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पड़ोस: बिना किसी ‘संकोच’ या पश्चाताप के पीठ में छुरा घोंपने की फितरत; क्या यही पाकिस्तान का असली रंग है?

Fri, 07 Mar 2025 04:36 AM IST
Virendar Kapoor वीरेंदर कपूर
Updated Fri, 07 Mar 2025 04:36 AM IST
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सार
धारावाहिकों एवं यूट्यूब के जरिये पाकिस्तान भारत के खिलाफ दुष्प्रचार फैलाने की रणनीति अपना रहा है। हालिया बांग्लादेशी संकट में उसके दुष्प्रचार का मुखौटा पूरी तरह उतर गया है। वह बिना किसी ‘संकोच’ या पश्चाताप के पीठ में छुरा घोंपता है, यही उसकी ‘फितरत’ है।
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Neighbourhood Backstabbing without any hesitation or remorse is this the real colour of Pakistan
Social Media - फोटो : FREEPIK

विस्तार

अमेरिकी दार्शनिक और समाज विज्ञानी एरिक हॉफ ने कहा है कि ‘दुष्प्रचार लोगों को धोखा नहीं देता; यह केवल उन्हें खुद को धोखा देने में मदद करता है।’ दुष्प्रचार (प्रोपेगैंडा), जिसे अब मनोवैज्ञानिक युद्ध कहा जाता है, आधुनिक युद्ध के सबसे महत्वपूर्ण उपकरणों में से एक है। भूराजनीति में भी इसका इस्तेमाल होता है। द्वितीय विश्वयुद्ध के दौरान हिटलर और नाजी जर्मनी के प्रचार मंत्री जोसेफ गोएबल्स के नेतृत्व में जर्मनों ने फिल्मों, पोस्टरों, भाषणों, बैनरों और कई अन्य साधनों के माध्यम से जर्मनों के दिमागों को प्रभावित किया। अक्सर जोसेफ गोएबल्स की प्रसिद्ध पंक्तियों को उद्धृत किया जाता है कि ‘यदि आप कोई बड़ा झूठ बोलते हैं और उसे बार-बार दोहराते हैं, तो लोग अंततः उस पर विश्वास कर ही लेंगे’, क्योंकि लोग भोले होते हैं।


इसमें समय लगता है और यह झूठ जितना सूक्ष्म होगा, उतना ही बेहतर होगा। इस पर ज्यादा जोर देने की जरूरत नहीं है, बल्कि कहानियों के माध्यम से धीरे-धीरे झूठ के जहर को घोला जाता है। अपने दुश्मन के खिलाफ दुष्प्रचार का सबसे शक्तिशाली तरीका है, एक खास तरीके से लोगों के मन में पूर्वाग्रह पैदा करना, ताकि अनुकूल जनमत का निर्माण किया जा सके। अमेरिकी लेखक एवं पत्रकार विलियम ब्लम ने कहा था, ‘दुष्प्रचार लोकतंत्र के लिए वैसा ही है, जैसे हिंसा तानाशाही के लिए।’ डॉक्टर जिवागो की कहानी के बारे में शायद बहुत से लोग नहीं जानते होंगे। जब बोरिस पास्तरनाक ने 1956 में शीतयुद्ध के चरम दिनों में अपना उपन्यास डॉक्टर जिवागो  पूरा किया, तो सोवियत अधिकारियों ने रूसी क्रांति के दौरान एक व्यक्तिगत संघर्ष की कहानी पढ़ी और इसे प्रकाशित करने से इन्कार कर दिया। रूसी क्रांति रूस में राजनीतिक और सामाजिक परिवर्तन की अवधि थी, जो 1917 में शुरू हुई थी। अक्तूबर क्रांति पर लेखक के आलोचनात्मक रुख के कारण, डॉक्टर जिवागो  को सोवियत संघ में प्रकाशित करने से मना कर दिया गया था। इतालवी प्रकाशक के कहने पर, पांडुलिपि को मिलान में तस्करी करके लाया गया और 1957 में प्रकाशित किया गया।


पश्चिमी खुफिया एजेंसियों ने जल्द ही प्रचार के एक उपकरण के रूप में इसकी क्षमता को पहचान लिया। अमेरिकी केंद्रीय खुफिया एजेंसी ने महसूस किया कि उपन्यास सोवियत सरकार को शर्मिंदा करने और रूसी नागरिकों को भड़काने का अवसर प्रस्तुत करता है। सीआईए का विचार था कि रूसियों के सामने साम्यवाद को बुरे ढंग से दर्शाया जाए और उन्हें बताया जाए कि पश्चिम का पूंजीवाद बेहतर है। सीआईए द्वारा पुस्तक प्रकाशन के बाद 1965 में एक ब्लॉकबस्टर फिल्म डॉक्टर जिवागो आई। इस मुद्दे को पूरी दुनिया में फैलाने के लिए तत्कालीन अमेरिकी प्रशासन ने न केवल जोर दिया था, बल्कि उसका मौन समर्थन भी था।

भारतीय पुरुष और महिलाएं, विशेषकर महिलाएं पाकिस्तानी नाटकों को बहुत पसंद करती हैं, जो अच्छी तरह से निर्देशित होते हैं और उनकी संस्कृति को सकारात्मक रूप से प्रतिबिंबित करते हैं। चाहे वे आंतरिक रूप से कितने भी टूटे हुए क्यों न हों, आम लोगों को सभ्य दिखाते हैं। वास्तव में लाहौरी पंजाबी और उर्दू लहजे के मिश्रण के साथ वे सभ्य दर्शकों को मंत्रमुग्ध करते हैं। खासकर उत्तर भारतीय दर्शक गहरी सांस लेकर कहते हैं, ‘ये तो अच्छे लोग हैं-बिल्कुल हमारे जैसे’। उनके अभिनेता शानदार हैं और कहानी पारिवारिक जीवन से जुड़ी होती है। आप कल्पना भी नहीं कर सकते कि वे आपके कट्टर दुश्मन हैं और कभी भी बर्बर हो सकते हैं। अगर आपको कोई यह बात कहे भी, तो आप कहते हैं ‘भाई ऐसा हो ही नहीं सकता’। आप सीमा पार हो रही हर घटना, आतंकवाद और हत्याओं के लिए राजनेताओं और पाकिस्तानी सेना को दोषी ठहराते हुए कहते हैं-लोग सब ठीक हैं। जाहिर है, वे बहुत सूक्ष्मता से भारतीय मानस को प्रभावित करने में सफल रहे हैं।

पाकिस्तान ने भारत के खिलाफ दुष्प्रचार में यूट्यूब का भी चतुराई से इस्तेमाल किया। शुरू में इन यूट्यूबरों ने भारत की बेबाकी से प्रशंसा करके भारतीय दर्शकों को आकर्षित करने की कोशिश की। उन्होंने भारत की नीतियों और आर्थिक विकास की प्रशंसा की और यहां तक कि प्रधानमंत्री मोदी और भाजपा की भी प्रशंसा की। उनके कथनों में विभाजन पर खेद की भावनाएं प्रतिध्वनित हुईं, और उन्होंने भारत के आर्थिक उदारीकरण को सराहनीय कदम बताया। इस रणनीतिक दृष्टिकोण के चलते लाखों भारतीय उनके सब्सक्राइबर बने। शिक्षित भारतीयों ने भी पाकिस्तानी युवाओं के ऐसे दुर्लभ समझदार विचारों और विश्लेषणों की सराहना की। इसने दुनिया को यह भी साबित कर दिया कि पाकिस्तान में अभिव्यक्ति की पूरी आजादी है।

पहले तो पाकिस्तान के सुर में अचानक आए इस बदलाव को देखकर हैरानी हुई, क्योंकि वह हमेशा से भारत के प्रति शत्रुतापूर्ण रहा है। इन यूट्यूबरों को भारतीयों ने खुले दिल से अपनाया, जो उनके वीडियो पर भारतीय व्यूज और कमेंट्स की अधिकता से स्पष्ट है। लेकिन समय के साथ उनका मुखौटा उतरने लगा। भू-राजनीति पर ध्यान केंद्रित करने वाले चैनल धीरे-धीरे अपने एजेंडे को आगे बढ़ाने लगे। पाकिस्तान की खस्ता आर्थिक स्थिति को देखते हुए इन यूट्यूबरों ने फिर से भारत के साथ व्यापार शुरू करने की वकालत की, जिसे उनके प्रधानमंत्री इमरान खान ने 2019 में कश्मीर में अनुच्छेद 370 को रद्द करने के विरोध में रोक दिया था। उन्होंने इमरान खान के फैसले की खुलेआम आलोचना की और इसे पाकिस्तान की अर्थव्यवस्था पर पड़ने वाले प्रतिकूल प्रभाव को देखते हुए मूर्खतापूर्ण करार दिया। चाल देखिए! हम सभी इससे हैरान थे कि देखिए, अब उन्हें इसका पछतावा है। लेकिन हालिया बांग्लादेशी संकट में उसके दुष्प्रचार का मुखौटा पूरी तरह उतर गया है। वह हर मंच से भारत को कोसता रहता है। बांग्लादेश उस पाकिस्तान का स्वागत करने और हाथ मिलाने तक के लिए तैयार है, जिसने सिर्फ 50 साल पहले उसके लाखों लोगों का नरसंहार किया था। यही पाकिस्तान का असली रंग हैं। उसके धारावाहिकों पर मत जाइए। वह बगैर ‘संकोच’ के पीठ में छुरा घोंपता है, यही उसकी ‘फितरत’ है। मुझे यकीन है, बहुत से भारतीयों को यह बात पसंद नहीं आएगी, लेकिन जो कहा जाना है, वह कहा ही जाना चाहिए।
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