{"_id":"64f1405343f4e3402d0bf035","slug":"need-of-separate-ministry-to-accelerate-efforts-for-conservation-and-sustainable-development-of-himalayas-2023-09-01","type":"story","status":"publish","title_hn":"मुद्दा: हिमालय को चाहिए अलग मंत्रालय, संरक्षण और टिकाऊ विकास को तभी मिलेगी गति","category":{"title":"Opinion","title_hn":"विचार","slug":"opinion"}}
मुद्दा: हिमालय को चाहिए अलग मंत्रालय, संरक्षण और टिकाऊ विकास को तभी मिलेगी गति
विज्ञापन
निरंतर एक्सेस के लिए सब्सक्राइब करें
सार
आगे पढ़ने के लिए लॉगिन या रजिस्टर करें
अमर उजाला प्रीमियम लेख सिर्फ रजिस्टर्ड पाठकों के लिए ही उपलब्ध हैं
अमर उजाला प्रीमियम लेख सिर्फ सब्सक्राइब्ड पाठकों के लिए ही उपलब्ध हैं
फ्री ई-पेपर
सभी विशेष आलेख
सीमित विज्ञापन
सब्सक्राइब करें
सांकेतिक तस्वीर (फाइल फोटो)
- फोटो :
अमर उजाला
विस्तार
इन दिनों उत्तराखंड और हिमाचल प्रदेश में भारी बारिश और भूस्खलन से हुए जानमाल के भारी नुकसान के कारण एक बार फिर हिमालय पर लोगों का ध्यान गया है। हैरानी की बात यह है कि भारत के लिए जीवन-मृत्यु जैसा महत्वपूर्ण विषय होने के बावजूद हिमालय पर हमारी संसद और केंद्र में आई-गईं सरकारों ने कभी समग्रता से विचार नहीं किया। हिमालयी राज्यों में भूकंप, बाढ़, भूस्खलन जैसी प्राकृतिक अथवा मानव निर्मित आपदाओं और अंतरराष्ट्रीय सीमाओं पर संभावित खतरों को लेकर चर्चा तो होती है, पर इन आपदाओं के कारणों और टिकाऊ विकास को लेकर बहुत कम ही बात हुई।
दुर्भाग्य से हिमालय को छोटे-छोटे राज्यों में बंटी राजनीतिक-प्रशासनिक इकाई मानकर देखा जाता है। यही कारण है कि आज यह विश्व की सबसे युवा पर्वत शृंखला इतिहास के सबसे गंभीर संकट से गुजर रही है। यह बात सिर्फ विशेषज्ञ ही नहीं, आम लोग भी जानते हैं कि हिमालय से हमारा अस्तित्व जुड़ा हुआ है। यदि हिमालय संकटग्रस्त रहा, तो मनुष्य ही नहीं, बल्कि प्राणी मात्र का जीवन खतरे में आ जाएगा।
भारत में करीब ढाई हजार किलोमीटर की लंबाई में फैले छह लाख वर्ग किलोमीटर क्षेत्रफल को स्वतंत्रता के बाद से लगभग उपेक्षित रखा गया। उस समय की केंद्र सरकारों की प्राथमिकता में हिमालय कहीं भी परिलक्षित नहीं होता था। यहां तक कि योजना आयोग ने पर्वतीय क्षेत्र की विशिष्ट आवश्यकताओं का ध्यान रखने की चिंता कभी नहीं की। 12वीं पंचवर्षीय योजना में कुछ सांसदों के दबाव में आकर पहली बार हिमालय क्षेत्र को समर्पित एक वर्किंग ग्रुप का गठन किया गया था।
बीते महीनों में हिमाचल प्रदेश और उत्तराखंड में भारी बारिश, बाढ़ व भूस्खलन के कारण सैकड़ों मनुष्यों, पशु-पक्षियों और कई हजार वृक्षों समेत भारी क्षति हुई। सड़कों का बहुत बड़ा नेटवर्क ध्वस्त हो गया। इस विनाश से एक बात तो स्पष्ट हो गई कि व्यापक नीतियों के अभाव में हमने हिमालयी क्षेत्र को मौसम की मार, मानव निर्मित खतरों और संभावित भूकंप से नष्ट होने के लिए बेसहारा छोड़ दिया है।
गौरतलब है कि अटल बिहारी वाजपेयी की सरकार ने वर्ष 2001 में पहली बार पूर्वोत्तर क्षेत्र विकास मंत्रालय का गठन किया था। हिमालय के पूर्वोत्तर भाग में इससे विकास की एक किरण चमकी थी। यह मंत्रालय 2014 में केंद्र में आई नरेंद्र मोदी सरकार की नीतियों के कारण समूचे पूर्वोत्तर में महत्वपूर्ण भूमिका निभा रहा है। लेकिन संपूर्ण हिमालयी क्षेत्र के लिए कोई एकीकृत नीति व दृष्टिकोण न होने के कारण विकास के नाम पर जो कुछ भी हुआ या हो रहा है, उसने हिमालय के लिए चुनौतियां खड़ी कर दी हैं।
अनेक अध्ययनों से पता चला है कि हिमालयी क्षेत्र के ग्लेशियरों का आकार कम हो रहा है। पहाड़ों पर अब बर्फ कम गिरती है और तेजी से पिघलते ग्लेशियर बाढ़ का कारण बनते हैं। अवैज्ञानिक ढंग से बनाए जा रहे फोर-लेन राष्ट्रीय राजमार्ग पहाड़ों पर भीषण तबाही का खौफनाक दृश्य पेश करते हैं। हाल ही में कालका से शिमला के बीच राष्ट्रीय राजमार्ग पर भूस्खलन और उससे हुए व्यापक नुकसान का मुख्य कारण यही है। कुल्लू जिले में बारिश से ताश के पत्तों की तरह ढह गईं बहुमंजिला इमारतें साफ बताती हैं कि पहाड़ों को किस दिशा में धकेला जा रहा है। हिमालयी राज्यों में बेरोजगारी, बढ़ती गरीबी, अंतरराष्ट्रीय सीमा से सटे गांवों से पलायन जैसी समस्याएं रेखांकित करती हैं कि प्राकृतिक संसाधनों से मालामाल होने के बावजूद यहां संतुलित व स्वस्थ विकास की नीतियों का अभाव है।
भाजपा ने 2014 के अपने चुनावी घोषणापत्र में हिमालय को लेकर भी कई वायदे किए थे। कहा गया था कि पार्टी हिमालयी क्षेत्र के संरक्षण हेतु चेतना जागृत करने के लिए गंभीर प्रयास करेगी। कुछ स्तर पर काम शुरू भी किया गया है। लेकिन हिमालयी क्षेत्र को एक जीवंत इकाई मानकर चलने की बजाय यहां अलग-अलग राज्यों, केंद्रीय मंत्रालयों और विभागों के माध्यम से कार्य होता है। इनमें आपस में समन्वय की भारी कमी है। इसलिए हिमालय के संरक्षण व टिकाऊ विकास के प्रयासों को तेज करने और उन्हें प्रभावी बनाने के लिए अलग मंत्रालय बनाना समय की आवश्यकता है। पूर्वोत्तर विकास मंत्रालय को हिमालय विकास मंत्रालय में परिवर्तित कर उसके दायरे में संपूर्ण हिमालय क्षेत्र को लाया जा सकता है। अन्यथा टुकड़ों में बंटा हिमालय मानव जाति के लिए चिंता का विषय बना रहेगा।
-लेखक वरिष्ठ पत्रकार एवं पूर्व प्रोफेसर हैं।