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नए कृषि कानूनों में सुधार की दरकार, न्यूनतम समर्थन मूल्य क्यों हैं जरूरी? 

Thu, 17 Dec 2020 06:00 AM IST
अश्विनी महाजन अश्विनी महाजन
अश्विनी महाजन Published by: अश्विनी महाजन Updated Thu, 17 Dec 2020 06:00 AM IST
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New agricultural laws need reform, why minimum support prices are important?
सिंघु बॉर्डर पर किसानों का प्रदर्शन - फोटो : जी पाल

केंद्र सरकार द्वारा कृषि से संबंधित तीन विधेयक पारित करवाए गए। पहला है, ‘आवश्यक वस्तु (संशोधन) अधिनियम, 2020’। जिसका उद्देश्य आवश्यक वस्तु अधिनियम में संशोधन करते हुए कृषि व्यापार को उदार एवं सुगम बनाना है। आज जब कृषि उत्पादन काफी बढ़ गया है और वे सरप्लस में हैं, इसलिए आवश्यक वस्तु अधिनियम में बदलाव करते हुए अनाज, दालें, तिलहन, खाद्य तेलों, आलू, प्याज इत्यादि को उससे बाहर किया गया है, ताकि बड़ी मात्रा में निजी क्षेत्र द्वारा उसका भली-भांति भंडारण हो सके। दूसरा कानून है ‘किसान उत्पाद व्यापार और वाणिज्य (संवर्धन और सुविधा) अधिनियम, 2020’। इसके अनुसार कृषि व्यापार के तौर-तरीकों में बदलाव का आगाज किया गया। सरकार का तर्क है कि नई व्यवस्था में किसानों को मध्यस्थों से छूट मिलेगी और खुले बाजार में बेचते हुए उन्हें मंडी शुल्क और मध्यस्थों का कमीशन नहीं देना पड़ेगा और उनके पास ज्यादा विकल्प होंगे। इससे किसान को उपज के बदले में ज्यादा पैसा मिलेगा। 


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सरकार ने स्पष्ट किया है कि कृषि वस्तुओं की सरकारी खरीद पूर्व की भांति एपीएमसी मंडियों में न्यूनतम समर्थन मूल्य (एमएसपी) पर ही जारी रहेगी और उसमें कोई बदलाव नहीं होगा। तीसरा कानून है ‘किसान (सशक्तीकरण और संरक्षण) मूल्य आश्वासन और कृषि सेवा समझौता अधिनियम, 2020’। इसमें कृषि उत्पाद के लिए निजी कंपनियों अथवा व्यक्तियों द्वारा किसानों के साथ संविदा खेती (कांट्रेक्ट फार्मिंग) के समझौते की व्यवस्था की गई है। हालांकि यह एक प्रगतिशील कदम है, लेकिन इस कानून में समस्या यह है कि विवाद की स्थिति में किसान को सही समाधान मिलने के लिए व्यवस्था से संबंधित समस्याएं उत्पन्न हो सकती हैं। कई राजनीतिक दल और किसान संगठन इन कानूनों का विरोध कर रहे हैं, मगर माना जा रहा है कि नवीन कृषि कानूनों को लाने में सरकार की नीयत सही है। ऐसे में जो सवाल उठ रहे हैं, उन पर गौर करने की जरूरत है। 

न्यूनतम समर्थन मूल्य क्यों हैं जरूरी? अपनी उपज का सही मूल्य न मिलने के कारण किसान न केवल गरीब होते चले जाते हैं, उन पर कर्ज का बोझ भी बढ़ता चला जाता है। कर्ज से ग्रस्त होने पर पिछले डेढ़ दशक में अभी तक देश में तीन लाख किसान आत्महत्या कर चुके हैं। वर्ष 2008 में पिछली यूपीए सरकार द्वारा लगभग 70 हजार करोड़ रुपये से भी अधिक की ऋण माफी योजना लाई गई। उसके बाद हालांकि केंद्र सरकार द्वारा ऐसी कोई योजना नहीं आई, लेकिन उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश, महाराष्ट्र आदि राज्य सरकारों ने कई ऋण माफी योजनाएं लागू कीं। ऋण माफी के कारण सरकारी खजाने पर भारी बोझ भी पड़ता है। किसानों को ऋणग्रस्तता से राहत देना जरूरी भी होता है, अन्यथा वे इसके कारण भारी दबाव में आ जाते हैं, जो उनकी आत्महत्याओं का कारण बनता है। संजीदगी से सोचें, तो किसान को उसकी उपज का सही मूल्य, उसको कर्ज में डूबने से भी बचाता है। 

‘किसान उत्पाद व्यापार और वाणिज्य (संवर्धन और सुविधा) विधेयक 2020’ का भाव यह है कि मध्यस्थों से बचाकर किसानों को उनकी उपज का सही मूल्य मिले। इस संबंध में यह संशय उत्पन्न हो रहा है कि मंडी शुल्क से मुक्त होने के कारण व्यापारियों और कंपनियों को स्वाभाविक रूप से मंडी से बाहर खरीदने के लिए प्रोत्साहन मिलेगा। ऐसे में मंडी का महत्व ही नहीं रहेगा। किसान भी मंडी से बाहर बिक्री करने के लिए बाध्य होगा। ऐसे में बड़ी खरीदार कंपनियां किसानों का शोषण कर सकती हैं। लिहाजा जरूरी है कि किसानों को न्यूनतम समर्थन मूल्य की गारंटी हो और न्यूनतम समर्थन मूल्य से कम पर खरीद गैर कानूनी घोषित हो। केवल सरकार ही नहीं, कोई भी न्यूनतम समर्थन मूल्य से कम पर न खरीद पाए। जब गैर कृषि औद्योगिक उत्पादों को कंपनियां स्वयं द्वारा निर्धारित कीमत अधिकतम खुदरा कीमत (एमआरपी) पर बेचती हैं, जो उनकी उत्पादन लागत से कहीं ज्यादा होती है, तो किसान को भी कम से कम अपनी लागत पर आधारित न्यूनतम समर्थन मूल्य (एमएसपी) पर अपना माल बेचने की सुविधा होनी चाहिए। नए प्रावधानों के अनुसार, जब कोई भी खरीदार अपना पैन कार्ड दिखाकर किसान से खरीद कर सकता है, ऐसे में जैसे ही किसान का माल उठाया जाए, उसका भुगतान भी तुरंत होना चाहिए। अथवा सरकार को उसके भुगतान की गारंटी लेनी चाहिए। कृषि उत्पाद खरीद करने वाले सभी व्यापारियों और कंपनियों का पंजीकरण हो। किसान के पास अपनी उपज की बिक्री हेतु अधिक विकल्प होना सही है, लेकिन यदि किसी एक बड़ी कंपनी अथवा कुछ कंपनियों का प्रभुत्व हो जाएगा, तो गरीब किसान की सौदेबाजी की शक्ति समाप्त हो जाएगी। 

सरकार द्वारा पूर्व में 22 हजार मंडियों की स्थापना की बात कही गई थी। इस योजना को जल्दी से पूरा किया जाना चाहिए। किसान उत्पाद व्यापार और वाणिज्य (संवर्द्धन और सुविधा) विधेयक 2020 के अंतर्गत किसान की परिभाषा है, जो स्वयं अथवा मजदूरी देकर अन्य लोगों द्वारा कृषि उत्पाद में संलग्न हो। इस परिभाषा के अनुसार, कंपनियां भी किसान की परिभाषाओं में शामिल हो जाएंगी। यह सही नहीं होगा। कहा जाता है कि मंडी व्यापारी किसानों के एटीएम हैं, क्योंकि उनसे किसान अग्रिम ले सकते हैं। मंडियों से बाहर अपने उत्पाद बेचने वाले किसानों के पास व्यापारियों से अग्रिम लेने की सुविधा नहीं रहेगी। ऐसे में जब किसान संविदा खेती में संलग्न होता है, तो उसे बुआई के समय से ही भुगतान शुरू होना चाहिए। इस प्रकार किसान को तीन-चार किश्तों में राशि दी जा सकती है। संविदा खेती में संलग्न किसानों के लिए न्यायसंगत विवाद समाधान तंत्र होना चाहिए। संविदा खेती से संबंधित ‘किसान (सशक्तीकरण और संरक्षण) मूल्य आश्वासन और कृषि सेवा समझौता विधेयक, 2020’, द्वारा प्रस्तावित विवाद समाधान तंत्र किसानों के लिए बहुत जटिल है। पहले से ही काम के बोझ में दबे सब-डिविजनल मजिस्ट्रेट को महत्वपूर्ण भूमिका में रखा गया है, जिससे किसान को समाधान मिलने की संभावनाएं बहुत कम हैं। इसके लिए उपभोक्ता अदालतों की तर्ज पर किसान अदालतों की स्थापना इस समस्या का समाधान होगा।

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