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सियासत: मजबूरी का गठबंधन, ममता बनर्जी समझ गईं विपक्षी एकता की ब्रॉडगेज लाइन

Thu, 24 Aug 2023 07:28 AM IST
Bimal Rai बिमल राय
Updated Thu, 24 Aug 2023 07:28 AM IST
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सार
विपक्षी एकता की ब्रॉडगेज लाइन पर आईं ममता अब समझ गई हैं कि कांग्रेस के झंडे तले रहने में ही उनकी भलाई है।
 
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opposition unity Mamata Banerjee Compelled to come under congress banner lok sabha election 2024
ममता बनर्जी (फाइल फोटो) - फोटो : अमर उजाला

विस्तार

पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी अब विपक्षी एकता की ब्रॉडगेज लाइन पर आ गई हैं, तो इसके कई कारण हैं। पिछले कुछ सालों में जब-तब उनके मन में प्रधानमंत्री बनने का सपना छलक पड़ता था, उनकी पार्टी पूरे बंगाल में पोस्टर लगवाती थी कि बंगाल दीदी को (बांग्लार मेये) प्रधानमंत्री के तौर पर देखना चाहता है। अब इन पोस्टरों को तेजी से बदले राजनीतिक हालात की हवाओं ने फाड़कर उड़ा दिया है और वह कांग्रेस के झंडे तले ही विपक्षी राजनीति करने पर मजबूर हुई हैं।



18 जुलाई को बंगलूरू में हुए विपक्ष की बैठक में ममता बनर्जी ने अपने भाषण में राहुल गांधी को ‘माई फेवरिट‘ कहकर संबोधित किया। हालांकि, इसके ठीक चार महीने पहले उन्होंने अपने एक संबोधन में राहुल को भाजपा का ‘एसेट’ कहा था। उन्हें तकलीफ थी कि देश से बाहर राहुल के बयानों पर घर में इतनी चर्चा क्यों हो रही है? तृणमूल के मुखपत्र में तो कई बार राहुल गांधी के बारे में ऐसे लेख व संपादकीय छपे, जिसे चलती भाषा में धुलाई कहा जा सकता है। हालांकि, अब वह पूरी तरह कांग्रेस और थोड़ा शर्माते हुए माकपा के साथ भी दिख रही हैं। वैसे, कांग्रेस नेता अधीर रंजन चौधरी अब भी उनकी आंखों में खटक रहे हैं और इसीलिए प्रधानमंत्री मोदी ने संसद में अविश्वास प्रस्ताव पर जवाब देते हुए अधीर को दलीय तौर पर बोलने का मौका न देने के संदर्भ में कोलकाता से फोन आने की चर्चा कर उनके घावों को कुरेदा था।


अभी हाल के पंचायत चुनावों में जिन 56 लोगों की मौत हुई, उनमें करीब आधा दर्जन मुर्शिदाबाद, बहरमपुर और आसपास के कांग्रेसी कार्यकर्ता थे। ये जिले अधीर रंजन का गढ़ माने जाते हैं। खबर तो ऐसी भी है कि अगर राज्य में तृणमूल से चुनावी गठजोड़ के लिए मजबूर किया गया, तो अधीर अपना अलग रास्ता चुन सकते हैं। बीते कुछ सालों में अधीर और प्रधानमंत्री मोदी के बीच होती रही नोकझोंक में भी एक-दूसरे के प्रति नरमी की झलकियां मिलती रही हैं। भाजपा को भी मध्य बंगाल में अधीर जैसे कद्दावर नेता की जरूरत है और भाजपा उन्हें आसानी से केंद्र की राजनीति में खपा सकती है। अब देखना यह है कि अधीर असम के हिमंत बिस्व सरमा की राह पर कब तक आते हैं! बंगलूरू में माकपा ने भी हाथ मिलाया, पर दिल मिला है कि नहीं, इसका सिर्फ अंदाजा लगाया जा सकता है। अब सुगबुगाहट है कि सीताराम येचुरी भी 'इंडिया' गठबंधन से हट सकते हैं। बंगाल की जमीन से जो रिपोर्ट आ रही है, उससे माकपा के सीताराम येचुरी का भी मन डोला है।

कायदे से पंचायत चुनावों में ज्यादा सीटें जीतने पर तृणमूल के खेमे में खुशी होनी चाहिए थी, पर इसके लिए जो धतकरम करना पड़ा, शायद उसका अपराध बोध ऐसा नहीं करने दे रहा है। केंद्रीय बलों की सैकड़ों कंपनियों के रहते हुए हर बूथ पर केवल एक पुलिसकर्मी की मौजूदगी में चुनाव कराने, कई जगहों पर बूथ पर तैनात अकेले पुलिस कर्मियों को धमकाने, मतपेटियों व मतपत्रों की लूट, यहां तक कि मतगणना के दिन केंद्र के भीतर केंद्रीय बलों की तैनाती न करने, पुनर्गणना कर हारे हुए को जिता देने, हज करने गए एक व्यक्ति का फर्जी नामांकन का सत्यापन करने जैसी ऐसी-ऐसी धांधलियां हुईं कि इसे प्रहसन से भी बड़ा कुछ कहना चाहिए। इसके अलावा भारी पैमाने पर हिंसा की तस्वीरों से पता चल गया कि दीदी ने यह जीत कैसे हासिल की! कलकत्ता हाईकोर्ट में तीन जजों या पीठों में धांधली से संबंधित दर्जनों मामलों की सुनवाई चल रही है।

हालांकि, चुनावों में हुई मारकाट में विपक्षी दलों के उकसावे का भी हाथ है, जिसे जनता के प्रतिरोध का नाम दिया गया। पर भाजपा नेता शुभेंदु अधिकारी ने कैमरे पर जब यह कहा कि हम ऐसे हालात पैदा करेंगे, जिससे राज्य में अनुच्छेद 355 (राज्य में कानून व्यवस्था संभालने के लिए केंद्र को दखल करने का अधिकार) लागू करने का आधार बनेगा, तो ममता के इस आरोप में थोड़ा सच दिखता है कि इस हिंसा के लिए विपक्ष भी जिम्मेदार है।

तृणमूल ने करोड़ों रुपये खर्च कर गोवा, त्रिपुरा और मणिपुर में विधानसभा चुनाव लड़े, लेकिन वहां उसकी शर्मनाक हार हुई। इन सब कारणों से ममता समझ गई हैं कि अपनी हवाई महत्वाकांक्षा को लगाम लगाकर कांग्रेस की अगुवाई वाले मोर्चे के साथ रहने में ही भलाई है। हालांकि स्वभावगत दुर्बलताओं को देखते हुए वह कब तक इस रुख पर टिकी रहती हैं, यह लोकसभा चुनावों से पहले साफ हो जाएगा।

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