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आजादी का अमृत महोत्सव: गांधी की नैतिक शक्ति और चर्चिल; वैचारिक जंग में एक व्यवहार की जीत

Mon, 14 Aug 2023 06:30 AM IST
सुशीला रामास्वामी सुब्रत मुखर्जी एवं सुशीला रामास्वामी
सुब्रत मुखर्जी एवं सुशीला रामास्वामी Published by: सुशीला रामास्वामी Updated Mon, 14 Aug 2023 06:30 AM IST
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सार
गांधी का विकास ज्यादा असाधारण था, क्योंकि उन्होंने अपने राजनीतिक जीवन की शुरुआत ब्रिटिश साम्राज्य में विश्वास रखने वाले के रूप में की थी, लेकिन फिर न केवल भारतीय उपमहाद्वीप में, बल्कि एशिया और अफ्रीका में भी वह इसके सबसे बड़े और मजबूत विरोधी के रूप में उभरे।
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Moral Power of Gandhi and Churchill; victory of behavior in ideological war
महात्मा गांधी और चर्चिल। - फोटो : अमर उजाला

विस्तार

महात्मा गांधी पश्चिम और दक्षिण अफ्रीका में राजनीतिक रूप से परिपक्व हुए। जबकि ब्रिटिश साम्राज्य के प्रति चर्चिल का भरोसा इंडिया ऑफिस से उनके जुड़ाव और सेना में सक्रिय सेवा सहित विभिन्न पदों पर रहते हुए भारत और दक्षिण अफ्रीका की यात्राओं में दृढ़ हुआ। गांधी जी गुजरात के एक छोटे से मुफस्सिल शहर से ताल्लुक रखते थे, जहां स्थानीयता प्रचलित थी और जो 1857 की क्रांति के प्रभाव से बहुत दूर थी, जिसे प्रथम स्वतंत्रता संग्राम माना जाता है।चर्चिल एक शक्तिशाली कुलीन परिवार से थे। उनका जन्म 1867 के रिफॉर्म ऐक्ट के पारित होने के चरम दौर में हुआ था, जब मुक्त व्यापार को अर्थव्यवस्था के मूलाधार के रूप में स्वीकार किया गया था, और बेजोड़ नौसैनिक शक्ति के साथ अब तक के सबसे बड़े साम्राज्य को बनाए रखने की आवश्यकता के मद्देनजर ब्रिटेन में सर्वसम्मति की राजनीति सामने आई थी।



गांधी का विकास ज्यादा असाधारण था, क्योंकि उन्होंने अपने राजनीतिक जीवन की शुरुआत ब्रिटिश साम्राज्य में विश्वास रखने वाले के रूप में की थी, लेकिन फिर न केवल भारतीय उपमहाद्वीप में, बल्कि एशिया और अफ्रीका में भी वह इसके सबसे बड़े और मजबूत विरोधी के रूप में उभरे। वह उपनिवेशवाद को उसकी तमाम क्रूरताओं और अमानवीयता के साथ समाप्त करने के लिए प्रेरक बने, जिसे हेरोल्ड मैकमिलन ने 1960 में प्रिटोरिया में अपने ऐतिहासिक संबोधन में 'परिवर्तन की बयार' कहा था।


चर्चिल अपने पिता रैनडोल्फ की तरह, जो 1885 में भारत के राज्य सचिव थे, भारत में ब्रिटिश शासन के लाभकारी पक्ष में विश्वास करते थे। ब्रिटेन के पास 2.3 करोड़ भारतीयों को ऊपर उठाने के लिए अपने ज्ञान, कानूनों और उच्च सभ्यता का उपयोग करने का एक विशिष्ट मिशन था। भारत ब्रिटेन के लिए उतना ही महत्वपूर्ण था, जितना कि ब्रिटेन भारत के लिए था। चर्चिल का मानना था कि अंधविश्वासों और बर्बरता के कारण भारत कभी मुक्तिदायक विचारों का अनुभव नहीं करेगा, यही कारण है कि इसे स्वतंत्र उपनिवेश का दर्जा नहीं मिला था। उन्होंने जाति व्यवस्था पर हमला किया और उस गिरावट की ओर इशारा किया, जो अनेक हिंदुओं को स्थायी रूप से न्याय से वंचित करने को उचित ठहराती थी। वह इस्लाम के भी उतने ही बड़े आलोचक थे, लेकिन जिन्ना के प्रति झुकाव के बाद वह इस्लाम-विरोधी नहीं रह गए थे। वह मुस्लिम नेताओं को कांग्रेस के स्वशासन की मांग में एक प्रभावी बाधा मानते थे। उन्हें पूरा भरोसा था कि प्रथम विश्वयुद्ध के दौरान तुर्की (अब तुर्किये) के खिलाफ ब्रिटिश झंडे के नीचे लड़ने के अनुभव से मुसलमान ब्रिटिश राज के प्रति वफादार रहेंगे।

जलियांवाला बाग हत्याकांड के लिए जनरल डायर को चेतावनी देने के बावजूद ब्रिटिश साम्राज्य के नैतिक आधार में उनका विश्वास कभी कम नहीं हुआ। हालांकि, वह कभी भी उपनिवेशवाद की अपमानजनक और अमानवीय रवैये को नहीं समझ सके और न ही भारत में सत्ता बनाए रखने के लिए औपनिवेशिक प्रशासन द्वारा अक्सर इस्तेमाल की जाने वाली क्रूर शक्ति को समझ सके।

चर्चिल ने गांधी और कांग्रेस को घृणा और भय की दृष्टि से देखा और गांधी को खतरनाक, कट्टर और तपस्वी बताया। उनकी पहली मुलाकात 28 नवंबर, 1906 को हुई थी, जब चर्चिल उपनिवेशों के लिए राज्य के अवर सचिव थे और गांधी दक्षिण अफ्रीका में भारतीयों के अधिकारों के प्रवक्ता थे। गांधीजी ने चर्चिल को आश्वस्त किया कि वह ब्रिटिश सरकार के एक वफादार नागरिक हैं और ब्रिटिश नागरिक के रूप में वह सभी बुनियादी अधिकारों के हकदार हैं।

वर्ष 1909 की शुरुआत में चर्चिल को एहसास हुआ कि भारत में ब्रिटिश साम्राज्य को बचाने के लिए गांधी जैसे दूरदर्शी नेता को रोकना होगा। भारत में ब्रिटिश शासन को समाप्त करने का गांधी का दृढ़ संकल्प चर्चिल के इसे संरक्षित करने के मिशन के साथ सीधे टकराता था, क्योंकि वह ब्रिटिश साम्राज्य को भविष्य के सार्वभौमिक समुदाय के लिए एक खाका मानते थे, जबकि गांधी इसे ऐसे समुदाय के निर्माण में सबसे बड़ी बाधा मानते थे।

चर्चिल ने भारत को सत्ता हस्तांतरण के विचार को तब भी खारिज कर दिया, जब वह व्यक्तिगत रूप से दक्षिण अफ्रीका और आयरलैंड में सत्ता हस्तांतरण में शामिल थे। उनका मानना था कि यदि गांधी और उनके सहयोगियों ने सत्ता हासिल कर ली, तो उसके परिणाम अराजक होंगे और भारत समकालीन चीन जैसी असहनीय स्थिति में पहुंच जाएगा।

भारत की वास्तविकता के बारे में उनका घोर अविश्वास तब स्पष्ट हो गया, जब उन्हें जीडी बिड़ला से यह सुनकर आश्चर्य हुआ कि उन्होंने अपनी कई फैक्टरियों में से एक में 25,000 लोगों को रोजगार दिया था। चर्चिल की संवेदनहीनता 1943 के बंगाल के अकाल का मुख्य कारण थी, जिसमें 60 लाख लोग मारे गए थे। वह परंपरा को आधुनिक रूप देने वाले, एक ऐसे आधुनिक संगठन के निर्माण में गांधी की महत्वपूर्ण भूमिका को पहचानने में विफल रहे, जो बहुलतावादी थे, सभी प्रकार के विचारों का प्रतिनिधित्व करते थे, हर तरह के लोगों के लिए उपलब्ध रहते थे, और स्वतंत्रता की भावना को जीवित रखते थे। गांधी पर चर्चिल का गुस्सा उनकी 'गलत धारणा के कारण था। जबकि नैतिक रूप से गांधी उनसे कहीं अधिक शक्तिशाली थे।

भारतीय हित के प्रति सहानुभूति रखने वाले लेबर पार्टी के कई नेताओं के विपरीत चर्चिल तब भी कठोर बने रहे, जब अधिकांश ब्रिटिश आबादी को द्वितीय विश्वयुद्ध के अंत तक उपनिवेशवाद की अनैतिकता का एहसास हुआ। यह परिवर्तन महात्मा गांधी के जादू के कारण था। चर्चिल ने रूजवेल्ट द्वारा शुरू किए गए सभी अधीन देशों के आत्मनिर्णय के अधिकार को कमजोर करने का प्रयास किया। पर बाद में अमेरिकियों और रूजवेल्ट के लगातार दबाव के कारण वह अस्थायी रूप से नरम पड़ गए।

चर्चिल बेशक 20वीं सदी के सबसे उत्कृष्ट राजनेताओं में से एक थे और अपने दृढ़ संकल्प और साहस तथा हिटलर के खिलाफ लड़ने के लिए अपने लोगों को एकजुट करने के कारण ब्रिटेन के सबसे लोकप्रिय नेताओं में से एक थे। लेकिन इस सच से इन्कार नहीं किया जा सकता कि आम तौर पर भारत और खासकर गांधी के प्रति उनका रवैया नस्लीय पूर्वाग्रहों से भरा था।

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