{"_id":"64d0304dbf6721ccaf0f54d4","slug":"pakistan-must-first-change-its-attitude-to-talk-to-india-shahbaz-sharif-2023-08-07","type":"story","status":"publish","title_hn":"दो टूक: शांति की पेशकश की वजह पाकिस्तान का विफल आर्थिक और सुरक्षा परिदृश्य; पहले बदले अपना रवैया","category":{"title":"Opinion","title_hn":"विचार","slug":"opinion"}}
दो टूक: शांति की पेशकश की वजह पाकिस्तान का विफल आर्थिक और सुरक्षा परिदृश्य; पहले बदले अपना रवैया
विज्ञापन
निरंतर एक्सेस के लिए सब्सक्राइब करें
सार
आगे पढ़ने के लिए लॉगिन या रजिस्टर करें
अमर उजाला प्रीमियम लेख सिर्फ रजिस्टर्ड पाठकों के लिए ही उपलब्ध हैं
अमर उजाला प्रीमियम लेख सिर्फ सब्सक्राइब्ड पाठकों के लिए ही उपलब्ध हैं
फ्री ई-पेपर
सभी विशेष आलेख
सीमित विज्ञापन
सब्सक्राइब करें
पीएम नरेंद्र मोदी और शहबाज शरीफ
- फोटो :
अमर उजाला
विस्तार
पिछले हफ्ते इस्लामाबाद में पाकिस्तान के प्रधानमंत्री शहबाज शरीफ ने कहा कि 'पाकिस्तान भारत के साथ वार्ता के लिए तैयार है, बशर्ते कि पड़ोसी देश महत्वपूर्ण मुद्दों पर गंभीर बातचीत के लिए तैयार हो, क्योंकि युद्ध अब कोई विकल्प नहीं है।' उन्होंने आगे कहा कि 'यह भी उतना ही जरूरी है कि हमारा पड़ोसी यह समझे कि जब तक शंकाएं दूर नहीं होतीं, तब तक हम सामान्य पड़ोसी नहीं बन सकते।' इस साल यह दूसरी बार है, जब पाकिस्तान के प्रधानमंत्री शहबाज शरीफ ने बातचीत की पेशकश की है। इससे पहले विगत जनवरी में उन्होंने दुबई स्थित समाचार चैनल अल अरबिया को दिए इंटरव्यू में ऐसी ही बात कही थी।
भारतीय प्रवक्ता अरिंदम बागची ने इस पर प्रतिक्रिया देते हुए कहा, 'दोनों देशों के बीच किसी भी तरह के जुड़ाव के लिए आतंक और शत्रुता मुक्त माहौल अनिवार्य है।' पाकिस्तान को लेकर भारत का हमेशा यही रुख रहा है कि 'आतंकवाद और बातचीत' साथ-साथ संभव नहीं है। शंघाई सहयोग संगठन के विभिन्न सत्रों में पाकिस्तान ने भारत पर कूटनीतिक लाभ के लिए आतंकवाद को हथियार बनाने का आरोप लगाया है। दूसरी तरफ भारत ने हर वैश्विक मंच और द्विपक्षीय वार्ता में सीमापार आतंकवाद का मुद्दा उठाया है।
अमेरिकी विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता मैथ्यू मिलर से जब शहबाज शरीफ के बयान पर प्रतिक्रिया पूछी गई, तो उन्होंने कहा कि हम विभिन्न मुद्दों पर भारत और पाकिस्तान के बीच सीधी बातचीत का समर्थन करते हैं। लंबे समय से हमारा यही रुख है। कुछ पाकिस्तानियों ने इससे यह मतलब निकाला कि अमेरिका उनका समर्थन करता है, जबकि अमेरिका ने केवल यह स्पष्ट किया कि वह भारत-पाकिस्तान के सभी मुद्दों को द्विपक्षीय मानता है।
फरवरी, 2021 में संघर्ष विराम पर हुई सहमति के बाद से नियंत्रण रेखा पर शांति है। हालांकि न्यूनतम स्तर पर घुसपैठ की कोशिशें जारी हैं। जबकि पाकिस्तान के ड्रग्स-आतंकवाद के प्रयास आंशिक रूप से सफल हो रहे हैं। आतंकी गुटों में शामिल होने वालों की संख्या में भी कमी आई है। रिपोर्टों के मुताबिक, इस वर्ष मात्र सात युवक आतंकी गुटों में शामिल हुए, जिनमें से पांच को पहले ही खत्म कर दिया गया है। ऐसे में हताश होकर पाकिस्तान खालिस्तान का हौवा खड़ा करने की कोशिश कर रहा है, जिसके पीछे पंजाब को अस्थिर करने की साजिश है।
उसके ड्रोन पंजाब में नशीले पदार्थ एवं हथियार गिरा रहे हैं, और वह दुनिया भर में खालिस्तानी आंदोलन का समर्थन कर रहा है। भारत के लिए यह एक और खतरा है। पाकिस्तान की मौजूदा सरकार का कार्यकाल नौ अगस्त को खत्म हो रहा है और उसके बाद कार्यकारी प्रधानमंत्री कार्यभार संभालेंगे। कार्यकारी प्रधानमंत्री के पास कोई भी बड़ी वैश्विक वार्ता करने की शक्ति नहीं होगी। इधर भारत में भी अगले वर्ष की शुरुआत में लोकसभा के चुनाव होंगे। ऐसे में दोनों देशों में जब तक नई सरकार नहीं बन जाती, तब तक बातचीत की कोई संभावना नहीं है। लिहाजा सवाल उठता है कि पाकिस्तान के प्रधानमंत्री बार-बार इस मुद्दे को क्यों उठा रहे हैं। यह एक चुनावी हथकंडा हो सकता है, जिसका मतलब यह है कि सत्तारूढ़ पाकिस्तान सरकार आगामी चुनावों में भारत के साथ रिश्तों को सुलझाने के वादे पर वोट मांगेगी। एक दूसरा तर्क यह है कि शहबाज पाकिस्तान की आगामी सरकार के लिए एक रुख तय कर रहे हैं।
यह सच है कि शांति की पेशकश की एक वजह पाकिस्तान का विफल आर्थिक और सुरक्षा परिदृश्य है। अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष के राहत पैकेज के बावजूद वह पुराने ऋणों को चुकाने के लिए कर्ज लेने के दुश्चक्र में फंसा हुआ है। धन जुटाने के लिए वह अपनी राष्ट्रीय संपत्तियों-हवाई अड्डों एवं बंदरगाहों को बेचना चाहता है। निकट भविष्य में इस परिदृश्य में बदलाव की संभावना नहीं है। लेकिन भारत के साथ व्यापार से उसे बहुत लाभ हो सकता है।
पाकिस्तान बिगड़ते सुरक्षा परिदृश्य का भी सामना कर रहा है। तहरीक-ए तालिबान पाकिस्तान (टीटीपी) और इस्लामिक स्टेट खोरासान प्रांत के साथ बलूच स्वतंत्रता सेनानी पाकिस्तान की पश्चिमी सीमा पर सक्रिय हैं। आए दिन पाक चौकियों पर हमले और आत्मघाती विस्फोटों से पाकिस्तान की अखंडता को खतरा पैदा हो रहा है। वहां की सेना स्थिति पर नियंत्रण पाने में असमर्थ है, क्योंकि अफगानिस्तान की तालिबान सरकार को हक्कानी गुट समर्थन दे रहा है। तालिबान ने डूरंड रेखा को मानने से इन्कार कर दिया है। इसलिए वह पश्चिमी सीमा का समाधान करते हुए भारत के साथ शांति चाहता है।
एक अन्य कारण यह हो सकता कि पाकिस्तान ने बदलते वैश्विक रुख को भांप लिया हो। चीन का करीबी होने के कारण पश्चिम उसे संदेह की नजर से देखता है। पाकिस्तान यह जानता है कि वह चीन को छोड़ नहीं सकता, क्योंकि ज्यादातर कर्ज उसने चीन से ही लिया है। उसे यह भी पता है कि चीन को चुनौती देने के लिए पश्चिम को भारत की जरूरत है, इसलिए भारत का समर्थन पाने के लिए पश्चिम उसे छोड़ देगा। अभी भारत उभरता हुआ वैश्विक सितारा है। हर वैश्विक नेता भारत का सहयोग और समर्थन चाहता है। इसके अलावा, भारत की अर्थव्यवस्था पाकिस्तान से दस गुना ज्यादा है। पाकिस्तान को हाशिये पर रखने का सबसे अच्छा तरीका उसकी अनदेखी करना और पाक कब्जे वाली कश्मीर एवं गिलगिट-बाल्टिस्तान को फिर से हासिल करने की धमकी देना है।
भारतीय राजनेता इन दिनों यही कर रहे हैं। भारत तो पाकिस्तान की अनदेखी कर सकता है, लेकिन पाकिस्तान भारत की अनदेखी नहीं कर सकता। शहबाज शरीफ द्वारा जम्मू-कश्मीर में अनुच्छेद 370 की बहाली का जिक्र न करना उसके रुख में बदलाव का संकेत है। अब तक पाकिस्तान इसी बात पर जोर देता रहा है कि अनुच्छेद 370 की बहाली के बाद ही बातचीत हो सकती है। यदि शहबाज अपने इरादे के प्रति गंभीर थे, तो उन्हें व्यापारिक समुदाय की सलाह मानकर भारत के साथ व्यापार शुरू करना चाहिए था और फिर से उच्चायुक्तों की नियुक्ति करनी चाहिए थी। भारत-पाक व्यापार में काफी संभावनाएं हैं और इससे भारत की तुलना में पाकिस्तान को ही ज्यादा फायदा होगा। यदि पाकिस्तान गंभीर है, तो उसे केवल शब्दों में नहीं, बल्कि अपने कार्यों में ईमानदारी दिखानी होगी। तब तक भारत इंतजार करेगा और देखता रहेगा।