आने वाला कल: नई राजनीति वाला हो नया साल, विकसित भारत के लिए हों कृतसंकल्पित
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विस्तार
कोई चैन की सांस लेते हुए पीछे मुड़कर देखे कि वह बेहद विभाजनकारी राजनीति के बीते वर्ष से खुद को कैसे बचा सका, या फिर यह सोचकर बेचैन हो कि क्या वह इस बोझ को 2025 में भी साथ ले जाने वाला है? दरअसल, बेहद कड़वे माहौल में हुए 2024 के आम चुनाव ने देश की राजनीति को इस कदर बांट दिया है कि इसके घाव अब तक ताजा हैं और सभी संकेत यह दर्शा रहे हैं कि इनमें कमी आने के भी कोई आसार नहीं दिखते। साल का अंत पूर्व प्रधानमंत्री डॉ. मनमोहन सिंह के निधन की दुखद खबर के साथ हो रहा है। डॉ. सिंह को शुभचिंतकों द्वारा श्रद्धांजलि दी ही जा रही थी कि कांग्रेस और सत्तारूढ़ भाजपा के बीच इस बात को लेकर बहस छिड़ गई कि प्रोटोकॉल और मानदंडों के अनुसार, उनका अंतिम संस्कार कहां किया जाए। राजनीति की विभाजनकारी प्रकृति की कुरूपता बेहद शर्मनाक है।
वर्ष 2024 में भारत के राजनीतिक परिदृश्य में कुछ महत्वपूर्ण बदलावों ने जगह ली है। ‘चार सौ पार’ का नारा देने वाली भारतीय जनता पार्टी ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में लोकसभा में 240 सीटें हासिल कीं, जो 272 सीटों के बहुमत से काफी कम हैं। चेहरा बचाने वाली बात यह रही कि भाजपा ने चुनाव पूर्व गठबंधन कर तेलुगू देशम पार्टी (तेदेपा) और जनता दल यूनाइटेड (जदयू) के साथ मिलकर चुनाव लड़ा था और वह आसानी से गठबंधन सरकार बनाने में सक्षम थी। लेकिन इसका संदेश स्पष्ट था कि भारत के लोग भाजपा की वापसी चाहते थे, पर नियंत्रण और संतुलन के साथ। नरेंद्र मोदी लौटे और रिकॉर्ड तीसरी बार प्रधानमंत्री बने।
लेकिन चुनाव के दौरान हमने यह भी होते देखा कि कांग्रेस पार्टी ने देश भर में यह धारणा फैलाई कि देश का संविधान खतरे में है और अगर जनता ने भाजपा को पूर्ण बहुमत दे दिया, तो वह इसे बदल देगी। इस संदेश का असर यह हुआ कि लाखों भारतीयों को लगने लगा कि मोदी की अगुवाई वाला राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (एनडीए) आरक्षण नीति को खत्म कर सकता है।
इंडियन नेशनल डेवलपमेंट इन्क्ल्ूसिव अलायंस (इंडिया) के तहत विपक्ष, भाजपा की अगुवाई वाले एनडीए को तीसरी बार प्रचंड बहुमत के साथ सत्ता में आने के एजेंडे को रोकने में सफल रहा। कांग्रेस के नेतृत्व वाले इंडिया गठबंधन ने 234 सीटें जीतीं, जो उनकी खुद की उम्मीद से भी परे थीं। 2014 के आम चुनाव में सिर्फ 44 सीटों पर सिमटने वाली कांग्रेस इस बार भाजपा को सत्ता से बाहर करने के करीब तक पहुंची और अल्पकालिक तौर पर ही सही, लेकिन भाजपा की छवि को भी काफी हद तक क्षति पहुंचाने में सफल रही।
ऐसा लग रहा था कि कांग्रेस हारकर भी जीत गई और भाजपा सदमे में है। आम चुनाव के बाद पहले संसद सत्र में कांग्रेस की अगुवाई वाले इंडिया गठबंधन ने आख्यान गढ़ा और लग रहा था कि भाजपा कुछ कमजोर हो गई है। मीडिया भी संशय में दिखी। जून 2024 में देश के राजनीतिक परिदृश्य में कुछ बदलाव हुए। संविधान बचाओ के साथ फिर से उभरे जाति-विरोधी अभियान ने जून में लोकसभा चुनाव पर तो अहम प्रभाव छोड़ा था, लेकिन इसके बाद अक्तूबर-नवंबर में हुए विधानसभा चुनावों में उसने अलग ही रूप ले लिया। जून में भाजपा को उलटफेर का सामना करना पड़ा था, लेकिन हरियाणा व महाराष्ट्र में बड़ी और निर्णायक जीत दर्ज करते हुए भाजपा ने पलटवार किया, जहां कांग्रेस की जाति आधारित राजनीति काम नहीं आई।
कांग्रेस ने भाजपा को व्याकुल करने और दलितों, पिछड़ों व अल्पसंख्यकों को लुभाने के लिए बीआर आंबेडकर को पार्टी का शुभंकर बनाने की रणनीति अपनाई है। ऐसा लगता है कि वे अस्थायी रूप से क्रोनी कैपिटलिज्म थीम से दूर चले गए हैं, जिसका आरोप वे पिछले कुछ वर्षों से प्रधानमंत्री मोदी पर लगा रहे थे। संसद का शीतकालीन सत्र उस वक्त और हंगामेदार हो गया, जब सत्ता पक्ष की ओर से विपक्ष पर आरोप लगाया गया कि वह आंबेडकर, जिनके प्रगतिशील विचारों ने भारतीयों की दो पीढ़ियों को आकार दिया, के प्रति केवल दिखावा करता है, जबकि इनका इतिहास उनके साथ घृणित व्यवहार की ओर इशारा करता है।
इस वर्ष ने यह भी दिखाया कि राज्यों के चुनाव लड़ रहीं सभी राजनीतिक पार्टियों ने आर्थिक लोकलुभावनवाद की राजनीति को अंगीकार किया। भाजपा ने ‘रेवड़ी संस्कृति’ के अपने आख्यान को दरकिनार कर दिया, जिसका इस्तेमाल उसने अतीत में खासकर आम आदमी पार्टी की आलोचना करने के लिए किया था। इससे राजकोषीय संतुलन को लेकर चिंता बढ़ गई है। इन लोकलुभावन उपायों के कारण महाराष्ट्र ने अपने राजकोषीय घाटे के लक्ष्य को काफी बढ़ा दिया। कई राज्यों के बजट में मुफ्त की रेवड़ी बांटने के चलते राजस्व व्यय में तेज वृद्धि देखी जा रही है। विश्लेषक राज्य सरकारों को ऐसी योजनाओं के नुकसान के प्रति आगाह कर रहे हैं, जिनकी वजह से राजकोषीय घाटा बढ़ सकता है। क्या मोदी सरकार आगामी वर्ष में अपने उस सुधारवादी एजेंडे पर आगे बढ़ेगी, जिसका उसने वर्ष 2024 में वादा किया है। भाजपा कहती है कि समान नागरिक संहिता और एक राष्ट्र-एक चुनाव उसके एजेंडे में हैं। हालांकि 2024 के आम चुनाव में निराशाजनक प्रदर्शन के कुछ महीनों बाद हरियाणा और महाराष्ट्र के चुनावों ने भाजपा को यह विश्वास दिया है कि सिर्फ तीन महीने में ही वह देश का मूड बदल सकती है।
एक देश-एक चुनाव से मतदाताओं की परेशानी कम करने और खर्च में कटौती, जैसे कई लाभ होंगे। लेकिन क्षेत्रीय दलों को लगता है कि यह क्षेत्रीय मुद्दों को कमजोर कर सकता है और सत्ता को केंद्रीकृत करके भारत के संघीय ढांचे को कमजोर करेगा। प्रस्ताव के लिए सांविधानिक संशोधन की जरूरत है, जिसके लिए संसद में दो-तिहाई बहुमत की आवश्यकता होगी, जो वर्तमान में एनडीए के पास नहीं है।
भारत वर्ष 2025 में इस उम्मीद के साथ प्रवेश करने जा रहा है कि नीति निर्माता और सत्ताधारी दल देश को वर्ष 2047 तक ‘विकसित भारत’ बनाने के लिए दृढ़संकल्पित हैं। सामाजिक आंदोलन और आर्थिक रणनीतियां साथ मिलकर चलेंगी, जैसा कि भारत यानी इंडिया में हमेशा होता है।