{"_id":"3b655ec8-b409-11e2-ae1a-d4ae52bc57c2","slug":"no-preaching-action-needed-in-sarabjit-case","type":"story","status":"publish","title_hn":"उपदेश नहीं, कार्रवाई की जरूरत","category":{"title":"Opinion","title_hn":"नज़रिया ","slug":"opinion"}}
उपदेश नहीं, कार्रवाई की जरूरत
अरुण नेहरू (वरिष्ठ राजनीतिक विश्लेषक)
Updated Fri, 03 May 2013 09:20 PM IST
विज्ञापन
खबरें लगातार पढ़ने के लिए अमर उजाला एप डाउनलोड करें
या
वेबसाइट पर पढ़ना जारी रखने के लिए वीडियो विज्ञापन देखें
अगर आपके पास प्रीमियम मेंबरशिप है तो
पाकिस्तानी जेल में सरबजीत को प्रताड़ित करके मार दिए जाने की घटना एक ऐसी त्रासदी है, जिसे बयान नहीं किया जा सकता।
विज्ञापन
पाकिस्तान विभिन्न आतंकवादी संगठनों द्वारा नियंत्रित एक आतंकवादी देश है। हम एक ऐसे देश से जूझ रहे हैं, जो अंतरराष्ट्रीय कानूनों की कद्र नहीं करता। हमने जेल में अजमल कसाब की सुरक्षा पर पचास करोड़ रुपये खर्च किए। पर पाकिस्तान का रवैया देखिए कि उसने 23 वर्षों तक सरबजीत को जेल में रखा, फिर सुनियोजित तरीके से उसकी हत्या कर दी।
इस घटना के जरिये भारत-पाक संबंधों को बुरी तरह नुकसान पहुंचाया गया है। एक समाज के रूप में हमारे धैर्य की भी सीमा है। ऐसे में उपदेश देने की नहीं, बल्कि कार्रवाई की जरूरत है। यह राजनीति करने का नहीं, बल्कि देश के सभी दलों को एकजुट होकर भावी इरादे के इजहार का वक्त है।
विज्ञापन
कोलगेट मामले पर सुप्रीम कोर्ट में पहली सुनवाई पूरी हो गई है, लेकिन सीबीआई जब तक शीर्ष अदालत में हलफनामा दायर नहीं कर देती, आगे की कार्रवाई के बारे में कहना मुश्किल है।
विज्ञापन
विपक्ष ने जो किया, वह जरूरी था। मीडिया ने इस विवाद को कई नजरिये से पेश करने की कोशिश की, लेकिन अंतिम स्थिति स्पष्ट होने का इंतजार कर कांग्रेस ने ठीक किया है।
इस मामले में कई लोगों को बहुत कम जानकारी है। यह तब सामने आएगा, जब सीबीआई प्रमुख अपनी रिपोर्ट सौंपेंगे। ज्यादातर मीडिया रिपोर्टें 'लीक' से मिली जानकारी पर आधारित हैं, जिसका कोई मतलब नहीं।
तथ्य यह है कि हमारे यहां कानून का राज है और सर्वोच्च न्यायालय द्वारा व्यक्त किए गए विचार का हमें सम्मान करना चाहिए, अन्यथा हम अराजकता की स्थिति में पहुंच जाएंगे। किसी भी दल में कोई व्यक्ति पार्टी से बड़ा नहीं है। मौजूदा हालात में अगर कोई दोषारोपण के खेल में शामिल होता है, तो वह पार्टी को ही नुकसान पहुंचाएगा।
शासन के तंत्र में बदलाव अपरिहार्य है, पर जल्दबादी में कार्रवाई भारी गलती होगी। एक गलती सुधारने के लिए हमें भविष्य के लिए कई समस्याएं पैदा नहीं करनी चाहिए। अच्छाई और बुराई शासन के हरेक स्वरूप में होती है, पर शक्ति का व्यावहारिक संतुलन शासन के सभी अंग बनाए रखते हैं।
गठबंधन सरकार में कई संचालक शक्तियां होने के कारण दबाव होता है। आज हमारे यहां अराजक व्यवस्था है, क्योंकि शासन के लिए जिन्हें चुना गया है, वे हर तरह के नियंत्रण एवं जवाबदेही से घिरे हैं।
हम ऐसी अवस्था में पहुंच गए हैं, जहां विवेक के आधार पर फैसला लेने वाले के खिलाफ आज या उनके सेवानिवृत्त होने के एक-दो दशक बाद मुकदमा चलाया जा सकता है। आश्चर्य नहीं कि अब फैसलों के खिलाफ हर स्तर पर आवाज उठाई जा रही है।
हमारे यहां सांविधानिक पदों एवं न्यायपालिका के लिए जवाबदेही तय हैं, लेकिन ये पुराने नियमों पर आधारित हैं, नतीजतन इनके आधार पर आगे की कार्रवाई असंभव है। जो भी सरकार सत्ता में आएगी, वह इस असंतुलन के साथ शासन नहीं कर पाएगी और यही वास्तविकता है।
2014 में होनेवाला चुनाव फिर गठबंधन सरकार को जन्म देगा, जिसमें पहले से ज्यादा संचालक शक्तियां होंगी। हम अराजक समय की तरफ बढ़ रहे हैं, बल्कि कहना चाहिए कि अराजकता पहले ही आ चुकी है। ऐसे हालात में सही और गलत में अंतर करना मुश्किल है।
उच्च एवं सर्वोच्च अदालतें भी दबाव में है, क्योंकि इनमें ज्यादा से ज्यादा मामले भेजे जा रहे हैं। निचली अदालतों के प्रति लोगों का भरोसा किस कदर घटा है, इसका संकेत ऊपरी अदालतों में मामलों की संख्या से मिलता है। बेशक हम एक-दूसरे पर दोषारोपण कर सकते हैं, लेकिन शासन के हर क्षेत्र में सुधार जरूरी है।
एक बार फिर भाजपा में शीर्ष स्तर पर भ्रामक विवाद उभरा है, जो पार्टी के लिए ठीक नहीं है। भाजपा कर्नाटक में चुनाव हारेगी और शीर्ष स्तर पर कमजोरी की उसे कीमत चुकानी पड़ेगी। पूर्व मुख्यमंत्री बी एस येदियुरप्पा और रेड्डी बंधु, दोनों का सफाया हो सकता है, पर इस प्रक्रिया में भाजपा को भी दंड भोगना पड़ेगा।
नतीजा यह भी साफ करेगा कि चुनावी मैदान में धनबल की भूमिका होती है या नहीं, क्योंकि स्थानीय निकाय के चुनाव में भारी धन खर्च करने के बावजूद येदियुरप्पा और रेड्डी बंधुओं को हार का मुंह देखना पड़ा था।
कर्नाटक का चुनावी नतीजा यह भी संकेत देगा कि आंध्र प्रदेश में जगन मोहन रेड्डी की वाईएसआर कांग्रेस और उनकी अथाह संपत्ति का जादू चलेगा या रुझान बदलेगा।
चिटफंड कंपनियों की धोखाधड़ी के मामले चिंतनीय हैं। सेबी और सर्वोच्च न्यायालय ने सही कदम उठाया है, ताकि भविष्य में इस तरह की धोखाधड़ी पर अंकुश लगे, लेकिन पोंजी योजनाओं में दोषियों को सजा देने के अलावा वसूली तो कम ही हो पाती है। क्या कोई अनुमान लगा सकता है कि पूरे देश में ऐसी स्कीमों में कितना धन लगा है।
हमारे यहां कई घोटाले हुए हैं, लेकिन इसमें ग्रामीण क्षेत्रों के बेहद गरीब लोगों का धन फंसा है, जो करोड़ों में हो सकता है। अच्छी बात यह है कि सेबी की पहल पर कई राज्यों ने कार्रवाई शुरू कर दी है, जिनमें पश्चिम बंगाल आगे है।
बिहार एवं ओडिशा में भी छापे की खबरें हैं, लेकिन कमोबेश हर राज्य में इस तरह की कंपनियों का नेटवर्क होगा। मीडिया रिपोर्टों के मुताबिक अकेले ओडिशा में 4,000 चिट फंड कंपनियां हैं, जिनके द्वारा 20,000 करोड़ रुपये घोटाले का अनुमान है। अगर हम पड़ताल करें, तो संभव है कि यह आंकड़ा एक-दो लाख करोड़ तक जाए।