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रिश्तों को नया आयाम
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मोदी-नेतन्याहू
इन दिनों इस्राइल के प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू की छह दिवसीय भारत यात्रा का महत्व सिर्फ इसलिए नहीं है, कि प्रधानमंत्री मोदी ने प्रोटोकॉल तोड़कर उनका स्वागत किया। बदले हुए वैश्विक परिदृश्य में जहां भारत इस्राइल के साथ अपनी सारी झिझक दूर कर सामरिक और प्रौद्योगिक क्षेत्रों में आगे बढ़ने को तैयार है, वहीं फलस्तीन के मुद्दे पर भारत का रुख अमेरिका ही नहीं, इस्राइल से उसके अपने रिश्ते से भी निरपेक्ष है। अच्छी बात यह है कि सिर्फ भारत ही नहीं, बल्कि इस्राइल भी गर्मजोशी के साथ भारत से अपने रिश्ते को आगे बढ़ाना चाहता है।
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जब तक इस्राइल और अरब देशों के रिश्ते अच्छे नहीं होते, उसका असर हमारे रिश्तों पर पड़ता है। हम इस्राइल के साथ रिश्ता बढ़ा रहे हैं, तो इसका मतलब यह नहीं कि अरब देशों के साथ हमारे रिश्ते खराब हो जाएं। अरब देशों से हम तेल लेते हैं। वहां लाखों भारतीय रहते और रोजगार करते हैं। हमें इन सबका भी लिहाज रखना पड़ेगा। हमारे रिश्ते इस्राइल के साथ कभी बुरे नहीं रहे, लेकिन अरब देशों के साथ उसके रिश्ते का असर हमारे रिश्तों पर भी पड़ना लाजिमी है। अब लग रहा है कि हम उससे निकल रहे हैं। इसके कई कारण हैं, लेकिन मैं दो कारणों का जिक्र करना चाहूंगा। एक तो स्वयं अरब देशों ने खुद इस्राइल के साथ तल्खी में कमी की है। कभी-कभार थोड़ा सहयोग भी देखने को मिलता है। अरब मुल्कों और इस्राइल के बीच जो पहले कट्टर दुश्मनी थी, उसकी तीव्रता में कमी आई है। हमारे नजरिये से इसका असर यह हुआ है कि अगर हम इस्राइल के साथ सहयोग बढ़ाएं, तो अरब देशों के साथ हमारे रिश्ते खराब होने की आशंका नहीं है। कहने का मतलब कि भारत की विदेश नीति में एक तरह का संतुलन आ गया है और कूटनीतिक रिश्तों को एक नया आयाम दिया गया है।
इस्राइल और ईरान के रिश्ते इन दिनों ठीक नहीं हैं। लेकिन हमारे रिश्ते ईरान से भी बढ़ रहे हैं। उदाहरण के लिए, चाबहार समझौते को ले सकते हैं। संभावना है कि इसी वर्ष के अंत तक चाबहार बंदरगाह शुरू हो जाएगा। हमारे लिए अफगानिस्तान से सड़क मार्ग के जरिये कारोबार में पाकिस्तान बाधा बना हुआ है। अब इस मार्ग से भारत अपना सामान अफगानिस्तान भेज सकता है। हम चाहते हैं कि ईरान और इस्राइल के साथ हमारे रिश्ते और मजबूत हों, लेकिन इन दोनों देशों के बीच आजकल दुश्मनी है। फिर भी हमने अरब देशों, ईरान, अफगानिस्तान और इस्राइल के साथ रिश्तों में एक संतुलन कायम करने की कोशिश की है। साफ है कि अपनी विदेश नीति में हमने व्यावहारिक रणनीति अपनाई है, जिससे इन सभी देशों के साथ हम बेहतर ताल्लुकात बना रहे हैं और अपने मकसद की तरफ बढ़ रहे हैं।
इस्राइल-फलस्तीन के विवाद पर सबकी नजर है। हम सबने और दुनिया ने भी देखा है कि फलस्तीन के प्रति इस्राइल ने काफी सख्ती दिखाई है। समय-समय पर दोनों देशों के बीच हिंसक संघर्ष भी होते रहे हैं। यह तो अभी चलेगा, लेकिन इसमें हम नहीं पड़ते। अमेरिकी राष्ट्रपति ट्रंप ने हाल ही में येरूशलम को इस्राइल की राजधानी बनाए जाने की मांग का समर्थन किया है। लेकिन भारत ने इस मामले में संयुक्त राष्ट्र में अमेरिका के विपरीत रुख लिया और दुनिया को दिखा दिया कि अमेरिका से बेहतर रिश्ता होने के बावजूद भारत उससे अलग राह अपना सकता है। नेतन्याहू की इस यात्रा के दौरान भी फलस्तीन और येरूशलम का मुद्दा उठा, लेकिन साझा बयान में फलस्तीन मुद्दे का कहीं जिक्र नहीं था। भारत ने स्पष्ट रूप से इस्राइल के सामने अपना रुख स्पष्ट कर दिया और दोनों देश इस बात पर सहमत हुए कि आपसी रिश्ते पर इसका असर नहीं पड़ेगा।
इस्राइल से भारत के रिश्ते का एक आयाम प्रौद्योगिकी से भी जुड़ा हुआ है। हमें मानना पड़ेगा कि इस्राइल के वैज्ञानिक और इंजीनियर बहुत आगे निकल चुके हैं और उन्होंने जो प्रौद्योगिकी विकसित की है, उनसे हम फायदा उठा सकते हैं और वे हमें बेचने के लिए तैयार भी हैं। दोनों देश एक-दूसरे की आर्थिक तरक्की के काम आ सकते हैं। कृषि और रक्षा क्षेत्र में उनकी तकनीक का उपयोग करके फायदा उठा सकते हैं, तो उन्हें अपना विशाल बाजार भी दे सकते हैं। इस्राइल की कंपनियां लंबे अर्से से हमारे देश में अपना कारोबार कर रही हंै, जिसमें और तरक्की होगी।
जाहिर है, दोनों देश एक-दूसरे के लिए दरवाजे खोल रहे हैं। नेतन्याहू के मौजूदा दौरे में दोनों देशों के बीच नौ समझौते हुए हैं। जैसा कि प्रधानमंत्री मोदी ने कहा कि 'दोनों देशों के बीच फिल्म, स्टार्ट अप इंडिया, रक्षा और निवेश को लेकर सहमति बनी है और मैं उम्मीद करता हूं कि आने वाले समय में दोनों देश मिलकर एक-दूसरे की तरक्की और दोनों देशों की जनता के लिए मिलकर काम कर सकेंगे। दोनों मुल्कों के बीच पहली बार तेल और गैस क्षेत्र में निवेश को लेकर समझौता हुआ। इस्राइल अक्षय ऊर्जा के क्षेत्र में भारतीय कंपनियों को उन्नत तकनीक देने के लिए तैयार है और इसको लेकर भी समझौता हुआ है। उड्डयन के क्षेत्र में भी समझौता हुआ है, जिससे दोनों देशों के रिश्ते में और प्रगाढ़ता आएगी। पहले हुए साइबर सुरक्षा समझौते को और भी व्यापक बनाया गया है। अंतरिक्ष और औद्योगिक अनुसंधान के क्षेत्र में भी दोनों देशों के बीच दो नए समझौते हुए हैं। एक-दूसरे के निवेशकों को प्रोत्साहन और सुरक्षा देने के संबंध में भी समझौता हुआ। और सबसे दिलचस्प बात यह है कि दोनों देशों की फिल्मों की शूटिंग को प्रोत्साहन देने के लिए भी समझौता हुआ है।
दोनों देशों के बीच व्यापारिक रिश्ते को और आगे बढ़ाने के लिए मुक्त व्यापार समझौता करना जरूरी है, इसलिए आगे हमारी ख्वाहिश और राजनीतिक इच्छाशक्ति होनी चाहिए कि दोनों देशों के बीच मुक्त व्यापार समझौता हो। उम्मीद करनी चाहिए कि दोनों देशों के रिश्ते एक-दूसरे के लिए फायदेमंद साबित होंगे और तरक्की की नई राह खोलेंगे।