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आसान नहीं वालमार्ट की राह

Mon, 18 Mar 2013 11:03 AM IST
उपेंद्र प्रसाद, जाने-माने अर्थशास्त्री
उपेंद्र प्रसाद, जाने-माने अर्थशास्त्री Updated Mon, 18 Mar 2013 11:03 AM IST
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no easy way to walmart

आखिर वही हुआ, जिसकी उम्मीद थी। लेकिन खुदरा व्यापार में एफडीआई पर संसद में सरकार की जीत के बाद यह सवाल अस्वाभाविक नहीं है कि क्या वालमार्ट, टेस्को और केरफोर जैसी बड़ी रिटेल कंपनियां यहां अपनी दुकानें खोलने के लिए कूद पड़ेंगी। सवाल यह भी कि इससे क्या हमारे देश के करीब चार करोड़ खुदरा दुकानदार बेरोजगार हो जाएंगे। इन प्रश्नों का जवाब जानने के लिए अमेरिका के साथ हुए परमाणु करार की नियति को देखना दिलचस्प होगा।

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वर्ष 2008 में परमाणु करार संपन्न हुआ था। तब उसके खिलाफ देश में जबर्दस्त वातावरण बनाया गया था। विरोधियों का कहना था कि यह अमेरिका को फायदा पहुंचाने के लिए किया जा रहा है और अमेरिकी परमाणु व्यापारी भारत में 400 अरब डॉलर के निवेश की योजना रखते हैं। परमाणु करार के चार साल हो चुके हैं, लेकिन अभी तक अमेरिकी परमाणु प्रतिष्ठान के साथ भारत का कोई सौदा नहीं हुआ है। अमेरिका के साथ भारत का सरकारी स्तर पर किया गया करार व्यापारिक स्तर पर अभी तक खरा नहीं उतरा है, क्योंकि व्यापार करने के लिए सिर्फ एक करार काफी नहीं होता, बल्कि देश के अन्य कानून और कानूनों से इतर पूरा माहौल भी अनुकूल होना चाहिए।
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परमाणु समझौते के आलोक में यही कहा जा सकता है कि रिटेल एफडीआई पर सरकार के बड़बोलेपन के बावजूद अपने यहां विदेशी कंपनियों का आना इतना आसान नहीं है। विदेशी खुदरा व्यापारियों को आमंत्रित करते हुए जो फैसला किया गया है, उसके मुताबिक, 10 लाख और उससे अधिक आबादी वाले शहरों में ही उनकी दुकानें खुल सकती हैं। अपने देश में ऐसे शहरों की संख्या 18 बताई जा रही है।
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10 लाख की आबादी की शर्त के साथ यह भी स्पष्ट हो गया है कि विदेशी खुदरा व्यापारियों को अपना स्टोर खोलने अथवा उससे जुड़ी कोई अन्य सुविधा की इजाजत देने, न देने का अंतिम अधिकार राज्य सरकारों के पास है, केंद्र के पास नहीं। संसद में बहस के दौरान स्पष्ट हो गया है कि देश की अधिकांश पार्टियां और अधिकांश राज्यों के मुख्यमंत्री विदेशी खुदरा व्यापारियों के खिलाफ हैं। यह भी साफ हो गया है कि सिर्फ कांग्रेस की सरकार वाले राज्यों में ही ऐसे स्टोर खुलेंगे। कांग्रेस शासित उन राज्यों के उन्हीं शहरों में ऐसी दुकानें खुल सकती हैं, जिनकी आबादी 10 लाख से ज्यादा है। ऐसे राज्य कितने हैं और उन राज्यों में ऐसे शहर कितने हैं?

कांग्रेस की सरकारें दिल्ली, हरियाणा, राजस्थान, आंध्र प्रदेश, असम, उत्तराखंड व कुछ अन्य छोटे राज्यों में ही हैं। आंध्र प्रदेश में तेलंगाना को लेकर घमासान मचा रहता है। वैसे माहौल में तो वहां कोई विदेशी निवेश होने से रहा। असम उग्रवाद से परेशान है और वहां 10 लाख से ज्यादा आबादी वाला शहर भी नहीं है। यही हाल उत्तराखंड और अन्य कांग्रेस शासित राज्यों का है। कुल मिलाकर दिल्ली, हरियाणा और राजस्थान बचते हैं, जहां फिलहाल विदेशी खुदरा व्यापारी आ सकते हैं। लेकिन दिल्ली और राजस्थान में अगले साल विधानसभा चुनाव होने हैं। अगर इन दोनों राज्यों में सरकारें बदलती हैं और भाजपा आती है, तो वह इस तरह के निवेश के खिलाफ होगी।

ऐसे में एकमात्र राज्य बच जाता है हरियाणा और एक अन्य शहर चंडीगढ़, जहां विदेशी कंपनियां अपना स्टोर खोलने की सोच सकती हैं। पर जिस तरह से देश में विदेशी खुदरा व्यापार का विरोध हो रहा है, विरोध में जिस तरह के तर्क दिए जा रहे हैं, और जिस तरह की राजनीति आने वाले वर्षों में भी होने वाली है, उन्हें देखते हुए किसी भी बड़ी विदेशी कंपनी को भारत में अपना किराना स्टोर खोलने से पहले 10 बार सोचना पड़ेगा।

मल्टी ब्रांड खुदरा व्यापार में असंगठित क्षेत्र की करीब चार करोड़ दुकानें खुली हुई हैं, जिनसे लगभग 20 करोड़ लोगों की आजीविका चलती है। मतदाताओं के इतने बड़े वर्ग को अपने पाले में लाने के लिए राजनीतिक पार्टियां क्या नहीं कर सकतीं? इनके दबाव का ही नतीजा है कि शरद पवार की पार्टी ने संसद में सरकार के साथ होने के बाद भी कहा है कि महाराष्ट्र में हम विदेशी खुदरा व्यापार के खिलाफ हैं। द्रमुक ने मतदान में भले साथ दिया हो, लेकिन वह भी कह रही है कि तमिलनाडु में विदेशी निवेश को स्वीकार नहीं किया जाएगा। उसकी प्रतिद्वंद्वी अन्नाद्रमुक तो कह रही है कि केंद्र की अगली सरकार में इस फैसले को ही वापस ले लिया जाएगा। सिर्फ जयललिता नहीं, राजग का भी कहना है कि उसकी सरकार बनने के बाद इस फैसले को निरस्त कर दिया जाएगा। जाहिर है, ऐसे राजनीतिक माहौल में कोई बड़ी विदेशी कंपनी भारत में अपना पैसा क्यों लगाना चाहेगी?

यदि सभी राज्यों में विदेशी खुदरा व्यापार संभव नहीं हैं, तो विदेशी कंपनियों को एक और बड़ी समस्या का सामना करना पड़ेगा। उसका सप्लाई चेन बहुत लंबा होता है। किसी एक राज्य में उसका स्टोर हो, तो उसका चेन पड़ोसी राज्य में भी पहुंच सकता है। अब यदि पड़ोसी राज्य चेन तैयार करने की सुविधा ही उसे नहीं देती है, तो फिर वह अपनी दुकान कैसे चला पाएगी? यही नहीं, अमेरिका के कुछ शहरों के स्थानीय निकायों ने अपने तरीके से वालमार्ट के प्रवेश को ही निरुद्ध कर रखा है। शहरी निकायों ने किराना दुकानों के आकार भी तय कर रखे हैं। तय आकार से बड़े क्षेत्र पर किराना स्टोर नहीं खुल सकते।


अब यदि दिल्ली नगर निगम ने भी कुछ ऐसे ही नियम बना डाले, तो केंद्र और राज्य की कांग्रेस सरकारों की अनुमति के बाद भी दिल्ली में विदेशी स्टोर नहीं खुल सकेंगे, क्योंकि यहां नगर निगम पर भाजपा का कब्जा है। इसलिए विदेशी खुदरा व्यापार को इजाजत देने के बावजूद भारी पैमाने पर विदेशी कंपनियों का अपने यहां प्रवेश आसान नहीं होगा।

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