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अब नया सियासी नारा ‘दुनिया के दलितों एक हो’

Fri, 19 Aug 2016 08:22 PM IST
अतुल सिन्हा
अतुल सिन्हा Updated Fri, 19 Aug 2016 08:22 PM IST
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New Political slogan-worlds Dalit be Unite
अतुल सिन्हा

उन्नीसवीं सदी में दुनिया के मजदूरों को एक करने का नारा देने वाले कार्ल मार्क्स ने कभी सोचा भी नहीं होगा कि उनका नारा इक्कीसवीं सदी में ‘दुनिया के दलितों एक हो’ में तब्दील हो जाएगा। मजदूर तो एक हुए नहीं, उल्टे मजदूरों की परिभाषाएं बदल गईं, उनकी श्रेणियां बदल गईं और मजदूर आंदोलन पूरी तरह बिखर गया। अब गुजरात के उना में आजादी की 70वीं सालगिरह पर ‘दुनिया के दलितों एक हो’ का मंच सजा और दलितों के नाम पर चल रही सियासत परवान चढ़ने लगी। आखिर क्या वजह है कि नरेंद्र मोदी का गुजरात अचानक दलित राजनीति का एक बड़ा केंद्र बन गया और उत्तर प्रदेश के लिए भी गुजरात एक नई सियासी गर्मी देने वाला उर्वर राज्य नजर आने लगा?

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दलितों के मसीहा माने जाने वाले बाबा साहब भीमराव अंबेडकर किसके हैं, इसे लेकर खींचतान बरसों से चल रही है। कांशीराम और मायावती के बाद अब मोदी और केजरीवाल भी इस दौड़ में काफी आगे निकल चुके हैं। सत्ता जिसके हाथ हो और जिसे अपनी सत्ता का विस्तार चाहिए, बाबा साहब उसके हो जाते हैं और जो सत्ता का ख्वाब संजोकर अपनी बाजी सजा रहा है, उसके लिए दलित और मुस्लिम से बड़ा कोई ‘कार्ड’ नहीं। सब जानते हैं कि गुजरात और उत्तर प्रदेश के चुनाव में अब ज्यादा वक्त नहीं है। मोदी गुजरात से निकलकर राष्ट्रीय हो चुके हैं और उससे भी ज्यादा बनारसी और उत्तर प्रदेशी। अमित शाह से लेकर खुद मोदी तक गुजरात को भूलकर इस सबसे बड़े सूबे को अपनाने की रणनीति में लग गए।
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लेकिन इस खेल में गुजरात में पार्टी और भाजपा सरकार की पकड़ किस कदर ढीली हुई, यह सब देख रहे हैं। पाटीदारों के आंदोलन, पटेल समुदाय के जबर्दस्त उभार और हार्दिक पटेल की चुनौती के साथ-साथ अब दलितों के सवाल पर उठे जन आंदोलन ने मोदी की मुश्किलें और बढ़ा दी हैं। पार्टी के अंदरूनी झगड़े, मोदी की उत्तराधिकारी रहीं आनंदीबेन पटेल की छुट्टी, चुनाव से कुछ महीने पहले नेतृत्व परिवर्तन की मजबूरी और दलितों के सवाल पर वहां केजरीवाल और मायावती के बढ़ते असर ने भाजपा की राह में बहुत सारे कांटे बिछा दिए हैं। ऐसे में 15 अगस्त के दिन उना में दुनिया के दलितों को एक करने की अपील के साथ हुई विशाल सभा ने भाजपा की नींद उड़ा दी है। बौखलाहट में रैली से लौटने वालों पर सवर्णों के हमले ने हालात और बिगाड़ दिए हैं। पाटीदारों के नेता हार्दिक पटेल के बाद अब दलितों के नए नेता जिग्नेश मेवाणी की ताकत से यह बौखलाहट और बढ़ गई है। तथाकथित गोरक्षकों पर सख्ती बरतने और दलितों के लिए अपने दर्द का लंबे समय बाद इजहार करने वाले मोदी के चेहरे का तनाव साफ बताता है कि गुजरात में उनके मन के मुताबिक कुछ नहीं हो रहा है।
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दूसरी तरफ उत्तर प्रदेश में दलितों को लेकर चल रहे चुनावी खेल में गुजरात एक बड़ी संजीवनी नजर आ रहा है। गुजरात की घटनाओं से ध्यान हटाने के लिए दयाशंकर सिंह का मायावती पर दिया गया बयान भाजपा के लिए ऐसा उल्टा पड़ा कि अब यहां सीधी जंग भाजपा बनाम बसपा बनकर रह गई। गुजरात और उत्तर प्रदेश के दलित अच्छी तरह जानते हैं कि उन्हें बस मोहरे की तरह इस्तेमाल किया जा रहा है। और इस बार भी कांग्रेस, भाजपा, बसपा या आम आदमी पार्टी उनका सियासी इस्तेमाल कर रही हैं। कुल मिलाकर यह कि दुनिया के दलितों को एक करने का सपना देखने वाले भी जानते हैं कि हर पार्टी के लिए दलित के अपने-अपने मायने हैं और उनका अंतिम मकसद इस वोट बैंक को बरकरार रखना है।

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