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आखिर पाकिस्तान किसके साथ है: पड़ोसी का दोहरा चरित्र... मुनीर अमेरिकी मेहमान बन ईरान के खिलाफ योजना बनाते दिखे
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आसिम मुनीर और डोनाल्ड ट्रंप
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अमर उजाला प्रिंट
विस्तार
ईरान-इस्राइल युद्ध के हालिया घटनाक्रम ने स्पष्ट कर दिया है कि पाकिस्तान इस्लामी ईरान के खिलाफ यहूदी राष्ट्र इस्राइल का अप्रत्यक्ष रूप से साथ देगा। भारत के विभाजन पश्चात पाकिस्तान के जन्म लेने के बाद दावा किया गया था कि वह शरीयत प्रदत्त गणतंत्र के रूप में मुसलमानों की सांस्कृतिक, मजहबी और संवेदनशीलता का प्रतिनिधित्व करेगा। क्या ऐसा है? भारतीय उपमहाद्वीप में 55 करोड़ से अधिक मुसलमान बसते हैं। इस पृष्ठभूमि में विश्व के इस भूखंड में कितने मुसलमान इस्राइल का साथ देना और कितने इस्राइल-अमेरिका के हाथों ईरान को बर्बाद होते देखना पसंद करेंगे? आखिर पाकिस्तान किसका प्रतिनिधित्व कर रहा है— इस्लाम या फिर औपनिवेशिक शक्तियों का?
जब इस्राइल ने ईरान के सर्वोच्च नेता आयतुल्लाह अली खामेनेई को मौत के घाट उतारने की धमकी दी, तब अमेरिका ने इसका मौन समर्थन करते हुए ईरान पर ‘बिना शर्त आत्मसमर्पण’ का दबाव बढ़ा दिया। इसी कालखंड में 18 जून को पाकिस्तान के ‘वास्तविक सत्ता-नियंता’ सेना प्रमुख आसिम मुनीर वाशिंगटन में अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के साथ भोजन की मेज पर ईरान के खिलाफ आगे की कार्ययोजना तैयार कर रहे थे। ऐसा लगता है कि ईरान के खिलाफ अमेरिका पाकिस्तान से सटी ईरान की लगभग एक हजार किलोमीटर लंबी सीमा का उपयोग किसी लॉन्चपैड के रूप में कर सकता है। वस्तुतः पाकिस्तान का यह दोहरा चरित्र उसकी बुनियाद में ही अंतर्निहित है। यह न तो किसी ऐतिहासिक अपरिहार्यता का प्रतिफल है, न ही किसी सांस्कृतिक निरंतरता और भूगोलजन्य आवश्यकता का परिणाम। यह एक विशुद्ध कृत्रिम राष्ट्र है, जिसका निर्माण ब्रितानियों ने मुस्लिम समाज में एक बड़े वर्ग, जोकि ‘काफिर-कुफ्र’ अवधारणा से उद्वेलित था— उनके और वामपंथियों के सहयोग से किया था। परंतु यह भी अकाट्य सच है कि पाकिस्तान का निर्माण ब्रिटिश साम्राज्य की दूरगामी भू-राजनीतिक रणनीति का हिस्सा भी था।
प्रख्यात राजनयिक नरेंद्र सिंह सरीला द्वारा रचित 'विभाजन की असली कहानी' के अनुसार, अंग्रेजों ने पश्चिम एशिया और सोवियत संघ में अपनी सामरिक स्थिति को सुदृढ़ बनाए रखने के उद्देश्य से भारत का विभाजन कर पाकिस्तान का सृजन किया था। यह कोई औचक निर्णय नहीं था, अपितु एक लंबी योजना के अंतर्गत था। अंग्रेज अधिकारी सर जॉन स्ट्रेची (जो 1874–76 के बीच नॉर्थ-वेस्टर्न प्रोविंसेस के लेफ्टिनेंट-गवर्नर रहे थे, जिनके नाम पर एएमयू में स्ट्रेची हॉल भी है) ने 1894 में कहा था : '...मुसलमानों के उच्चवर्ग ब्रिटिश शासन के लिए शक्ति का स्रोत हैं, कमजोरी का नहीं। वे जनसंख्या का एक छोटा, लेकिन ऊर्जावान हिस्सा हैं, जिनके राजनीतिक हित ब्रिटिश हितों से मेल खाते हैं...।' क्या इस विचार को वर्तमान परिप्रेक्ष्य से जोड़कर देखा जा सकता है?
बदलते समय के साथ ब्रिटेन औपनिवेशिक का स्थान काफी हद तक अमेरिका और वामपंथ शासित चीन ने ले लिया है, जो उसका अपने-अपने भू-राजनैतिक हितों (बढ़ते भारत का विरोध सहित) के एक मोहरे की तरह प्रयोग करते हैं। जिस भूक्षेत्र को आज पाकिस्तान कहते हैं, वह दुनिया के उस संवेदनशील भू-भागों में से एक पर स्थित है, जिसकी सीमाएं पांच प्रमुख सभ्यतागत क्षेत्रों— भारत, चीन, पश्चिम एशिया, फारस और अरब से मिलती हैं। इसलिए चाहे पाकिस्तान की आंतरिक स्थिति कितनी भी चरमराई हुई हो या आतंकवाद का बड़ा केंद्र ही क्यों न हो, वह वैश्विक महाशक्तियों का चाहते या न चाहते हुए भी निकटवर्ती बना रहेगा। यही कारण है कि 1950 के दशक से पाकिस्तान शीतयुद्धकालीन सैन्य गठबंधनों—‘सीटो’ और ‘सेंटो’ का सदस्य रहा।
1970 के दशक में पाकिस्तान के प्रत्यक्ष-परोक्ष समर्थन से अमेरिका ने चीन के साथ कूटनीतिक संबंधों को नया आयाम दिया। 1971 में भारत के खिलाफ युद्ध में अमेरिका ने पाकिस्तान का साथ दिया। 1979-89 के बीच अफगानिस्तान से सोवियत संघ को खदेड़ने के लिए अमेरिकी सहयोग से पाकिस्तान, तालिबान की पौधशाला बना। वर्ष 2001 में न्यूयॉर्क के भयावह 9/11 आतंकवादी हमले से पाकिस्तान, अमेरिका के लिए और भी अधिक अपरिहार्य बन गया। अमेरिका द्वारा पाकिस्तान से फिर निकटता बढ़ाने का उद्देश्य उसे चीन की छत्रछाया से निकालना भी है। ईरान-इस्राइल संघर्ष ने तथाकथित इस्लामी एकता के प्रतीक ‘उम्माह’ के खोखलेपन को भी उजागर कर दिया है। एक ओर पाकिस्तान अमेरिका के साथ मिलकर ईरान को ठिकाने लगाने के लिए कमर कस रहा है, वहीं सऊदी, कतर, यूएई जैसे प्रभावशाली मुस्लिम देश या तो चुप हैं, या अपने-अपने राष्ट्रहितों की गणना में उलझे हुए हैं। यानी 55 से अधिक इस्लामी देश होते हुए भी ईरान अलग-थलग है। आखिर इसका कारण क्या है?
शिया मुस्लिम बहुल ईरान के इस संकट को जानने के लिए इतिहास में झांकना होगा। वर्ष 632 में पैगंबर साहब की मृत्यु उपरांत इस्लाम के प्रारंभिक प्रचार-प्रसार का दायित्व चार रशीदुन खलीफाओं ने संभाला। इसमें चौथे खलीफा हजरत अली, जोकि पैगंबर साहब के दामाद भी थे— उनकी और उनके दोनों बेटों— हजरत हसन और हजरत हुसैन की अलग-अलग घटनाओं में मजहबी कारणों से हत्या कर दी गई थी। उन्हें मारने वाले कोई हिंदू, सिख, ईसाई नहीं, अपितु मुस्लिम ही थे। यहीं से विश्व में शिया-सुन्नी मुस्लिम टकराव का सूत्रपात हुआ, जो अब भी जारी है। वैश्विक मुस्लिम आबादी में लगभग 90 फीसदी सुन्नी और 10 फीसदी शिया हैं। एक रिपोर्ट के अनुसार, वर्ष 2001–2018 के बीच पाकिस्तान में 4,800 से अधिक शिया मुस्लिमों को इस्लाम के नाम पर सुन्नी मुसलमानों द्वारा मौत के घाट उतार दिया गया था। गत वर्ष नवंबर में ही खैबर पख्तूनख्वा स्थित शिया-सुन्नी झड़प में 130 से अधिक लोगों की जान चली गई थी। ईरान 16वीं-17वीं शताब्दी से शिया मुस्लिम का प्रतिनिधित्व कर रहा है, वहीं पाकिस्तान सहित अधिकांश इस्लामी राष्ट्र (संपन्न सहित) सुन्नी बहुल मुस्लिम देश हैं। क्या इस पृष्ठभूमि में इतिहास फिर दोहराया जाएगा? क्या ईरान की नियति भी हजरत अली और उनके बेटों जैसी होगी?
पाकिस्तान के अबतक के आचरण से स्पष्ट है कि उसका इस्लाम या उम्माह से वास्तविक सरोकार नहीं है। वह सेना, अभिजात वर्ग और सामंती शक्तियों का गठजोड़ है, जो इस्लाम के नाम पर जनमानस का भावनात्मक शोषण करता है। उसके सत्ता-अधिष्ठान के दो ही उद्देश्य हैं। पहला, भारतीय उपमहाद्वीप में इस्लाम पूर्व सनातन संस्कृति से घृणा और भारत को शत्रु मानकर उसे कैसे भी नष्ट करना। दूसरा, साम्राज्यवादी शक्तियों का हस्तक बनकर उनके उद्देश्यों की पूर्ति हेतु कुछ भी करने को तत्पर रहना। क्या पाकिस्तान इस दोहरे झंझावात से बाहर निकल पाएगा?