान करने, घुमावदार मार्ग अपनाने और सफर की परेशानी झेलने के लिए मजबूर किया गया। पिछले महीने मुंबई से टोरंटो जाने वालों को मुंबई से दोहा, फिर वहां से काहिरा, फिर फ्रैंकफर्ट और फिर टोरंटो की यात्रा करने के लिए मजबूर किया गया था। हाल तक अमेरिका के लिए सबसे पसंदीदा मार्ग मैक्सिको में 14 दिन के पड़ाव वाला था। 


इस हफ्ते अमेरिका और कनाडा के लिए पसंदीदा मार्ग दुबई से होकर है। जाहिर है, यह यात्रा प्रोटोकॉल मनमाना है और कम से कम इसकी पुष्टि पूर्वाग्रह ग्रस्त है। यह रचनात्मक और जड़ नौकरशाही का परिणाम है, जो विकृत राजनीति के इशारे पर नाचती है। देशों को दूसरे देशों के लोगों को प्रवेश की अनुमति देने या मना करने का अधिकार है। समान रूप से एक नियम आधारित दुनिया में, इस दृढ़ संकल्प को विज्ञान से अलग नहीं किया जा सकता और यह वैश्विक सहयोग के प्रति निष्ठा का वादा करता है।

लगभग हर देश ने महामारी से लड़ने के लिए टीकाकरण की भूमिका का समर्थन किया है। सैद्धांतिक रूप से, टीकाकरण और आरटी-पीसीआर परीक्षण यात्रियों को जरूर कराना चाहिए। वास्तव में, दोहरे टीकाकरण को देशों के भीतर काम और यात्रा के लिए पर्याप्त माना जाता है। हालांकि भू-राजनीतिक प्रतिक्रियाओं को परिभाषित करने वाली रूपरेखा एक अलग कहानी कहती है। इस मामले की वास्तविक स्थिति 'स्वतंत्रता की भूमि और बहादुरों के देश' में प्रवेश के नियमों से स्पष्ट होती है। 

विगत चार मई से, भारतीय और 32 अन्य देशों के लोग तब तक अमेरिका में प्रवेश नहीं कर सकते, जब तक कि वे यह प्रमाण नहीं दिखाते कि वे 14 दिनों से अधिक समय से भौगोलिक क्षेत्रों से बाहर हैं, भले ही वे पूरी तरह से टीकाकरण करवा चुके हों और परीक्षण आवश्यकताओं का पालन करते हों। जो बात इस नीति के प्रति जिज्ञासा जगाती है, वह है आंकड़ों द्वारा व्यक्त कहानी।

पिछले हफ्ते अमेरिका नए दैनिक मामलों, नई मौतों और सक्रिय मामलों की सूची में शीर्ष पर था। 17 सितंबर को न्यूयॉर्क टाइम्स ट्रैकर ने बताया कि अमेरिका में 1,65,465 नए मामले दर्ज किए गए और 1,992 मौतें हुईं, और सात दिन के औसत मामलों की संख्या 1,48,202 थी। यह बताता है कि वहां मामलों की संख्या भारत से पांच गुना है और संभवतः सूची के अन्य 32 देशों की तुलना में बहुत ज्यादा। इस हफ्ते अमेरिका ने भारत से नवंबर में उड़ानें शुरू करने की घोषणा की है!

अमेरिका अकेला देश नहीं है। अड़ेंगे लगाने वाला यह वायरस हर जगह की नीतियों को प्रभावित करता है। कनाडा में बहुत ज्यादा प्रवासी भारतीय और हजारों छात्र रहते हैं। सीधी उड़ान पर प्रतिबंध ने कई लोगों की यात्रा रोक दी है या कई लोग कई देशों की घुमावदार यात्रा के लिए मजबूर हुए हैं। हाल ही में जारी एक यात्रा दिशा-निर्देश में, कनाडा उन भारतीयों को अनुमति देने के लिए सहमत हुआ, जिन्हें अपने देश में दो टीका लगाया गया है, और यदि वे किसी तीसरे देश में आरटी-पीसीआर जांच करवाते हैं। तीसरे देश में क्यों? 

क्या इसके पीछे परीक्षण मानक के प्रति अविश्वास निहित है? सोमवार को कनाडा ने दिल्ली से सीधी उड़ानों की अनुमति दी, लेकिन जोर देकर कहा कि वह केवल एक प्रयोगशाला से आरटी-पीसीआर परीक्षण के परिणाम स्वीकार करेगा। सिर्फ एक प्रयोगशाला ही क्यों और केवल एक शहर से सीधी उड़ान क्यों? दूसरे शहरों से कनेक्टिंग फ्लाइट पकड़ने वालों का क्या होगा? यह भारत में परीक्षण के प्रति एक अघोषित अविश्वास है और संस्थागत भेदभाव की सीमा है।

विश्वास की कमी टीकों की मान्यता को भी प्रभावित करती है। कोविशील्ड, जो लगभग 70 करोड़ भारतीयों को लगाया जा चुका है, यूरोपीय दवा एजेंसी और 15 यूरोपीय देशों में मान्यता प्राप्त है। भले ही यह टीका ऑक्सफोर्ड एस्ट्राजेनेका पर आधारित है, लेकिन इसे ब्रिटेन में मान्यता के लिए संघर्ष करना पड़ा। भारत इन मुद्दों को उठा रहा है, पर परिणामों को प्राप्त करने के लिए इसे अपनी स्थिति का और अधिक लाभ उठाने की आवश्यकता है।

दुनिया भर में फैली अराजकता विश्व स्वास्थ्य संगठन (डब्ल्यूएचओ) की बुजदिली को दर्शाती है, खासकर टीकाकरण, परीक्षण मानकों और यात्रा प्रोटोकॉल के संबंध में। विभिन्न देशों की जबरन यात्रा केवल वायरस के दायरे को बढ़ा सकती है। महामारी से संबंधित मामले पर अक्सर सरकारें दुख के साथ कहती हैं कि अन्यवाद का अभ्यास किया जा रहा है। कार्रवाई के लिए डब्ल्यूएचओ प्रतीक्षा असंभव की प्रतीक्षा जैसा है।

डेल्टा संस्करण के बरपाए कहर के मुताबिक महामारी अभी बनी रहेगी। दुनिया की अधिकांश आबादी को अभी टीका लगाया जाना बाकी है, जबकि वायरस म्यूटेशन हो रहे हैं। इसकी सामाजिक-राजनीतिक कीमत चुकानी पड़ती है। शासन की अस्थिरता का खतरा है और फिर आर्थिक कीमत है, जिसे दुनिया आय एवं नौकरियों के नुकसान के रूप में चुका रही है। मुक्त मुद्रा वाले देशों की अपनी सीमाएं हैं और विकास को लेकर घबराहट सभी बाजारों में है, यहां तक कि जी-7 के देश भी बर्दाश्त नहीं कर सकते। 

वैश्विक जीडीपी का करीब दो तिहाई हिस्सा सेवा क्षेत्र है और फेस टू फेस इकनॉमी में हर क्षेत्र-शिक्षा, आतिथ्य, यात्रा सब कुछ आशा और निराशा के बीच फंसा हुआ है। टीकाकरण के लिए वैश्विक वित्त पोषित कार्यक्रम और आर्थिक जुड़ाव के लिए सार्वभौमिक रूप से स्वीकृत एक प्रोटोकॉल के बिना, वैश्विक अर्थव्यवस्था केवल एक लहर से दूसरी लहर में ही फंसेगी। नेताओं द्वारा 'हम सब इसमें साथ हैं' दोहराना पर्याप्त नहीं है। वैश्विक नेताओं को एक साथ आने, भेदभावपूर्ण प्रोटोकॉल को समाप्त करने और अगली सामान्य स्थिति का मार्ग प्रशस्त करने की आवश्यकता है।

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