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पोलियो से हारता पाकिस्तान, भारत से होगा सीखना
Fri, 28 Aug 2020 04:23 AM IST
मरिआना बाबर
मरिआना बाबर
मरिआना बाबर
Published by: मरिआना बाबर
Updated Fri, 28 Aug 2020 04:23 AM IST
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पोलिया ड्रॉप पीता एक बच्चा
- फोटो : Facebook/All India Radio News
विश्व स्वास्थ्य संगठन (डब्ल्यूएचओ) द्वारा अफ्रीका को पोलियो मुक्त घोषित करने पर पूरी दुनिया में खुशी की लहर है, पर यह पाकिस्तान और अफगानिस्तान के लिए सोचने का वक्त है, क्योंकि इस पृथ्वी पर अब यही दो देश बचे हुए हैं, जहां बच्चे अब भी पोलियो से अपंग होते हैं। इस संदर्भ में हमारे विशेषज्ञों द्वारा खासकर भारत के अनुभव से सीखने के कई प्रयास किए गए हैं, जो 2011 में पोलियो मुक्त हो गया था। लेकिन तनावपूर्ण द्विपक्षीय संबंधों ने महत्वपूर्ण स्वास्थ्य मुद्दे पर भी सहयोग को मंजूरी नहीं दी। जबकि पड़ोसी होने के नाते पोलियो की बीमारी को सीमा से परे रखा जा सकता है।
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27 मार्च, 2014 को डब्ल्यूएचओ ने भारत को पोलियो मुक्त देश घोषित किया, क्योंकि पांच साल तक वहां पोलियो का कोई मामला सामने नहीं आया। यह मुझे उस समय की याद दिलाती है, जब मैं वाघा से अटारी सीमा तक जाती थी और पहली चीज जो एक पाकिस्तानी आगंतुक को करनी पड़ती थी, वह यह कि एक विशेष काउंटर पर उन्हें पोलियो ड्रॉप्स पिलाई जाती थी। जब मैंने उन्हें अपना पोलियो सर्टिफिकेट दिखाया, जिसमें लिखा था कि मैंने हाल ही में पोलियो ड्राप लिया था, तो अधिकारी सहमत नहीं हुए थे। अटारी कस्टम्स ऐंड इमिग्रेशन के एक सज्जन ने मुझे बताया कि उन्होंने पता है कि बहुत से पाकिस्तानी सिफारिश से पोलियो मुक्त प्रमाण पत्र हासिल करते हैं और वे वास्तव में ड्रॉप्स नहीं लेते।
मैंने मजाक करते हुए कहा था कि ‘मुझे उम्मीद थी कि आप मुझे हल्दीराम की मिठाई चखने के लिए देंगे, लेकिन आप पोलियो ड्रॉप्स दे रहे हैं।’ इस सावधानी के कारण ही भारत एक पोलियो मुक्त देश है। वे खासकर पाकिस्तानियों और अफगानियों के मामले में कोई जोखिम नहीं लेते। बहुतेरे लोग पूछ रहे हैं कि अगर पाकिस्तान छह महीने में कोरोना को कमोबेश रोक सकता है, तो पोलियो को खत्म क्यों नहीं कर सकता? गौरतलब है कि देश में कोरोना के मामलों में गिरावट आ रही है, अस्पताल के वेंटिलेटर्स वाले बेड खाली हैं और कई जगहों से एक भी मौत की सूचना नहीं है।
पाकिस्तान की स्वास्थ्य प्रणाली तीसरी दुनिया के अधिकांश देशों की तरह कमजोर है। पर जो पाकिस्तान कोविड -19 की दूसरी लहर से बचने में सफल हो रहा है, वह पोलियो का उन्मूलन नहीं कर पाया है? मानवाधिकार आयोग की 2019 की रिपोर्ट के मुताबिक, पाकिस्तान स्वास्थ्य सेवा पर अपनी जीडीपी का एक फीसदी से भी कम खर्च करता है, जबकि डब्ल्यूएचओ ने
स्वास्थ्य सेवा पर छह फीसदी खर्च करने की सिफारिश की है। वर्ष 2018 में स्वास्थ्य अधिकारियों ने कड़ी मेहनत की थी और देश के हर हिस्से में पहुंचे थे, नतीजतन उस साल पोलियो के सिर्फ 12 मामले सामने आए थे। वर्ष 2019 में पोलियो के मामले बढ़कर 147 हो गए थे। जबकि इस साल देश भर में पोलियो का आंकड़ा बढ़कर 65 हो गया है, जबकि साल पूरे होने में अभी चार महीने बाकी हैं। सबसे ज्यादा मामले खैबर पख्तुनख्वा में हैं, जहां मामलों की संख्या 42 है।
इमरान खान की सरकार ने सेना को साथ लेकर कोविड-19 को नियंत्रित करने पर ध्यान केंद्रित किया, पर इससे चार करोड़ पाकिस्तानी बच्चे पोलियो ड्रॉप्स से वंचित रह गए और सरकार ने पोलियो टीकाकरण अभियान रद्द करने का एलान किया। फिलहाल कराची, क्वेटा और पेशावर में पोलियो के ज्यादा मामले हैं, लेकिन कुछ मामले सिंध में भी देखे गए हैं। द नेशनल इमरजेंसी ऐक्शन प्लान (एनईएपी) वार्षिक दस्तावेज है, जो पोलियो उन्मूलन की रणनीति और इसकी रणनीतिक प्राथमिकताओं, कार्य के मुख्य क्षेत्रों, साथ ही नवाचारों, संशोधनों और सुधारों को रेखांकित करता है, जो कार्यक्रम को लगातार चुनौतियों का सामना करने में मदद कर सकते हैं। यह कार्यक्रम फिलहाल पोलियो उन्मूलन, 2020 के लिए एनईएपी को लागू कर रहा है।
एनईएपी, 2020 के मुताबिक, यह कार्यक्रम पाकिस्तान में सभी पोलियो वायरस टाइप 1 और वैक्सीन-व्युत्पन्न पोलियोवायरस टाइप 2 संचरण को रोकने के लिए प्रतिबद्ध है। रोज सैकड़ों अफगान नागरिक बलूचिस्तान और खैबर पख्तुनख्वा में पाकिस्तान की सीमा में आते हैं। इसका मतलब है कि सैकड़ों अफगानी बच्चे पाकिस्तान आते हैं, जिनमें से बहुतों को पोलियो का टीका नहीं लगाया गया। वे आम तौर पर पेशावर, क्वेटा और कराची आते हैं। इन्हीं शहरों में पोलियो के मामलों की संख्या अधिक है। अफगानिस्तान और पाकिस्तान, दोनों पोलियो टीकाकरण अभियान में तालमेल बिठाने की कोशिश कर रहे हैं, क्योंकि इन दोनों देशों के बीच साझेदारी महामारी क्षेत्र के भीतर और बाहर पोलियो वायरस को रोकने के लिए
महत्वपूर्ण है। समर्पित स्वयंसेवकों की कोई कमी नहीं है। पुरुष और महिलाएं, दोनों बच्चों को पोलियो ड्रॉप्स पिलाने के लिए पूरे पाकिस्तान में घर-घर जाते हैं। बर्फ में घुटने तक गहरे धंसी महिलाओं की तस्वीरें मीडिया में देखी गई हैं, जो फिर भी बच्चों के साथ घरों में जाने की कोशिश करती हैं। जनता उन्हें नायक कहती है, क्योंकि खराब मौसम भी उन्हें रोक
नहीं सकता।
पर दुख की बात है कि खासकर खैबर पख्तुनख्वा में अशिक्षा ने कई वर्षों से बच्चों को पोलियो ड्रॉप्स देने के खिलाफ दुष्प्रचार शुरू कर दिया है। अनपढ़ मौलवी और अन्य लोगों द्वारा फतवा जारी किया गया है, जो कहते हैं कि यह दवा हराम है और पश्चिम द्वारा बच्चों को नपुंसक बनाने की साजिश है। घर-घर जाने वाले स्वयंसेवकों की हत्या इतनी खतरनाक हो गई है कि अब उनके साथ पुलिस की टीम जाती है। खैबर पख्तुनख्वा में स्थानीय तालिबान ने भी फतवा जारी करते हुए कहा है कि यह एक अमेरिकी साजिश है और अल्लाह की इच्छा के विरुद्ध है। पोलियो स्वयंसेवकों को अगवा भी कर लिया जाता है। इस तरह की जहालत (मूर्खता) से लड़ना मुश्किल है, क्योंकि स्थानीय तालिबान ने कई स्वयंसेवकों एवं विशेषज्ञों को मार डाला है। पाकिस्तान की लड़ाई सिर्फ कोविड-10 और पोलियो से नहीं है, बल्कि उसकी सबसे बड़ी लड़ाई कट्टरपंथियों की जहालत और अशिक्षा से है, जो पाकिस्तान को पोलियो मुक्त नहीं होने दे रहा।