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नाटो: मुख्य मकसद सदस्य देशों की सुरक्षा-स्वतंत्रता को सहेजना; इसका आधार अंतरराष्ट्रीय व्यवस्था और जनादेश बने
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नाटो (फाइल)
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विस्तार
अपनी स्थापना की 75वीं वर्षगांठ पर उत्तरी अटलांटिक संधि संगठन (नाटो) के समक्ष यूरोप के कुछ देशों द्वारा गंभीर आलोचना और दक्षिणपंथी राष्ट्रवादी आंदोलनों के प्रसार से निपटने की प्रमुख चुनौती है। इसलिए नाटो को 21वीं सदी में प्रासंगिक बने रहने के लिए सतर्क और संतुलित दृष्टिकोण अपनाने की जरूरत है।
भारतीय परिप्रेक्ष्य में विशेषज्ञों का कहना है कि चीनी आक्रामकता से निपटने के लिए इस संगठन में शामिल होने के अमेरिकी प्रस्ताव को भारत पहले ही ठुकरा चुका है, क्योंकि भारत ऐसी किसी भी परिस्थिति का सामना करने में खुद सक्षम है। इसलिए उसे नाटो की सहायता की जरूरत नहीं है। अगर भारत नाटो का हिस्सा बनता है, तो उसे अमेरिका को सैन्य अड्डा स्थापित करने की मंजूरी देनी होगी, जो अस्वीकार्य है। ऑस्ट्रेलिया, इस्राइल, जापान और दक्षिण कोरिया जैसे अमेरिकी सहयोगियों ने सैन्य अड्डे स्थापित करने की अनुमति दे दी है, लेकिन भारत अपनी संप्रभुता का उल्लंघन करने और वैश्विक जगत में अपनी स्थिति को कमजोर करने की अनुमति नहीं दे सकता है। भारत अपनी रणनीतिक स्वायत्तता बनाए रखते हुए रूस के साथ वर्षों पुराने भरोसेमंद रिश्तों को खराब नहीं करेगा, जिसकी अमेरिका और उसके सहयोगियों के साथ यूक्रेन युद्ध के बाद संघर्ष जैसी स्थिति है। दरअसल अमेरिका की संसदीय समिति ने सिफारिश की थी कि चीन से सीमाओं की रक्षा करने और हिंद-प्रशांत क्षेत्र में
चीनी आक्रामकता का सामना करने के लिए नाटो को मजबूत करना चाहिए।
नाटो में 32 सदस्य देश हैं। इसके अलावा पांच देश-जापान, न्यूजीलैंड, इस्राइल, ऑस्ट्रेलिया और दक्षिण कोरिया भी इससे जुड़े हैं। इन सभी देशों को आपसी भरोसा और बेहतर सहयोग के लिए अपनी रक्षा क्षमता और सुरक्षा व्यवस्था को बढ़ाना चाहिए। दूसरा, नाटो की सैन्य क्षमता को अमेरिकी हथियार और औजार की तरह देखा जाता है, जिसका इस्तेमाल वह राष्ट्रों पर अपना प्रभुत्व जमाने के लिए करता है, भले ही उन देशों के ऊपर कोई सैन्य संकट न भी हो। दरअसल नाटो की स्थापना के इन 75 वर्षों में अमेरिकी सर्वोच्चता की धारणा को दूर करने की जरूरत महसूस की जा रही है। इस दौरान नाटो ने दुनिया भर में करीब 200 सैन्य हस्तक्षेप किए हैं, जिससे उसकी विश्वसनीयता खतरे में है। इनमें से बीस ऐसे मामले रहे, जिनके परिणाम संदिग्ध रहे, जैसे अफगानिस्तान में आतंकवाद का मुकाबला, सीरिया में गैर-कानूनी हस्तक्षेप, इराक पर आक्रमण, यूगोस्लाविया पर बमबारी, लीबिया को बर्बाद करना और आईएसआईएस का निर्माण। तीसरा, नाटो के महासचिव लेंस स्टोलनबर्ग ने यूक्रेन को पांच वर्ष तक सैन्य सहायता देने के लिए 100 अरब डॉलर के सहायता पैकेज का प्रस्ताव रखा।
आशंका है कि यदि 2024 के राष्ट्रपति चुनाव में ट्रंप जीतते हैं, तो वे इस सहायता को रोक सकते हैं, क्योंकि वह पहले ही स्पष्ट कर चुके हैं कि वह अपने देश को इस तरह के संघर्षों से दूर रखना चाहते हैं। साथ ही उनको पुतिन समर्थक भी माना जाता है, जो नाटो को परेशान कर सकता है। विशेषज्ञों का मानना है कि उक्त प्रस्ताव को आगामी वॉशिंगटन बैठक में मंजूरी मिल जाएगी, ताकि यूक्रेन में रूस की आक्रामकता का मुकाबला किया जा सके।
विदेश नीति के विशेषज्ञों का मानना है कि नाटो को अपने सहयोगियों को अपरंपरागत खतरों, जैसे आतंकी हमला, भ्रामक प्रचार अभियान, साइबर हमले, आपूर्ति शृंखलाओं को बाधित करने के जोखिमों, आदि से बचाना होगा, अन्यथा यह अपनी साख और प्रभाव खो देगा। दूसरा, नाटो को व्यापक रणनीति अपनानी होगी और यह तभी होगा, जब वह अपनी सैन्य क्षमताओं को मजबूत करने के साथ अंतरराष्ट्रीय संगठनों से खुद को जोड़ेगा। तीसरा, इसे ऐसा तंत्र बनाना चाहिए, जिससे सदस्य देशों के बीच परस्पर सहयोग और एकता की भावना बनी रहे। आम सहमति संगठन का मुख्य उद्देश्य होनी चाहिए, जो आपसी चर्चा, संवाद, एकीकृत योजना और राजनीतिक गठबंधन जैसे आवश्यक घटकों द्वारा निर्देशित हो। चौथा, इसकी पांच मुख्य नीति निर्माण समितियों के बीच समन्वय में सुधार के अलावा आपसी विश्वास और आंतरिक तालमेल बनाने के लिए पारदर्शिता अनिवार्य है।
संगठन की सफलताएं और विफलताएं साथ चलती हैं, लेकिन प्रमुख शक्तियों के बीच संघर्ष फैल रहा है और भविष्य में मुठभेड़ें हो सकती हैं, जिसका कारण राज्य की बढ़ती कमजोरी और खतरों का फैलना है, जिससे विश्व व्यवस्था में गड़बड़ी हो सकती है। वैश्विक जोखिम रिपोर्ट ने वैश्विक जोखिम धारणा सर्वेक्षण (जीआरपीएस) के निष्कर्षों को 1,500 वैश्विक विशेषज्ञों के विश्लेषण के रूप में पेश किया है, जिन्होंने मौजूदा संकटों को संतुलित करने के लिए जिम्मेदार निर्णयों के पीछे के मस्तिष्क का समर्थन करने के लिए वैश्विक जोखिमों और दीर्घकालिक नीतियों के साथ-साथ प्राथमिकताओं की भी जांच की है।
नाटो की प्रमुख विफलताओं में से एक सदस्य देशों के रक्षा मंत्रियों द्वारा 2006 में सुरक्षा संबंधी व्यय के लिए सहमति के बावजूद जीडीपी के दो फीसदी धन का आवंटन न होना है, खासकर तब, जब अमेरिका गठबंधन के खर्च का दो तिहाई हिस्सा लेता है, जिसे संगठन के अन्य देशों द्वारा साझा किया जाना चाहिए। नाटो ने शीत युद्ध के दौरान साम्यवाद को प्रतिबंधित करने, उग्र राष्ट्रवाद को खत्म करने और सोवियत संघ को नियंत्रित करने पर ध्यान केंद्रित किया था। लेकिन अब शीतयुद्ध के बाद स्थिति अस्थिर हो गई है, क्योंकि रूस पड़ोसियों पर कब्जा कर रहा है, जो अन्य छोटे देशों के लिए खतरा है।
विशेषज्ञों का मानना है कि अपनी 75वीं वर्षगांठ मना रहे नाटो के लिए यह समय परीक्षा की घड़ी की तरह है, जिसे अपने सदस्य देशों की सुरक्षा और स्वतंत्रता के मुख्य उद्देश्य की रक्षा करनी है, जो सैद्धांतिक रूप से अंतरराष्ट्रीय व्यवस्था और जनादेश पर आधारित होना चाहिए। लेकिन ट्रंप यदि राष्ट्रपति पद का चुनाव जीतते हैं, तो यह नाटो के अस्तित्व के लिए खतरनाक होगा। इससे पुतिन जैसे आक्रामकों को प्रोत्साहन मिलेगा और भविष्य में ताइवान पर कब्जा करने की चीन की अति महत्वाकांक्षी विस्तार नीति को बढ़ावा मिलेगा। डोनाल्ड ट्रंप पुतिन को यूक्रेन पर हमले जारी रखने के लिए प्रोत्साहित कर सकते हैं, जो यूरोप की सुरक्षा को खतरे में डाल देगा।