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इस हरकत में कुछ नया नहीं: होर्मुज पर नियंत्रण नहीं खोना चाहता ईरान, 1982 की फिर याद आई
Fri, 10 Jul 2026 08:27 AM IST
Pavan
नील मैकफारक्हर, पत्रकार एवं लेखक
नील मैकफारक्हर, पत्रकार एवं लेखक
Published by: Pavan
Updated Fri, 10 Jul 2026 08:27 AM IST
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इस हरकत में कुछ नया नहीं है
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अमर उजाला ग्राफिक्स
विस्तार
जानकारों का कहना है कि ईरान को डर था कि ‘स्ट्रेट ऑफ होर्मुज’ जैसे महत्वपूर्ण शिपिंग लेन पर उसकी पकड़ धीरे-धीरे कम हो रही है, इसलिए उसने तेल टैंकरों पर दोबारा हमला करके जोखिम उठाया और अमेरिका के साथ एक बड़े युद्ध को फिर से भड़काने की स्थिति पैदा कर दी। बुधवार को दोनों पक्षों ने उस समझौते को रद्द करने की धमकी दी, जिस पर उन्होंने 17 जून को शांति वार्ता का खाका तैयार करने और अप्रैल से चल रहे अस्थिर संघर्ष विराम को आगे बढ़ाने के लिए हस्ताक्षर किए थे।रातभर अमेरिकी लड़ाकू विमानों ने ईरान में कई ठिकानों पर और भी जोरदार हमले किए, जबकि ईरान ने फारस की खाड़ी में अमेरिकी सहयोगियों के खिलाफ ड्रोन और मिसाइल हमलों को और तेज करने की कसम खाई। समझौते का मुख्य आधार यह था कि ईरान को बहुत जरूरी आर्थिक राहत के बदले व्यावसायिक शिपिंग के लिए होर्मुज जलडमरूमध्य को फिर से खोलना था। ईरान के परमाणु कार्यक्रम के भविष्य जैसे मुश्किल मुद्दों को आगे की बातचीत के लिए टाल दिया गया था। लेकिन, इससे हालात में बहुत कम बदलाव आया। जॉन्स हॉपकिंस स्कूल ऑफ एडवांस्ड इंटरनेशनल स्टडीज के प्रोफेसर और ईरान मामलों के अनुभवी जानकार वली नस्र कहते हैं, ‘समझौता मृगतृष्णा जैसा लगने लगा था। तेहरान का मानना है कि अमेरिका सोची-समझी कोशिश में लगा है, ताकि होर्मुज पर ईरान का नियंत्रण खत्म कर लेबनान में उसकी स्थिति कमजोर की जा सके और अपनी ताकत फिर से बढ़ाई जा सके, ताकि ईरान पर और ज्यादा दबाव डाला जा सके या फिर युद्ध की स्थिति में लौटा जा सके।’
समझौते के तहत तय 60 दिनों के संघर्ष विराम का समय बीतता जा रहा था और ईरान इस बात से परेशान था कि अमेरिकी नौसेना समुद्री जहाजों को ओमान के तट के पास वाले दक्षिणी रास्ते से जाने के लिए बढ़ावा दे रही थी। ईरान चाहता था कि सभी जहाज उसकी नई बनी ‘होर्मुज ट्रांजिट अथॉरिटी’ के पास रजिस्टर हों (जो आगे चलकर टोल वसूलने की तैयारी थी), लेकिन अमेरिकी नौसेना ऐसा नहीं कर रही थी। पिछले सप्ताहांत पर ट्रैफिक युद्ध से पहले के स्तर (रोजाना 100 से ज्यादा जहाज) का लगभग एक-तिहाई था और यह जलमार्ग के ईरानी और ओमानी दोनों हिस्सों में बराबर-बराबर बंटा हुआ था। साथ ही, अमेरिका लेबनान और इस्राइल के बीच एक अलग शांति समझौता करने की कोशिश कर रहा था, जिसमें हिज्बुल्ला को हथियार-मुक्त करने का दीर्घकालीन अधूरा लक्ष्य भी शामिल होता। आखिरकार, आर्थिक मदद के बारे में सार्वजनिक चर्चाओं में मदद की राशि कम होती गई।
विश्लेषकों का कहना है कि इसके बजाय, ईरान के सर्वोच्च नेता अयातुल्ला अली खामेनेई (जो फरवरी में युद्ध में मारे गए थे) के हफ्ते भर चलने वाले अंतिम संस्कार के दौरान भी, ईरानियों ने अपनी बढ़त खोने का इंतजार करने के बजाय हमला करने का फैसला किया। उनके मुताबिक, ईरान की यह सोच कि उसने इस साल की शुरुआत में हुई लड़ाई में अमेरिका और इस्राइल को मात दी थी, शायद फिर से टकराव की स्थिति बनने की एक वजह रही। वाशिंगटन में ब्रुकिंग्स इंस्टीट्यूशन की सीनियर फेलो सुजैन मैलोनी ने कहा, ‘अमेरिका और इस्राइल के जबर्दस्त हमलों का सामना करने के बाद, वे (ईरान के लोग) शायद काफी सुरक्षित महसूस कर रहे होंगे। अंतिम संस्कार के कार्यक्रमों के दौरान हुए इन हमलों का समय यह दिखाता है कि सरकार जीत का जश्न मना रही है कि वे आखिरकार युद्ध से बाहर निकल आए हैं और अब भी जवाबी कार्रवाई कर रहे हैं। इसमें निश्चित रूप से एक संदेश है।’
जानकारों का कहना है कि भले ही युद्ध से पहले जहाजों की आवाजाही बिना किसी रुकावट के हो रही थी, लेकिन ईरान का संदेश यह था कि वह इस जलडमरूमध्य पर अपना नया नियंत्रण जमाना चाहता है। अमेरिका ने ईरान पर दशकों से लगे तेल प्रतिबंध हटा दिए थे, फिर उन्हें तुरंत लागू कर दिया। ईरान ने कहा कि उसे इसकी परवाह नहीं है। ईरान के अर्थशास्त्री और मुख्य वार्ताकार मोहम्मद बाघेरी गालिबाफ के सलाहकार, माजिद शाकेरी ने सरकारी टेलीविजन पर कहा, ‘कमाई से ज्यादा जरूरी नियंत्रण है। या तो हम इस जलडमरूमध्य पर अपना कब्जा बनाए रखेंगे, या फिर हममें से हर कोई इसके लिए शहीद हो जाएगा।’
विश्लेषकों का कहना है कि दोनों पक्ष तीखी बयानबाजी और डींगें हांकने के आदी हैं और बातचीत के बजाय अक्सर युद्ध का सहारा लेते हैं। हालांकि, ट्रंप ने बातचीत को फिर से पटरी पर लाने के विचार को पूरी तरह से खारिज नहीं किया। ईरान के कट्टरपंथी लंबे समय से बातचीत के खिलाफ रहे हैं। इसलिए, जलडमरूमध्य को लेकर हुए समझौते से पीछे हटने की मांग भी उठ रही है। अटलांटिक काउंसिल के सीनियर फेलो और ट्रंप के पहले कार्यकाल में नेशनल सिक्योरिटी काउंसिल में ईरान के लिए निदेशक रह चुके नेट स्वानसन ने कहा, ‘लगता है कि यह दिखावा है। यह वैसा ही है, जैसा ट्रंप करते हैं। वह आक्रामक कार्रवाइयों और जोरदार धमकियों के जरिये बातचीत करते हैं, इसलिए कुछ मायनों में वे एक ही भाषा बोल रहे हैं।’
जानकारों के मुताबिक, ईरान को उम्मीद थी कि ट्रंप, जो इस टकराव से परेशान थे और चार महीने बाद मुश्किल मध्यावधि चुनावों का सामना करने वाले थे, किसी अलोकप्रिय युद्ध को फिर से शुरू करने का जोखिम नहीं उठाएंगे। फिर भी, ट्रंप ने ईरानियों के खिलाफ तीखे हमले किए। उन्होंने संकेत दिया कि अमेरिका ईरान पर और भी जोरदार हमला करेगा और युद्धविराम ‘खत्म’ हो गया है। हडसन इंस्टीट्यूट के सीनियर फेलो जोएल रेबर्न ने कहा, ‘ईरान फिर वही गलती कर सकता है, जो वह पहले भी कई बार कर चुका है। वह राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप को सही तरह से नहीं समझ रहा। ईरान पहले भी टैंकरों पर हमला करके खुद को पीड़ित बताने की कोशिश करता रहा है। अब भी वह अपनी सीमाओं से आगे बढ़ रहा है।’
ऐसा पहली बार नहीं होगा। 1979 की इस्लामिक क्रांति के ठीक बाद, तेहरान में नई कट्टरपंथी सरकार ने अमेरिकी दूतावास के बंधकों को 444 दिनों तक बंधक बनाए रखा। वे अपने सेवाकाल से लंबे समय तक मोल-भाव के साधन के रूप में बंधक बनाकर रखे गए, जिसके बदले में पश्चिमी वित्तीय संस्थानों में मौजूद अरबों डॉलर की संपत्ति जब्त कर ली गई। 1982 में, ईरान ने ईरान-इराक युद्ध में युद्धविराम का प्रस्ताव ठुकरा दिया, जिसके कारण छह साल और भीषण लड़ाई चली और लाखों लोग हताहत हुए थे। - ©The New York Times 2026