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जातिगत आरक्षण का मिथक

Thu, 11 May 2017 12:03 PM IST
सुरेंद्र कुमार
सुरेंद्र कुमार Updated Thu, 11 May 2017 12:03 PM IST
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Myth & misinformation about caste based Reservations
सुरेंद्र कुमार

यह एक खुला रहस्य है कि सियासी मजबूरियों के चलते राजनीतिक पार्टियां ऐसे काम भी करती हैं, जिन्हें वे दिल से पसंद नहीं करतीं। उदाहरण के लिए, दलित वोटों के महत्व को देखते हुए 2019 में अपनी राजनीतिक आकांक्षाओं को पूरा करने के लिए इस वर्ष 14 अप्रैल को प्रमुख राजनीतिक दलों में डॉ अंबेडकर को अपनाने और यह बताने की भी होड़ लगी थी कि उनकी पार्टी ने उन्हें कितना सम्मान दिया तथा भारत के लिए उनका योगदान कितना बड़ा था। अचानक बाबा साहब की इतनी प्रशस्ति क्या मर्मभेदी नहीं है?

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योग्यता और उत्कृष्टता के स्वयंभू संरक्षक कभी यह नहीं बताते कि सामाजिक रूप से वंचित वर्गों के लिए आरक्षण नीति अंबेडकर ने मात्र दस वर्षों के लिए प्रस्तावित की थी। वे शासन में विफलता और प्रगति की कमी के लिए आरक्षण व्यवस्था को जिम्मेदार ठहराते हैं और इसे खत्म करने की वकालत करते हैं, क्योंकि माना जाता है कि यह व्यवस्था प्रतिभा को तरजीह नहीं देती और समाज को बांटकर जाति व्यवस्था को मजबूत करती है। इस नीति से वास्तव में जरूरतमंदों को फायदा नहीं हुआ है; इसका फायदा कुछ ही जातियों को मिला है, जिनके लाभार्थियों को उसका स्थायी हकदार माना जाता है और जो उत्कृष्टता और प्रतिस्पर्धा की कोशिश नहीं करते हैं, बल्कि उसके लिए संघर्ष करते हैं। जाहिर है, वे निजी क्षेत्र में नौकरियों के लिए आरक्षण को अनिवार्य बनाए जाने के सुझाव का विरोध करते हैं, इसके बजाय वे दूसरों की बराबरी करने में सक्षम बनाने के लिए वंचितों को बेहतर शिक्षा सुविधा, क्षमता निर्माण और कौशल विकास की सिफारिश करते हैं। ठोस से लगने वाले ये तर्क कई बुनियादी खामियों से ग्रस्त हैं और भारतीय समाज में मौजूद जमीनी वास्तविकताओं की अनदेखी करते हैं। जब तक बुनियादी सामाजिक और मनोवैज्ञानिक कारकों पर खुले मन से, निष्पक्ष चर्चा नहीं की जाती, तब तक  ईमानदार, निष्पक्ष, तर्कसंगत और न्यायसंगत दृष्टिकोण असंभव है।
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अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजातियों (एससी/एसटी) के लिए दस वर्षों के आरक्षण का सांविधानिक प्रावधान करते हुए हमारे संविधान निर्माता मूल रूप से दो मामलों में चूक गए। उन्होंने वंचित वर्गों की असमर्थता की गहराई और उसके विस्तार को कम करके आंका और उच्च जातियों की सदाशयता और सहयोगी भावना का वास्तविकता से अधिक मूल्यांकन किया। क्या पांच हजार वर्षों से बुनियादी मानवाधिकारों (जिसमें संपत्ति, शिक्षा, मानवीय गरिमा का हक शामिल है) से वंचित वर्गों की असमर्थता को 60 वर्षों में दूर किया जा सकता है? जिन लोगों ने समाज में अपनी पकड़ बनाए रखने और अपना वर्चस्व सुनिश्चित करने के लिए उन्हें इस हद तक वंचित रखा, क्या वे आरक्षण के लाभार्थियों को गले लगा सकते हैं? इसका जवाब है नहीं!
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गणतंत्र बनने के सड़सठ वर्षों बाद लोकसभा में एससी/एसटी के पांच भी ऐसे सदस्य नहीं है, जो गैर आरक्षित सीटों चुनाव जीतकर आए हों। क्यों? अगर उन्हें सामान्य सीटों से चुनाव लड़ाया जाता, तो उन्हें कौन वोट देता? क्या मानसिकता में परिवर्तन के बिना कोई प्रबुद्ध समाज विकसित हो सकता है या गहरे भेदभाव वाले जातिगत पूर्वाग्रहों को छोड़ सकता है?

समय की मांग है कि आरक्षण नीति का गंभीर, पारदर्शी, पेशेवर, निष्पक्ष और समयबद्ध मूल्यांकन किया जाए और इसके सामाजिक और आर्थिक प्रभाव तथा योग्यता पर इसके कथित नकारात्मक प्रभाव पर एक श्वेत पत्र लाया जाए। उम्मीद है कि इसका निष्कर्ष आरक्षण नीति से संबंधित गलत सूचनाओँ और मिथकों को खत्म कर देगा।

कार्मिक एवं प्रशिक्षण विभाग की एक रिपोर्ट के मुताबिक, इतने वर्षों से जारी आरक्षण नीति के बावजूद ग्रेड वन सेवा में एससी/एसटी की कुल क्षमता मुश्किल से पांच फीसदी तक पहुंचती है, जबकि देश की कुल आबादी में उनका अनुपात क्रमशः चौदह और सात फीसदी है। हैरानी नहीं कि ज्यादातर समय केंद्र में एससी/एसटी के एक से ज्यादा सचिव नहीं रहे हैं और कभी-कभी तो एक भी नहीं!

देश में उपलब्ध कुल नौकरियों में से मात्र 3.5 फीसदी पदों पर ही सरकार भर्ती करती है। हर साल प्रशासनिक सेवा के पांच लाख उम्मीदवारों में से सरकार मात्र 1,500 अभ्यर्थियों की ही भर्ती करती है। इस प्रकार 4,85,000 उम्मीदवार बेरोजगार रह जाते हैं। ऐसा ही राज्य सरकारों की सेवाओं में होता है। यदि आज सकारात्मक नीतियों (आरक्षण) को खत्म कर दिया जाए, तो उससे नौकरियां बढ़ेंगी नहीं! क्या यह विडंबना नहीं है कि भारत में जो सामाजिक समावेशन की नीति लागू है, वह कुछ बेहद बदनाम राजनेताओं के प्रयासों का परिणाम है। योग्यता की वकालत करने वाले कट्टरतापूर्वक सामाजिक समावेशन का विरोध करते रहे हैं, क्योंकि यह उनकी विशिष्टता की बुनियाद पर चोट करता है।

तर्क दिया जाता है कि आरक्षण का लाभ पाने वाले उसे हल्के में लेते हैं और उत्कृष्टता के लिए प्रयास नहीं करते, पर यह बिल्कुल गलत सूचना है! एससी/एसटी वर्ग के लोग अपने बच्चों को बेहतर शिक्षा देना चाहते हैं, ताकि उनके बच्चों को वैसी मुश्किलों का सामना न करना पड़े, जिनका सामना उन्होंने किया और वे आत्मविश्वास के साथ दूसरों से प्रतिस्पर्धा कर सकें। कई एससी / एसटी सिविल सेवकों ने स्वेच्छा से अपने बच्चों के लिए आरक्षण संबंधी रियायत छोड़ दी। जातिगत पूर्वाग्रह और नफरत सदियों पुरानी सामंती मानसिकता से पैदा होती है, इन्हें सिर्फ आर्थिक उपायों से हटाया नहीं जा सकता। इसके लिए सामाजिक समावेशन का अभियान चलाए जाने की जरूरत है।

  
नवीनतम तकनीकी उपकरणों के साथ शिक्षण/ प्रशिक्षण सुविधाओं में विस्तार एवं भारी संख्या में रोजगार सृजन के बिना भारत प्रगति नहीं कर सकता। यदि आधी आबादी गरीब और पिछड़ी रहेगी, तो यह प्रगति नहीं कर सकता। आज की जरूरतों को पूरा करने के लिए योग्यता की नई परिभाषा गढ़नी होगी। 

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