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बजट बढ़ाने भर से गांव नहीं बदलेंगे

Sun, 05 Feb 2017 07:24 PM IST
तवलीन सिंह
तवलीन सिंह Updated Sun, 05 Feb 2017 07:24 PM IST
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Only budget is not enough for rural area
तवलीन सिंह

जिस दिन वित्त मंत्री अरुण जेटली ने बजट पेश किया, मैं उत्तर प्रदेश के कुछ ग्रामीण क्षेत्रों के दौरे पर थी। बेहाल गांवों और टूटी सड़कों पर  घंटों सफर करने के बाद जब दिल्ली लौटी, तो टीवी पर आर्थिक विशेषज्ञों की बातें सुनकर लगा कि इस बार ग्रामीण भारत पर  खास ध्यान दिया गया है। इन चर्चाओं में कुछ ऐसे लोग थे,जिनकी वफादारी  कांग्रेस के साथ है। उन्होंने खूब मजा लेते हुए कहा कि शायद यह सरकार पर सूट-बूट के  आरोप लगाने का अंजाम है। कुछ लोग ऐसे भी थे, जो जब भी टीवी चर्चाओं में भाग लेते हैं, तो हमेशा  किसानों के प्रवक्ता बनकर बातें करते हैं। वे हमेशा कहते हैं कि किसानों की स्थिति पर  किसी सरकार ने ध्यान नहीं दिया है। ऐसा इस बार भी हुआ। किसानों के ये हमदर्द अक्सर अंग्रेजी भाषी, शहरी साहब होते हैं।

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ग्रामीण भारत की समस्या यह नहीं है कि वहां  निवेश नहीं हुआ है। निवेश तो  बहुत हुआ है। ग्रामीणों की समस्या यह है कि उनके कल्याण के लिए चाहे जितनी भी योजनाएं बनें, चाहे जितना भी निवेश हो, उनके जीवन में कोई फर्क नहीं पड़ता, क्योंकि उन तक सरकार की मेहरबानियां पहुंचती ही नहीं हैं। पिछले सप्ताह मैंने जिन गांवों का दौरा किया, वहां ऐसे वृद्ध लोग मिले, जो पेंशन के हकदार हैं, लेकिन उन तक पेंशन पहुंचती नहीं है। बुजुर्गों और विधवा महिलाओं का हाल इतना बुरा है कि देखकर रोना आ जाता है। ये वीरान झोपड़ियों में अकेली रहती हैं और अगर गांव के लोग उनकी मदद ना करें, तो वे शायद भूख से ही मर जाएं। उनके बच्चे शहरों में कमाते हैं और उनको थोड़ा-बहुत पैसा भेजते भी हैं, पर सरकारी राहत उन तक पहुंचती नहीं है।
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बच्चों का भी  बुरा हाल है। गरीबों के बच्चे सरकारी स्कूलों में पढ़ने को मजबूर हैं। इन स्कूलों का हाल इतना बुरा है कि इस दौरे पर  मैंने ऐसे स्कूल देखे, जहां बच्चे पेड़ों के नीचे जमीन पर बैठकर पढ़ते हैं। यहां भी समस्या पैसों की नहीं, लापरवाही और अव्यवस्था की है। गांव तक जब पक्की सड़क ही न हो, तो  विधायक साहब चुनाव जीतने के बाद क्यों लौटकर आएंगे?
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इन बेहाल गांवों में सबके पास सेलफोन होते हैं और गांव के किसी न किसी घर में टीवी भी है। लोग जानते हैं कि उनके राहत के लिए मनरेगा जैसी योजनाएं चल रही हैं। लेकिन इस बारे में उनसे पूछा जाए, तो उनका जवाब होता है कि मनरेगा का पैसा उन्हीं को मिलता है, जिनकी पहुंच प्रधान तक होती है। वे स्वच्छ भारत योजना के बारे में अच्छी तरह जानते हैं। लेकिन शौचालयों के निर्माण का पैसा उन तक पहुंचता नहीं है, सो ज्यादातर लोग अब भी खुले में शौच करते हैं। यह बुरी आदत ये लोग छोड़ना चाहते हैं, पर उनके पास इतना पैसा नहीं होता कि अपने घरों में शौचालय बनाएं।

मैं उत्तर प्रदेश के कुछ ऐसे-वैसे चुनाव क्षेत्र में नहीं घूम रही थी। मेरा दौरा सोनिया गांधी के चुनाव क्षेत्र में था। वहां के लोग गांधी परिवार के इतने वफादार हैं कि अपनी गरीबी का दोष सोनिया गांधी पर नहीं डालते। उनको वे आज भी ‘भगवान’ मानते हैं। उनका मानना है कि सोनिया जी उनके लिए सब कुछ करना चाहती हैं, लेकिन जिन अधिकारियों को यह काम सौंपा जाता है, वही गड़बड़ करते हैं।


इसलिए मैं यकीन के साथ कह सकती हूं कि ग्रामीण भारत की समस्या निवेश का अभाव नहीं है। लेकिन यह पैसा किसी की जेब में कहां और कब जाता है, यह किसी को नहीं मालूम। सो वित्त मंत्री अरुण जेटली द्वारा ग्रामीण भारत का बजट बढ़ाने से कोई खास फर्क नहीं पड़ने वाला।

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