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विश्लेषण: झूठे नरेटिव गढ़ रहे यूनुस आखिर कर क्या रहे हैं

Tue, 10 Jun 2025 07:49 AM IST
subir bhowmik सुबीर भौमिक
Updated Tue, 10 Jun 2025 07:49 AM IST
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सार
यूनुस ने भले ही अप्रैल 2026 में चुनाव कराने की घोषणा कर दी है, लेकिन वह खुद सत्ता में बने रहने के लिए तरह-तरह के हथकंडे अपना रहे हैं। वह अपने शागिर्दों के जरिये झूठे नैरेटिव गढ़ रहे हैं कि भारत और अवामी लीग, दोनों बांग्लादेश को बर्बाद करने की साजिश रच रहे हैं।
 
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Mohammad Yunus himself is adopting various tactics to remain in power
नोबेल पुरस्कार विजेता मुहम्मद युनुस - फोटो : पीटीआई

विस्तार

बांग्लादेश की अंतरिम सरकार के मुख्य सलाहकार मोहम्मद यूनुस ने छात्र नेता नाहिद इस्लाम से कहा था कि वह इस्तीफा देना चाहते हैं, लेकिन अब सलाहकार परिषद ने इससे इन्कार किया है कि उन्होंने ऐसा कभी कहा था। उनके एक सलाहकार वहीदुद्दीन ने मीडिया से कहा, ‘यूनुस लोगों द्वारा सौंपे गए काम को पूरा करने के बाद खुद ही चले जाएंगे, तब तक वह इस्तीफा नहीं देंगे।’



लेकिन सवाल यह है कि यूनुस का काम क्या है। यूनुस की अपनी धारणा और बांग्लादेश के अन्य महत्वपूर्ण लोगों की सोच में बहुत बड़ा अंतर है। अंतरिम सरकार का गठन करने वाली सेना चाहती है कि चुनाव जल्द करवाए जाएं, उसके प्रमुख जनरल जनरल वकार-उज-जमां ने इस वर्ष दिसंबर तक संसदीय चुनाव कराने पर जोर दिया है।


बांग्लादेश नेशनलिस्ट पार्टी (बीएनपी) अवामी लीग पर प्रतिबंध लगाए जाने के बाद चुनाव में सबसे आगे मानी जा रही है। वह भी इसी साल चुनाव करवाने के पक्ष में है, जैसा कि उसके कार्यकारी अध्यक्ष तारिक रहमान ने हाल ही में स्पष्ट किया। लेकिन यूनुस अप्रैल, 2026 के पहले पखवाड़े में चुनाव का एलान कर चुके हैं। हालांकि, यूनुस के कई समर्थक पहले ही सुझाए गए सुधारों को पूरा करने के लिए अंतरिम सरकार के लिए पांच साल का कार्यकाल बरकरार रखने की वकालत कर चुके हैं।

यूनुस खुद तो कुछ नहीं कहते, लेकिन अपने सहयोगियों से अलग-अलग बातें कहलवा कर लंबे समय तक सत्ता में बने रहना चाहते हैं। शक्तिशाली सेना का समर्थन खोने के डर से यूनुस अपने शागिर्दों के जरिये जवाबी नैरेटिव गढ़ते रहते हैं। एक ओर उन्होंने यह अफवाह फैला दी कि वह इस्तीफा देना चाहते हैं, ताकि उन्हें रुकने के लिए मनाया जाए। जब ऐसा नहीं हुआ, तो उन्होंने कुछ समर्थकों को इकट्ठा कर ढाका के शाहबाग में ‘यूनुस के लिए मार्च’ निकलवाया, जिसमें दो मांगें रखी गईं कि यूनुस पांच साल तक सत्ता में रहें। सुधार पहले किए जाएं, फिर चुनाव करवाए जाएं। ज्यादा भीड़ नहीं जुटने पर जब मार्च बुरी तरह विफल हो गया और यूनुस की घटती लोकप्रियता उजागर हो गई, तब मुख्य सलाहकार ने राजनीतिक पार्टियों को विचार-विमर्श करने के लिए बुलाया।

जाहिरा तौर पर वह अपने नियोजित सुधारों के लिए आम सहमति प्राप्त करना चाहते थे, लेकिन वास्तव में उनका मकसद था कि अंतरिम सरकार के प्रमुख के रूप में उन्हें सत्ता में बने रहने के लिए राजी किया जाए। इसी दौरान उनकी एक सलाहकार सैयदा रिजवाना ने पत्रकारों से कहा कि अंतरिम सरकार केवल चुनाव करवाने के लिए नहीं, बल्कि ‘फासीवाद के पीड़ितों’ को न्याय सुनिश्चित करने के लिए और भी महत्वपूर्ण सुधार करने में लगी है। जब बीएनपी के कार्यकारी अध्यक्ष तारिक रहमान ने इसी साल दिसंबर तक चुनाव कराने पर जोर दिया, तो यूनुस ने कुछ सहयोगियों को हारी हुई ताकतों (अवामी लीग) और विदेशी शक्तियों (भारत) की गहरी साजिशों के बारे में शिकायत करने के लिए बुलाया।

उनमें से एक ‘नागोरिक ओइक्या’ (नागरिक एकता) के प्रमुख महमूदुर रहमान मन्ना ने रिकॉर्ड पर कहा कि यूनुस ने उनसे कहा था, ‘भारत हमें बर्बाद करने की साजिश रच रहा है।’ इसलिए चुनाव कराए बिना सत्ता में बने रहने की उनकी सभी चालें और षड्यंत्र विफल हो गए, तो यूनुस ने देश में व्याप्त भारत विरोधी भावनाओं का लाभ उठाना शुरू कर दिया। कुछ लोग इसे अवामी लीग के साथ बीएनपी और सेना प्रमुख को  ‘भारतीय पिट्ठू’ के रूप में पेश करने की चाल मानते हैं, जो उन्हें रक्षात्मक बना सकता है और उनके कट्टरपंथी इस्लामवादी समर्थन आधार को मजबूत करने में मदद कर सकता है, क्योंकि सिर्फ कट्टरपंथी समूह ही बिना चुनाव के यूनुस को सत्ता में बने रहने के लिए समर्थन दे रहे हैं।

किसी को आश्चर्य हो सकता है कि कैसे एक स्पष्ट पश्चिमी उदारवादी, यूनुस जैसे नोबेल पुरस्कार विजेता कट्टरपंथी इस्लामी समूहों के साथ घुल-मिल गए, जो बांग्लादेश को शरिया कानूनों द्वारा शासित इस्लामी मुल्क बनाने के अपने इरादे को नहीं छिपाते हैं। यह एक ऐसा गठजोड़ है, जो राजनीतिक सुविधा के लिए किया गया है, लेकिन बांग्लादेश के भविष्य पर इसके दीर्घकालिक खतरनाक परिणाम होंगे। मुल्क की आजादी के बाद से ही इस्लामी समूह बांग्लादेश की चुनावी राजनीति में हाशिये पर रहे हैं और यूनुस शासन, जिन्हें कोई राजनीतिक समर्थन भी नहीं है, अपनी महत्वाकांक्षा को आगे बढ़ाने के लिए इस्लामी बांग्लादेश को एक उपयोगी मोर्चे के रूप में देखते हैं। यूनुस और नवगठित नेशनल सिटीजंस पार्टी के उनके छात्र-युवा समर्थकों ने ‘पिछले वर्ष के जन-विद्रोह की भावना’ को कायम रखने के लिए जुलाई घोषणापत्र के साथ आगे बढ़ने का दृढ़ निश्चय किया है। इस्लामवादियों को लगता है कि वे अपने सपने के और करीब आ गए हैं। जुलाई घोषणापत्र का उद्देश्य बांग्लादेश मुक्ति युद्ध की भावना से पैदा हुए 1972 के धर्मनिरपेक्ष संविधान को निष्प्रभावी करना है। यूनुस की राजसी राजनीतिक महत्वाकांक्षाओं के लिए जमीनी स्तर पर पर्याप्त मजबूत समर्थन नहीं है। इसलिए प्रमुख राजनीतिक दलों को दूर रखने हेतु कट्टरपंथी इस्लामी समूहों का इस्तेमाल करने के अलावा उनके पास और कोई विकल्प नहीं है। वे उन्हें मजबूत लड़ाके और सड़क पर बाहुबल तथा प्रभावशाली धार्मिक नेताओं का राजनीतिक समर्थन प्रदान करते हैं।

अवामी लीग के लंबे शासन के दौरान बांग्लादेश में ‘लोकतंत्र की हत्या’ पर रोने वाले पश्चिम को यूनुस और उनकी अंतरिम सरकार के यथासंभव लंबे समय तक बने रहने से कोई परहेज नहीं है। यूनुस ने उनकी रणनीतिक चिंताओं को संबोधित किया है और म्यांमार को बांग्लादेश से जोड़ने वाले विवादास्पद रखाइन कॉरिडोर पर सहमति व्यक्त की है-इसलिए पश्चिम को बांग्लादेश में एक अनिर्वाचित सरकार से शिकायत नहीं है। उनके गुप्त वित्तपोषण और रसद समर्थन ने सोशल मीडिया पर शोर मचाने वाले गिरोह को स्थापित किया है, जो यूनुस का समर्थन करता है और कहता है कि वह बांग्लादेश को सिंगापुर की तरह तभी बना पाएंगे, जब उन्हें पांच साल का कार्यकाल दिया जाएगा।

इसलिए जिन्होंने उनके इस्तीफे की घोषणा को गंभीरता से लिया, जिनमें कई पत्रकार भी शामिल हैं, उनके लिए एक बांग्लादेशी पत्रकार ने फेसबुक पर एक मजेदार टिप्पणी की, ‘देहोत्याग, किंतु पोदोत्याग नोई’ यानी मर जाएंगे, पर इस्तीफा नहीं देंगे-जिसे उन्होंने यूनुस की भावनात्मक ब्लैकमेलिंग को उजागर करने के लिए उनकी मुस्कराती तस्वीर के साथ लिखा। एक अन्य अवामी लीग नेता ने उनकी तुलना उत्तर कोरिया के तानाशाह किम जोंग उन से की, जो बिना चुनाव कराए सत्ता में हैं।

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