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समाज: छद्म नारीवाद और बिखरता परिवार; चिंताजनक है कानून का दुरुपयोग
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अमर उजाला
विस्तार
हाल ही में पंजाब एवं हरियाणा उच्च न्यायालय ने हिंदू विवाह अधिनियम के तहत क्रूरता के आधार पर पति द्वारा पत्नी के विरुद्ध दायर तलाक की याचिका को स्वीकार करते हुए कहा कि ‘हाल के दिनों में हमने देखा है कि वैवाहिक मामलों में चाहे अपील पति द्वारा दायर की गई हो या पत्नी द्वारा, पत्नियां अक्सर पति द्वारा मांगी गई राहत के बदले पैसे ऐंठने की कोशिश करती हैं।’ न्यायालय ने यह भी कहा, ‘यह बहुत दुर्भाग्यपूर्ण है कि उन्हें ऐसा करने का मौका भी दिया जाता है। अब समय आ गया है कि इस तरह के शोषण और जबरन वसूली को रोका जाए।’
उच्च न्यायालय की यह टिप्पणी छद्म नारीवाद से घायल समाज के घावों पर मरहम लगाती प्रतीत होती है। छद्म नारीवाद ने विगत दशकों में सामाजिक एवं सांस्कृतिक ढांचे पर कुठाराघात किया है। नारीवादी आंदोलन को कभी भी गलत नहीं ठहराया जा सकता, क्योंकि इसका आरंभ हाशिये पर धकेली गई महिलाओं के अधिकारों की पैरवी के लिए हुआ था। स्त्री और पुरुष को समानांतर खड़ा करने के लिए जिन सिद्धांतों की वकालत की गई थी, वे निस्संदेह प्रशंसनीय थे, परंतु सामाजिक व्यवस्था को झटका तब लगा, जब नारीवादी आंदोलन की दूसरी लहर पुरुषों को खलनायक के रूप में चित्रित करने में व्यस्त हो गई। उनकी विचारधारा इस अवधारणा पर टिकी हुई थी कि स्त्री सशक्तीकरण तभी संभव है, जब पुरुषों को पीछे धकेल दिया जाए।
स्त्री सशक्तीकरण के लिए मुखर आवाजों ने शिक्षा और स्वावलंबन पर जोर दिया। इसमें दोराय नहीं कि शिक्षा और स्वावलंबन का मार्ग सशक्तीकरण पर जाकर समाप्त होता है। आधुनिक विचारों की पैरवी करने वाले समूहों ने यह प्रश्न भी उठाया कि ‘क्या झाड़ू व झूठे बर्तनों पर स्त्री का ही नाम लिखा है?’ इसमें लेशमात्र भी संदेह नहीं कि घरेलू कार्य सिर्फ महिलाओं की जिम्मेदारी नहीं है। इसमें पुरुषों की सहभागिता अपेक्षित और आवश्यक भी है, परंतु स्त्री अधिकारों की पैरवी करने वाली ये तमाम संस्थाएं एक स्वर में उस सामाजिक और सांस्कृतिक व्यवस्था पर हस्ताक्षर करती हैं, जहां यह स्वीकार किया जाता रहा है कि पत्नी, बच्चों और परिवार के अन्य सदस्यों की जरूरत को पूरा करना पुरुष का नैतिक दायित्व है। यह सोच इतनी गहरी जड़ें जमाए हुए है कि ‘अर्थ अर्जन’ क्षमता और ‘पारिवारिक वित्तीय दायित्व’ के निर्वहन को पुरुषत्व से जोड़ दिया गया है और उसमें जरा सी चूक उन्हें सामाजिक रूप से लज्जित करती है। यह सामाजिक सरोकारों का विषय कभी नहीं रहा कि निरंतर कमाने का दबाव और खुद को पुरुषत्व के खाके में बैठाने की जद्दोजहद उन्हें मानसिक रूप से प्रभावित कर रही है।
सामाजिक मानदंड की इस पीड़ा को यूकॉन के कनेक्टिकट विश्वविद्यालय के समाजशास्त्र विभाग का अध्ययन ‘इज रिलेटिव इनकम साइकोलॉजिकल वेल बीइंग एंड हेल्थ: इज ब्रेडविनिंग हैजर्ड्स ऑर प्रोटेक्टिव’ बखूबी बयां करता है। 15 वर्षों के निरंतर शोध के बाद शोधकर्ताओं ने इस तथ्य की ओर इशारा किया कि पारिवारिक दायित्व के निर्वहन के लिए अंतहीन काम करने का दावा पुरुषों के शारीरिक एवं मानसिक स्वास्थ्य पर गहरा आघात कर रहा है।
दुनिया भर में हजारों शोध निरंतर इस तथ्य को उजागर करते आए हैं कि विवाह उपरांत महिलाएं शारीरिक और मानसिक रूप से व्यथित होती हैं, लेकिन विरले ही ऐसे अध्ययन हुए, जो विवाह उपरांत पुरुषों से जुड़ी अपेक्षाओं और उसकी हानियों पर चर्चा करें। रिचर्ड वी रीव्स की पुस्तक, ‘ऑफ बॉयज ऐंड मेन : व्हाई द मॉडर्न मेल इज स्ट्रगलिंग, व्हाई इट मैटर्स, एंड व्हाट टू डू अबाउट इट’ उस सांस्कृतिक अतिरेक को कटघरे में खड़ा करती है, जहां पुरुषों के प्रति विद्वेष और पूर्वाग्रहों का जमघट लगा हुआ है। यह विद्रूपता नहीं तो और क्या है कि शिक्षित और सक्षम होने पर भी पत्नियां चाहती हैं कि वित्तीय भार का निर्वहन पति करें।
परंपरागत सामाजिक ढांचे को स्त्री सशक्तीकरण में बाधक मानने वाली विचारधारा ‘सहूलियत’ सिद्धांत पर टिकी है। तथाकथित आधुनिकता की तमाम अवधारणाओं को स्वीकार करने वाली महिलाएं वित्तीय दायित्व से पूर्ण मुक्त रहने की चाह रखती हैं, जो कि प्रत्यक्ष रूप से ‘आत्मसम्मान’ की अवधारणा के विरुद्ध है और परोक्ष रूप से ‘अकर्मण्यता’ की पोषक। उल्लेखनीय है कि 10 सितंबर, 2024 को ‘शिखा बनाम अवनीश महोदया’ मामले में मध्य प्रदेश के उच्च न्यायालय की इंदौर खंडपीठ ने अपने एक फैसले में कहा कि ‘योग्य पत्नी को निष्क्रिय नहीं रहना चाहिए, केवल पति के भरण-पोषण पर निर्भर रहना उचित नहीं।’ यह निश्चित है कि उन परिस्थितियों में, जहां पत्नी अशिक्षित हो और वित्तीय दायित्वों का वहन कर पाने में अक्षम हो, वहां संबंध विच्छेद की स्थिति में पुरुष का दायित्व बनता है कि वह अपनी पत्नी के सम्मानजनक जीवन निर्वाह हेतु वित्तीय भार उठाए, परंतु सक्षम होने पर भी किसी पर निर्भरता लैंगिक समानता की वास्तविक परिभाषा पर कुठाराघात है।