आरक्षण पर श्वेतपत्र की जरूरत
निरंतर एक्सेस के लिए सब्सक्राइब करें
अक्सर चुनाव का समय आते ही प्रमुख राजनेताओं में आंबेडकर को भारत के सबसे बड़े निर्माताओं में से एक बताने की होड़ लग जाती है। वे टीवी कैमरों के सामने जमीन पर बैठकर और दलित बस्तियों में खाना खाकर दलितों के प्रति अपने प्यार का प्रदर्शन करते हैं। लेकिन इससे अलग अस्पृश्यता अब भी जीवित है और ऊना में दलित युवाओं की बेरहमी से पिटाई जैसे बर्बर उदाहरण हजारों गांवों में देखने को मिलते हैं। वर्ष 2017 में एनसीआरबी द्वारा आधिकारिक रूप से दलितों के खिलाफ हमले के 47,000 से ज्यादा मामले दर्ज किए गए, जिनमें से अकेले उत्तर में 11,440 मामले दर्ज किए गए। पर ये घटनाएं हमें शर्मिंदा नहीं करती हैं! जानबूझकर नियमित रूप से सरकारी सेवाओं में वितरण की कमी, अयोग्यता और विफलता का दोष आरक्षण नीति पर मढ़ा जाता है। क्या यह इन मुद्दों पर ईमानदार और निष्पक्ष बहस का समय नहीं है?
अमर उजाला प्रीमियम लेख सिर्फ रजिस्टर्ड पाठकों के लिए ही उपलब्ध हैं
अमर उजाला प्रीमियम लेख सिर्फ सब्सक्राइब्ड पाठकों के लिए ही उपलब्ध हैं
आजादी के बाद से दलितों की समग्र स्थितियों का एक उद्देश्यपूर्ण मूल्यांकन यह संकेत देगा कि वे पहले के मुकाबले आज निरंतर जारी भेदभावों, अत्याचारों और बलात्कारों के हजारों उदाहरणों के बावजूद बेहतर स्थिति में हैं। लेकिन प्रगति की रफ्तार धीमी और आंशिक है, हालात इससे बेहतर हो सकते थे, अगर एक के बाद एक आने वाली सरकारों द्वारा घोषित कल्याणकारी नीतियां पूरी तरह और निर्धारित समय में लागू की जातीं। आधे-अधूरे मन से योजनाओं के क्रियान्वयन का दोष केंद्र और राज्य सरकारों को जाता है। दलितों के निर्वाचित प्रतिनिधि भी ऐसा करने के लिए सरकार पर पर्याप्त दबाव नहीं डालने के लिए खुद को दोषमुक्त नहीं कर सकते।
हालांकि चुपचाप पीड़ा सहना, विनम्र रहना और अन्याय व जुल्म के खिलाफ विरोध नहीं करना दलितों के लिए विकल्प नहीं है, पर जानबूझकर टकराव मोल लेना भी उचित नहीं है, इससे कोई फायदा नहीं होगा। दलितों की सबसे बड़ी ताकत उनकी संख्यात्मक ताकत है। अगर आंतरिक विभाजन, अहं के टकराव और प्रेरणादायक नजरिये की कमी से यह बेकार में नष्ट न हो, तो सकारात्मक बदलावों को बल देने और राजनीतिक व सामाजिक बदलावों को गति देने के लिए शक्तिशाली हथियार हो सकता है। मगर अफसोस कि अधिकांश दलित नेताओं ने खुद को राजनीतिक दलों का दलित चेहरा होने तक सीमित कर लिया है, वे अपने राजनीतिक आकाओं का गुणगान करते हैं और मंत्री पद पर झपट रहे हैं। वे गरीबी और अविकास के दलदल में फंसे अपने लाखों भाई-बहनों के जीवन स्तर में सुधार के लिए इसका फायदा उठाने में विफल रहे हैं। यह असहज करने वाला सच है कि संसद और विधानसभा में आरक्षण नहीं होता, तो मायावती और रामविलास पासवान वहां नहीं पहुंच पाते! इसी तरह से आरक्षण के बिना सिविल सेवा की परीक्षा में टीना डाबी शायद ही सर्वोच्च स्थान हासिल कर पातीं।
जाहिर है, सकारात्मक प्रावधानों ने दलितों के उत्थान में मदद की है और भविष्य में भी ऐसे प्रावधान को जारी रखा जाना चाहिए। यह स्वीकार नहीं करना बेईमानी होगी कि आरक्षण नीति से दलितों के खिलाफ काफी कड़वाहट पैदा हुई है। किसी अनुभवजन्य अध्ययन और किसी की सच्ची योग्यता को परिभाषित किए बिना कुछ लोग सार्वजनिक रूप से घोषणा करते हैं कि आरक्षण नीति भारत के पचास खरब डॉलर की अर्थव्यवस्था बनने में एक बड़ी चुनौती है! अगर ऐसा है, तो दशकों से व्यापक आरक्षण नीति वाले तमिलनाडु और कर्नाटक उत्तर प्रदेश और बिहार की तुलना में कैसे बेहतर ढंग से प्रशासित राज्य हैं? क्या शैक्षणिक अंक सच्ची योग्यता दर्शाते हैं? क्या अंक केंद्रित मेरिटोक्रेसी (प्रतिभा आधारित व्यवस्था) एक मिथक नहीं है? अनुसूचित जाति / जनजाति के उम्मीदवार जो आईएएस / आईएफएस / आईपीएस / केंद्रीय सेवाओं में आरक्षण के माध्यम से शामिल होते हैं, और बाद में बिना किसी भेदभाव के अपने बच्चों को पब्लिक स्कूलों में भेजने में सक्षम होते हैं, उन्हें अपनी अगली पीढ़ी को आरक्षण की बैसाखी के बिना प्रतिस्पर्धा करने के लिए प्रोत्साहित करना चाहिए। वर्षों बाद इस प्रक्रिया से आरक्षण नीति के खिलाफ सामाजिक कटुता कम होगी। शिक्षा सशक्तीकरण का सबसे उत्तम औजार है, इसलिए शिक्षण संस्थानों में आरक्षित सीटों को बनाए रखना चाहिए। उन संस्थानों के प्रमुखों को सजा होनी चाहिए, जहां दलित छात्रों के साथ भेदभाव होता है।
सरकार को सत्यापित जानकारियों के साथ एक श्वेतपत्र लाना चाहिए कि आजादी के बाद नौकरियों / विश्वविद्यालयों /कॉलेजों में अनुसूचित जाति / जनजाति के लिए कितनी सीटें आरक्षित हैं और उनमें से कितनी सीटें अभी खाली हैं। लंबे समय से खाली पदों को आपातकालीन भर्तियों के जरिये भरा जाना चाहिए। पिछले तीस वर्षों में दलितों के खिलाफ हुए हमले के आधिकारिक रूप से दर्ज मामलों को इसमें शामिल करना चाहिए। यदि किसी आईएएस/आईपीएस अधिकारी के कार्यकाल में दो बार दलितों के खिलाफ अत्याचार होता है, तो उसे निलंबन के बजाय सेवा से बर्खास्त कर देना चाहिए। अगर सरकार गंभीरता से चाहती है कि लोग नौकरी खोजने वाले के बजाय नौकरी देने वाले बनें, तो उसे उन दलित युवाओं को कर्ज देना चाहिए, जो अपने पारंपरिक पेशे से अलग छोटे और मध्यम दर्जे के उद्योग शुरू करना चाहते हैं। इसके लिए सांसदों और कॉरपोरेट जगत को भी प्रेरित किया जा सकता है।
आमतौर पर केंद्र में करीब 43 सचिवों में से अनुसूचित जाति/जनजाति के मुश्किल से एक से अधिक सचिव होते हैं। केंद्र में कम से कम दस सचिव अनुसूचित जाति/जनजाति से होने चाहिए। अगर वरिष्ठ नौकरशाह अपने जातिवादी पूर्वाग्रहों को छोड़ दें, तो योग्य लोगों की कमी नहीं है। आज जब हम महात्मा गांधी की 150वीं जयंती मना रहे हैं, तो क्यों नहीं केंद्र सरकार को अगले पांच वर्षों में अस्पृश्यता, बंधुआ मजदूरी, बाल श्रम और दलितों के खिलाफ अत्याचार को मिटाने का संकल्प लेना चाहिए? जो लोग आरक्षण जारी रहने पर सवाल उठाते हैं, उनसे पूछा जाना चाहिए कि 2000 वर्षों से जाति व्यवस्था और दलितों के खिलाफ अन्याय क्यों जारी है। चाहे हम मानें या नहीं, दलितों के लिए सकारात्मक नतीजे अनुसूचित जाति/जनजाति के सांसदों की सक्रियता, एकजुटता और निरंतर प्रयासों के बिना संभव नहीं है। अगर 85 सांसद दलगत भावना से ऊपर उठकर कार्रवाई की मांग करें, तो कोई भी सरकार उनकी अनदेखी नहीं कर सकती। लेकिन क्या वे कभी एकजुट होंगे?