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अनुसरण: चीन की शह पर नेपाली दुस्साहस, अकारण नहीं है मुद्रा पर विवादित नक्शे का अक्स
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नेपाल
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Amar Ujala
विस्तार
दो दिसंबर, 1815 को ईस्ट इंडिया कंपनी और नेपाल के बीच सुगौली संधि पर हस्ताक्षर किया गया था और बाद में चार मार्च, 1816 को इसकी पुष्टि की गई थी, जिसने हिमालय साम्राज्य और औपनिवेशिक भारत के बीच सीमा रेखा स्थापित की। सुगौली संधि के अनुसार, काली नदी को दोनों देशों के बीच सीमा के रूप में स्वीकार किया गया था, लेकिन नेपाल लिपुलेख, लिम्पियाधुरा और कालापनी पर अपना स्वामित्व जताता रहा, जिसका जमीनी हकीकत से कोई वास्ता नहीं है।
वर्ष 1816 से 2024 के बीच कई तरह के नक्शे प्रकाशित किए, जिसने सीमा के मुद्दे को और जटिल बना दिया। दोनों देशों की सरकारों द्वारा गठित सीमा आयोगों के नतीजों से वांछित परिणाम नहीं मिले हैं। अब नेपाल की कम्युनिस्ट सरकार ने अपनी मुद्रा पर नेपाल का एक नया नक्शा प्रकाशित किया है, जिसमें लिपुलेख, लिम्पियाधुरा और कालापानी जैसे भारतीय क्षेत्र को नेपाल के हिस्से के रूप में दर्शाया गया है, जिससे सदियों पुराने रिश्ते खतरे में पड़ गए हंै, क्योंकि इस तरह के गैर-राजनयिक कदम से भविष्य में खुला टकराव हो सकता है।
इसे विडंबना ही कहा जाएगा, क्योंकि प्रधानमंत्री मोदी ने नेपाल के साथ संबंधों को मजबूत करने का काफी प्रयास किया है और आधे दर्जन से अधिक बार नेपाल का दौरा किया, जिसमें 2022 में लुंबिनी की यात्रा भी शामिल है, जब उन्होंने भिक्षुओं, बौद्ध विद्वानों और गणमान्य लोगों की सभा को संबोधित किया। मोदी ने कहा कि बुद्ध की प्रासंगिकता किसी भौगोलिक सीमा में सीमित नहीं है, बल्कि वह सबके हैं। उन्होंने भारत-नेपाल रिश्तों की तुलना पहाड़ों की ऊंचाई से करते हुए इसे प्रौद्योगिकी, विज्ञान और बुनियादी ढांचों के विकास तक विस्तार देने की प्राथमिकता जताई। लेकिन लगता है कि नेपाल की कम्युनिस्ट सरकार इस रिश्ते को नष्ट करने पर तुली हुई है, जो कि हिमालयी साम्राज्य के लोगों के हितों के खिलाफ होगा। अब नई दिल्ली में आने वाली नई सरकार के लिए चीन समर्थक नेपाल से निपटने के लिए फिर से एक नई रणनीति तैयार करने की अग्निपरीक्षा होगी। संभवतः नेपाल के साथ संबंध बनाए रखने के लिए भारत लचीला रुख अपना सकता है।
कूटनीतिक विशेषज्ञ इस बात पर एकमत हैं कि नेपाल सरकार को चीन भारत पर दबाव बनाने के लिए उकसाता है, जिससे रिश्ते तनावपूर्ण हो सकते हैं और नेपाल में चीन को बढ़त मिल सकती है। प्रचंड के नेतृत्व वाली गठबंधन सरकार, जिसमें चीन समर्थक एवं भारत विरोधी पूर्व नेपाली प्रधानमंत्री केपीएस ओली प्रमुख भागीदार हैं, ने हाल ही में सौ रुपये की नेपाली मुद्रा छापने का आक्रामक फैसला किया, जिसमें नेपाली नक्शे में भारतीय क्षेत्रों को दर्शाया गया है। इस पर प्रतिक्रिया जताते हुए भारत के विदेश मंत्री एस. जयशंकर ने स्पष्ट कर दिया कि नेपाल के इस कदम से जमीनी स्तर पर वास्तविकता नहीं बदलेगी। उन्होंने कहा कि 'हम स्थापित मंच के माध्यम से सीमा मुद्दों पर नेपाल से बातचीत कर रहे हैं। इस बीच नेपाल ने एकतरफा तौर पर अपनी तरफ से कुछ कदम उठाए हैं।' भारत पहले ही नेपाल की ऐसी कोशिशों को नकार चुका है।
इसके विपरीत, नेपाल का दावा है कि 1962 के भारत-चीन युद्ध के बाद भारत ने तीन क्षेत्रों पर अवैध रूप से कब्जा कर लिया, जो विवाद का विषय रहा है, क्योंकि यह वास्तविकता से बहुत दूर है और सुगौली संधि की भावना के खिलाफ है। नेपाल की मुद्रा पर नया नक्शा छापने के नेपाल सरकार के फैसले ने नई दिल्ली में कई लोगों को आश्चर्यचकित कर दिया। इससे पहले भी तत्कालीन नेपाली प्रधानमंत्री ओली ने नया नक्शा तैयार कराया था, जिसमें भारत के इन क्षेत्रों को नेपाल में दिखाया गया था। इससे भारत नाराज हो गया था और इस शरारती कदम को सिरे से खारिज कर दिया था।
ओली ने आठ मई, 2020 को रक्षामंत्री राजनाथ सिंह द्वारा उत्तराखंड के धारचूला से लिपुलेख दर्रे को जोड़ने वाली 80 किलोमीटर लंबी रणनीतिक रूप से महत्वपूर्ण सड़क के उद्घाटन पर भी आपत्ति जताई थी। नेपाल ने भारत के नव उद्घाटित लिंक रोड पर भी असहमति जताई थी, जो लिपुलेख दर्रे से कैलाश मानसरोवर को जोड़ती है।
विशेषज्ञों का कहना है कि नई सरकार मुख्य रूप से प्रचंड के सीपीएन (माओवादी सेंटर) और सीपीएन-यूएमएल, नेपाल की कम्युनिस्ट पार्टी (एकीकृत मार्क्सवादी-लेनिनवादी) के नेतृत्व वाले 'चीन समर्थक' वफादार गुटों का संयोजन है, जिसका नेतृत्व पूर्व प्रधानमंत्री केपीएस ओली करते हैं, एक घातक जोड़ी बनाता है। यह कटु सच्चाई है कि ओली नेपाल की गठबंधन सरकार पर हावी हो रहे हैं, क्योंकि प्रचंड (32 सांसद) की तुलना में उनके पास 77 सांसदों का बहुमत है। प्रचंड और ओली कट्टर कम्युनिस्ट हैं, जो शायद भारत और चीन के साथ संतुलन बनाने में सहज महसूस नहीं कर रहे होंगे।
यह एक स्थापित तथ्य है कि नेपाल नमक से लेकर पेट्रोलियम उत्पादों तक आवश्यक वस्तुओं के लिए भारत पर पूरी तरह से निर्भर है। अगर नेपाल का झुकाव चीन की तरफ होता भी है, तो भौगोलिक रूप से उन वस्तुओं को चीन से आयात करना उसके लिए संभव नहीं है। भारत ने 53.9 करोड़ डॉलर का निर्यात किया और फिर नेपाल से 6.21 करोड़ डॉलर का आयात किया, जिससे व्यापार संतुलन में 47.7 करोड़ डॉलर की बढ़त दर्ज की गई। हालांकि व्यापार एवं उद्योग के आंकड़े बताते हैं कि नेपाल से आयात एवं निर्यात, दोनों में जनवरी, 2023 और जनवरी, 2024 के बीच कमी दर्ज की गई है।
चीन ने हाल ही में मालदीव को अपने पक्ष में कर लिया है और अब नेपाल भी उसी का अनुसरण कर रहा है। यह भारतीय कूटनीति के लिए गंभीर चुनौती है, इसलिए भारत को मालदीव और नेपाल के साथ संयम और लचीलेपन से निपटना चाहिए और इस क्षेत्र में चीन के विस्तारवाद पर अंकुश लगाने के लिए बातचीत को प्राथमिकता देनी चाहिए।
विशेषज्ञों का मानना है कि नेपाल के कम्युनिस्ट भारत विरोधी प्रचार को ग्रामीण स्तर तक फैलाने में सफल हो गए हैं, जो कूटनीतिक रूप से आत्मघाती साबित हो सकता है, क्योंकि यह नेपाल के लोगों के हितों के खिलाफ होगा।