समाधान में अब न हो देरी
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अयोध्या को लेकर पिछले सप्ताह बहुत चर्चा हुई। छह दिसंबर के समय ऐसा अक्सर होता है। लेकिन इस बार चर्चा कुछ ज्यादा हुई, क्योंकि बाबरी मस्जिद को ढहाए जाने की यह पच्चीसवीं सालगिरह थी। इस बार चर्चा इसलिए भी ज्यादा हुई, क्योंकि कांग्रेस के वरिष्ठ नेता और जाने-माने वकील कपिल सिब्बल ने सर्वोच न्यायालय में राम जन्मभूमि के मालिकाना अधिकार पर हो रही सुनवाई को जुलाई, 2019 तक टालने के लिए पेशकश की। इस तिथि की अहमियत यही है कि तब तक उस वर्ष होने वाले लोकसभा चुनाव हो गए होंगे। कांग्रेस प्रवक्ताओं ने फौरन स्पष्ट किया कि सिब्बल साहब पार्टी की तरफ से नहीं बोल रहे थे, और जिस सुन्नी मुस्लिम बोर्ड की वह वकालत कर रहे थे, अदालत में उनकी तरफ से भी प्रवक्ताओं ने स्पष्ट किया कि वे सुनवाई टालना नहीं चाहते हैं। जो भी हो, सिब्बल साहब ने एक बार फिर याद दिलाया कि झगड़ा न धर्म-मजहब का है और न ही भूमि की मिल्कियत का, झगड़ा राजनीतिक है। सो समाधान भी राजनीतिक ही होना चाहिए।
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राजनीतिक समाधान आज के दौर में लेकिन होगा कैसे, जब उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री न सिर्फ भगवाधारी योगी हैं, बल्कि एक ऐसे व्यक्ति भी हैं, जो राम जन्मभूमि आंदोलन से प्रेरित होकर ही राजनीति में आए थे! मुख्यमंत्री बन जाने के बाद उन्होंने अपने कई कार्यों से स्पष्ट किया है कि वह हिंदुत्ववादी हैं और रहेंगे। सत्ता संभालने के बाद उनका पहला काम था लव जेहाद को रोकने के लिए थानों में रोमियो स्क्वॉड तैनात करना, और दूसरा कदम उन्होंने अवैध बूचड़खानों को बंद करवाने का उठाया। मुस्लिम युवकों को तंग किया गया, ज्यादातर गरीब मुसलमानों की रोजी-रोटी गई। इस दिवाली पर अयोध्या के घाटों को दुल्हन की तरह सजाया गया और योगी जी ने राम, सीता, लक्ष्मण की भूमिका अदा करनेवाले अभिनेताओं का हवाई अड्डे पर खड़े होकर स्वयं स्वागत किया। इससे सबको यही इशारा मिला है कि योगी के दौर में राम जन्मभूमि पर भव्य मंदिर बनकर ही रहेगा।
इसके बाद हिंदू-मुस्लिम तनाव अवश्य बढ़ेगा और हो सकता है कि एक बार फिर वैसी ही हिंसा देश भर में हो, जैसी बाबरी मस्जिद को ढहाए जाने के बाद हुई थी। अभी से हिंदू-मुस्लिम तनाव इतना है कि पिछले सप्ताह अयोध्या पर ऐसी कोई चर्चा मैंने किसी भी टीवी चैनल पर नहीं सुनी, जिसमें हिंदू और मुसलमान किसी बात पर सहमत दिखाई पड़े हों। मुस्लिम कौम की तरफ से बार-बार यही कहा गया कि छह दिसंबर, 1992 भारत के इतिहास का सबसे काला दिवस है, जबकि हिंदुओं की तरफ से यह कहा गया कि बाबर एक लुटेरा था, जिसने जान-बूझकर मस्जिद उस स्थान पर बनाई, जहां मान्यता है कि भगवान राम का जन्म हुआ था, सो इतिहास के इस अपराध को सुधारना आवश्यक है।
ऐसे में, इस तनाव भरे वातावरण में समाधान आखिर क्या हो सकता है? मैंने पहले भी लिखा है इस जगह और दोबारा विनम्रता से यह अर्ज करना चाहूंगी कि हमारे यहां मुसलमानों का नेतृत्व करने वाले लोग अगर समझदारी से काम लेते हैं, तो वे मंदिर का विरोध नहीं करेंगे। उसके बाद अयोध्या में सरयू नदी के उस पार अगर नई मस्जिद भी बन जाती है, तो संभव है कि उस मस्जिद का निर्माण हिंदुओं की कार सेवा से हो। अगर अयोध्या में कुछ इस तरह का समाधान नहीं निकलता है, तो अच्छे दिनों के बदले बहुत बुरे दिन आ सकते हैं अपने इस भारत देश में। सो सर्वोच न्यायालय में इस मामले की सुनवाई जितनी जल्दी समाप्त हो, देश के लिए वह उतना ही अच्छा होगा।