{"_id":"d47b21ce-7de0-11e2-9052-d4ae52bc57c2","slug":"pain-of-waiting-mountain","type":"story","status":"publish","title_hn":"प्रतीक्षा करते पहाड़ का दर्द","category":{"title":"Opinion","title_hn":"नज़रिया ","slug":"opinion"}}
प्रतीक्षा करते पहाड़ का दर्द
नई दिल्ली
Updated Sat, 23 Feb 2013 11:15 PM IST
विज्ञापन
खबरें लगातार पढ़ने के लिए अमर उजाला एप डाउनलोड करें
या
वेबसाइट पर पढ़ना जारी रखने के लिए वीडियो विज्ञापन देखें
अगर आपके पास प्रीमियम मेंबरशिप है तो
लगभग 20 वर्षों के अंतराल के बाद किसी लेखक के नए रचनाकर्म का आना हैरानी भरा हो सकता है। लेकिन इस वजह से राजा खुगशाल जैसे लेखक के नए कविता संग्रह ‘पहाड़ शीर्षक हैं पृथ्वी के’ को नजरअंदाज कतई नहीं किया जा सकता। 1983 में ‘संवाद के सिलसिले’ और 1991 में प्रकाशित ‘सदी के शेष वर्ष’ के बाद यह राजा खुगशाल का तीसरा कविता संग्रह है।
विज्ञापन
उनकी कविताओं में समय, समाज, संस्कृति और व्यवस्था से लेकर पर्यावरण से जुड़ा चिंतन नजर आता है। इसलिए यह कहना गलत नहीं होगा कि राजा खुगशाल ने कविता के प्रति अपनी निस्पृहता और उदासीनता के बीच अपने भीतर के कवि को जिंदा रखा है। लंबे अंतराल के बावजूद उनके भीतर के कवि ने अपने समय और समाज को कविताओं से ओझल नहीं होने दिया।
विज्ञापन
राजा खुगशाल की कविताओं के कई रंग हैं। कभी वे ‘दुनिया का चेहरा’ कविता में बदलते चेहरों को बयां करते हैं, तो कभी ‘भोटिये’ कविता में एक संस्कृति की कहानी कहते हैं। ‘मील का पत्थर’ छोटी सी कविता है, लेकिन इसका अर्थ बहुत बड़ा है। मील के पत्थरों को भी वे ‘पथप्रदर्शक और सहयात्री’ मानते हैं। इसी तरह ‘अनंत में मौन’ (स्व. शमशेर जी के प्रति सादर) की काव्य भाषा सहज और सरल है, लेकिन कवित्व से रहित बिलकुल नहीं। उन्होंने जो भी महसूस किया उसे आदर और सम्मान के साथ सहज भाषा में कविता का रूप दे दिया।
विज्ञापन
पहाड़ शीर्षक हैं पृथ्वी के
कवि : राजा खुगशाल
आधारशिला प्रकाशन, देहरादून
मूल्य : 150 रुपये