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अतीत से बाहर निकले नेपाल

Wed, 13 Jan 2016 07:00 PM IST
पुष्पेश पंत
पुष्पेश पंत Updated Wed, 13 Jan 2016 07:00 PM IST
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Nepal have to emerged from the past

नेपाल के जिम्मेदार समझे जाने वाले एक राजनेता ने हाल में एक बेहद आपत्तिजनक बयान दिया है। उनका कहना था कि मधेसियों का रास्ता रोकने वाला बंद पिछले वर्ष के भूकंप से भी अधिक तबाही वाला सिद्ध हो रहा है। जाहिर है कि दूसरे नेपाली नेताओं की तरह वह भी इसके लिए भारत को ही दोष दे रहे थे। उनके इस बयान ने हमें इस पर पुनर्विचार करने के लिए बाध्य किया है।

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जिस कारण तराई वासी मधेसी आंदोलन के लिए मजबूर हुए हैं, उसे किसी भी तरह भारत का निर्यात नहीं कहा जा सकता। लंबे समय से चले आ रहे गतिरोध के लिए खुदगर्ज मौकापरस्त नेपाली राजनीतिक दल और व्यक्तिगत महत्वाकांक्षा से पीड़ित वहां के नेता ही जिम्मेदार हैं। जिस संविधान को लागू करने की घोषणा ने जनाक्रोश को हिंसक बनाया, उसमें नेपाल की बहुसंख्यक आबादी के साथ अन्याय किया गया था। इसलिए भारत पर आरोप लगाना बिल्कुल गलत है। पिछले वर्षों में जब कभी भारतीय मित्रों ने नेपाल के संविधान निर्माताओं को यह सलाह देने की कोशिश की कि नए संविधान में सभी नागरिकों को समान अधिकार देना ही अच्छा होगा, तो उसे आंतरिक मामलों में हस्तक्षेप बताया गया। नेपाली कांग्रेस से लेकर अति वामपंथी माओवादी तक इस बारे में एकमत होकर मुखर होते रहे हैं।
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अभी ऐसा माहौल बनाने की कोशिश हो रही है कि नेपाल की मौजूदा सरकार तो आंदोलनकर्मियों के साथ सुलह के लिए तैयार है, बस भारत ही हालात सामान्य नहीं होने दे रहा। यह सच है कि इस बंद के कारण चरमराती अर्थव्यवस्था के दबाव में नेपाल सरकार यह समझौता करने को मजबूर हुई है कि संसद में निर्वाचित प्रतिनिधि जनसंख्या के समानुपातिक आधार पर चुने जाएंगे और नए सूबों का सीमांकन भी जनभावनाओं के अनुसार ही होगा, लेकिन तब भी हालात सुधरते नहीं दिखलाई देते। इसकी वजह यह नहीं कि भारत सरकार परदे के पीछे से कठपुतलियां नचा रही है, बल्कि मधेसियों के मन में काठमांडू के प्रति रत्ती भर भी विश्वसनीयता नहीं है। मधेसियों की आशंका है कि एक बार इस संकट से मुक्त होते ही पहाड़ी शासक वर्ग का शिकंजा कसने लगेगा और संघीय व्यवस्था को तिलांजलि देते देर नहीं लगेगी।
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हमारी समझ में नेपाल का वर्तमान संकट भारत की करतूत नहीं, बल्कि नेपाल के गृहयुद्ध की ही विरासत है। इससे इन्कार नहीं किया जा सकता कि चुनावी जीत के बाद माओवादियों द्वारा सरकार बनाने के बावजूद राजशाही के दौर में पनपने वाले निहित स्वार्थों ने हार नहीं मानी है। उन्हें आज भी लगता है कि जनतांत्रिक प्रयोग की विफलता के बाद जनता झक मारकर पुराने सामंती श्रीमंतों की शरण लेने को बाध्य होगी! ऐसे दुस्साहसिकों की भी कमी नहीं, जो सुझाने लगे हैं कि अगर हालात ऐसे ही बिगड़ते चले गए, तो देश को बचाने के लिए राजशाही की वापसी ही एकमात्र विकल्प होगा।

इसे बेहद दुर्भाग्यपूर्ण ही कहा जा सकता है कि नेपाल के वर्तमान प्रधानमंत्री ने जिनेवा में भारत पर इस बंद को संचालित करने का आरोप लगाते हुए इसे नेपाली जनता के मानवाधिकारों का उल्लंघन बताया। उनकी जो भी विवशता रही हो, लेकिन ऐसे बयानों से जो राजनयिक तनाव पैदा होते हैं, उनसे संकट समाधान में भारत की तटस्थ भूमिका पूरी तरह नष्ट हो जाती है। इसके साथ ही नेपाल सरकार द्वारा भारत के राजनयिक भयादोहन के प्रयास भी दूरदर्शी नहीं कहे जा सकते। कुछ ही दिन पहले तक तेवर यह थे कि अगर स्थल मार्ग से तेल और रोजमर्रा की जरूरत की चीजें भारत से नेपाल नहीं पहुंचीं, तो नेपाल उन्हें चीन जैसे दूसरे मित्रों से हवाई मार्ग से मंगाने लगेगा। लेकिन वास्तविकता यह है कि नेपाल बहुत लंबे समय तक यह रणनीति नहीं अपना सकता है।

हकीकत यह है कि जनतांत्रिक गणतंत्र के रूप में नेपाल का उदय हो चुका है। घड़ी की सुइयां पीछे नहीं लौटाई जा सकतीं। यह भी स्पष्ट है कि नेपाल जैसी भौगोलिक और जातीय-सांस्कृतिक बहुलता वाले राष्ट्र में संघीय प्रणाली ही लोकतंत्र को निरापद रख सकती है। इसे स्वीकार किए बिना भी आगे नहीं बढ़ा जा सकता कि नेपाल का आर्थिक विकास बिना अंतरराष्ट्रीय सहयोग के नहीं हो सकता।

भारत के लिए यह समझना जरूरी है कि आज की परिस्थिति में उसके संबंध कतई वैसे नहीं रह सकते, जैसे 1950 के दशक में थे। न ही सांस्कृतिक विरासत की अनूठी साझेदारी इस बात की गारंटी है कि नेपाल के साथ हमारे रिश्ते सदैव तनावरहित दोस्ताना बने रहेंगे। आर्थिक हितों के संयोग का तर्क भी अब तक कारगर साबित नहीं हुआ है। जो नेपाली या भारतीय उद्यमी इस दिशा में सक्रिय होते हैं, उन्हें मुनाफाखोर या विदेशी एजेंट बताना सहज होता है।

इसे भी झुठलाया नहीं जा सकता कि पिछले दो दशकों में अमेरिका, पश्चिमी यूरोप, चीन, जापान ने बड़े पैमाने पर नेपाल में समाज कल्याणकारी परियोजनाओं के माध्यम से नेपाल को आर्थिक सहायता तथा संसाधन सुलभ कराए हैं। कहीं न कहीं इसके पीछे भारत के पर कतरने की मंशा भी काम करती नजर आती है। यह भी रेखांकित करने की दरकार है कि अपने नागरिकों के बुनियादी मानवाधिकारों की रक्षा की प्राथमिक जिम्मेदारी किसी देश के सरकार की ही होती है, पड़ोसी राष्ट्र की नहीं। नेपाली आंदोलनकारियों के असंतोष-आक्रोश का बड़ा कारण आबादी के विभिन्न तबकों के मानवाधिकारों की उपेक्षा भी है। जाहिर है कि इस विषय में भारत मुखर नहीं हो सकता।


विचित्र यह है कि दमनकारी निरंकुश राजशाही के दौर में मौनव्रती उदार लोकतांत्रिक नेपाली बौद्धिक तथा पत्रकार अभी भारत की 'क्षेत्रीय साम्राज्यवादी' नीतियों का 'पर्दाफाश' करने को उतावले हैं। पेशेवर भारतीय नेपाल विशेषज्ञ भी अपने राष्ट्रहित की कसौटी पर ही 'यथार्थवादी' परामर्श देने को व्याकुल लगते हैं। पहले लगता था कि बिहार चुनाव के बाद तनाव घटेगा। फिलहाल ऐसा नहीं लगता कि निकट भविष्य में गतिरोध दूर हो सकता है और तराई में हालात जल्दी सामान्य होंगे। यह बात नेपाल और भारत, दोनों के ही हित में नहीं।

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