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जानना जरूरी है: मोह के कारण ब्राह्मण बना तोता, महर्षि च्यवन के पूर्वजन्म के वृत्तांत से जुड़ी कथा क्या?
सार
ज्ञान व वैराग्य को भूलकर ब्राह्मण अपने तोते की याद में रोता रहता था। मृत्यु के समय भी उसके मन में उसकी ही भावना थी। इसी कारण उसे तोते की योनि प्राप्त हुई।
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ज्ञान व वैराग्य को भूलकर ब्राह्मण अपने तोते की याद में रोता रहता था।
- फोटो : अमर उजाला प्रिंट-ग्राफिक्स
विस्तार
एक दिन महर्षि च्यवन ने कुंजल नामक शुक पक्षी से पूछा, ‘क्या आप कोई देवता, गंधर्व या विद्याधर हैं, जो पक्षी की योनि में रहते हुए भी इतना गहन ज्ञान रखते हैं? आपको यह दिव्य दृष्टि कैसे प्राप्त हुई और किस शाप के कारण आपको तोते के रूप में जन्म लेना पड़ा?’ कुंजल ने महर्षि च्यवन को अपने पूर्वजन्म का वृत्तांत सुनाना आरंभ किया।
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वह कश्यप गोत्र में उत्पन्न विद्वान ब्राह्मण विद्याधर का सबसे छोटा पुत्र धर्मशर्मा था। उसके दोनों बड़े भाई वेद-शास्त्रों के ज्ञाता और सदाचारी थे, लेकिन धर्मशर्मा को पढ़ने-लिखने में कोई रुचि नहीं थी। वह गुरु के आश्रम में जाकर परिश्रम करने के बजाय स्वतंत्रतापूर्वक खेलने, खाने और सोने को ही सुख मानता था।
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पिता ने उसे बार-बार समझाया कि विद्या आरंभ में कठिन अवश्य लगती है, पर वही सुख, यश, ज्ञान व मुक्ति का मार्ग प्रशस्त करती है। फिर भी, धर्मशर्मा ने उनकी बात नहीं मानी। जब लोग उसका उपहास करने लगे और उसे अपनी अज्ञानता का बोध हुआ, तब तक उसकी आयु काफी बढ़ चुकी थी। अब वह सोचने लगा कि इस अवस्था में कौन उसे विद्या सिखाएगा और वह ज्ञान कैसे प्राप्त करेगा।
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एक दिन वह इसी चिंता में डूबा एक देवालय में बैठा था। तभी वहां एक सिद्ध महात्मा आए। धर्मशर्मा ने उनके चरणों में प्रणाम करके अपनी मूर्खता और अज्ञान का पूरा वृत्तांत सुनाया तथा उनसे सर्वज्ञता प्राप्त करने का उपाय पूछा। महात्मा ने समझाया कि वास्तविक ज्ञान का कोई भौतिक आकार नहीं होता।
वह परमात्म तत्व का स्वरूप है, जो समस्त प्राणियों के हृदय में विद्यमान रहता है। इंद्रियों और बाहरी साधनों से उसका पूर्ण साक्षात्कार नहीं हो सकता; वह विवेक, आत्मचिंतन और भगवत तत्व के मनन से प्रकट होता है। जब मनुष्य कामना, मोह और इंद्रिय-विषयों की आसक्ति को त्यागकर शांति धारण करता है, तब उसके भीतर ज्ञान का प्रकाश फैलने लगता है।