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सत्य से बड़ा कोई धर्म नहीं होता
शिवकुमार गोयल
Updated Fri, 19 Jul 2013 09:35 PM IST
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एक चांडाल संतों के सत्संग के कारण ईश्वर की भक्ति में लीन रहने लगा। एक दिन वह मंदिर की ओर जा रहा था कि अचानक किसी ने उसे जकड़ लिया। उसने जकड़ने वाले से पूछा, तुम कौन हो और तुमने मुझे क्यों जकड़ा है?
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जकड़ने वाले ने जवाब दिया, मैं ब्रह्मराक्षस हूं। तुम्हें खाकर मैं अपनी भूख मिटाना चाहता हूं।
चांडाल को पूजा के लिए जाना था, अतः उसने कहा, मेरा प्रतिदिन का नियम है कि मैं भगवान की संगीतमय प्रार्थना करता हूं। पहले मैं अपने आराध्य की उपासना करके लौट आऊं, फिर तुम मुझे खा लेना।
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ब्रह्मराक्षस ने उसे छोड़ दिया। चांडाल ने भगवान के विग्रह के समक्ष नाच-गाकर कीर्तन किया। फिर उसने अपने एक मित्र से कहा, आज हमारी आखिरी भेंट है। मैं राक्षस की भूख मिटाने जा रहा हूं। मित्र ने उसे समझाया कि तुम्हें ऐसा पागलपन नहीं करना चाहिए।
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चांडाल ने जवाब दिया, सत्य सबसे बड़ा धर्म है। मैंने ब्रह्मराक्षस को वापस लौटने का वचन दिया है, उसे अवश्य पूरा करूंगा। फिर राक्षस के पास लौटकर कहा, अब मुझे खा लो। राक्षस उसकी ईश्वर एवं सत्य के प्रति निष्ठा देखकर दंग रह गया। उसने कहा, अगर तुम मुझे अपने पुण्य में से एक दिन का पुण्य भी दे दो, तो मेरे सारे पाप नष्ट हो जाएंगे। चांडाल ने ऐसा ही किया और देखते ही देखते राक्षस की मुक्ति हो गई।