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अभी कायम है लोकप्रियता

Sun, 25 Mar 2018 06:44 PM IST
तवलीन सिंह
तवलीन सिंह Updated Sun, 25 Mar 2018 06:44 PM IST
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Modi still popular
तवलीन सिंह

मैं जब भी कुछ समय बाद दिल्ली वापस आती हूं, तो ऐसा लगता है, जैसे गलती से किसी विदेशी शहर में पहुंच गई हूं। पिछले सप्ताह जब कांग्रेस राहुल गांधी के राष्ट्रीय अध्यक्ष बन जाने के बाद अपना पहला महाधिवेशन मना रही थी, तब ऐसा और भी ज्यादा लगा। मुझे राजनीतिक पंडित दोस्तों से राहुल के भाषण की इतनी तारीफ सुनने को मिली कि ऐसा लगा, जैसे सोनिया गांधी फिर से राजमाता की गद्दी संभाल चुकी हैं और उनके बेटे का राजतिलक हो चुका है। गोरखपुर और फूलपुर में भाजपा की शर्मनाक हार के बाद विपक्ष के हौसले बुलंद होना कुछ हद तक स्वाभाविक है। लेकिन कांग्रेस का हाल इन दोनों महत्वपूर्ण चुनाव क्षेत्रों में कोई इतना अच्छा नहीं था कि अभी से तय हो जाए कि देश के अगले प्रधानमंत्री राहुल गांधी होंगे।


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कांग्रेस के कार्यकर्ताओं और समर्थकों का यह सपना जरूर है, लेकिन जब राजनीतिक पंडित अभी से तय कर लेते हैं कि नरेंद्र मोदी 2019 का लोकसभा चुनाव हार चुके हैं और राहुल गांधी प्रधानमंत्री बन चुके हैं, तो थोड़ा अजीब लगता है। लेकिन दिल्ली में इन दिनों ऐसा ही माहौल है। सो जब मैं अपने दोस्तों को याद दिलाने की कोशिश करती हूं कि ‘अच्छे दिन’ बेशक न आए हों, पर ग्रामीण भारत में नरेंद्र मोदी की लोकप्रियता अब भी काफी हद तक कायम है, तो वे मेरी तरफ ऐसे देखते हैं, जैसे मैं पागल हो गई हूं। वे कहते हैं, ‘तुम तो मोदी की भक्त हो न, इसलिए ऐसा कह रही हो।’ ऐसा नहीं है, लेकिन इन पंडितों को विश्वास नहीं दिला पाती हूं। हां, मोदी के कार्यकाल के इस दौर में थोड़ी-बहुत निराशा फैलने लगी है, पर ग्रामीण भारत के दौरों में जिन लोगों से मेरी बात होती है, उनमें से अधिकतर अब भी मानते हैं कि देश में समृद्धि, विकास और परिवर्तन लाने के लिए मोदी ईमानदारी से काम कर रहे हैं।

उपचुनावों के परिणाम आने के बाद से आजकल दिल्ली में ऐसी बातें सुनने को नहीं मिलती हैं। जनवरी के अंतिम दिनों में जब अलवर और अजमेर के मतदाताओं ने भाजपा को हराया, तब से दिल्ली का राजनीतिक माहौल बदलने लगा था। अब जब उत्तर प्रदेश में मुख्यमंत्री और उपमुख्यमंत्री, दोनों की सीट उपचुनाव में भाजपा हार गई है, दिल्ली के राजनीतिक पंडितों ने तय कर लिया है कि मोदी के लिए उल्टी गिनती शुरू हो गई है। यह भी सच है कि हम मीडिया वालों में मोदी के दोस्त न के बराबर हैं। सो मेरे साथी शुरू से उनके प्रधानमंत्री बनने का विरोध करते आए हैं, पर यह भी सच है कि उन्होंने मीडिया का समर्थन पाने की थोड़ी भी कोशिश नहीं की है। मोदी ने हम मीडिया वालों को इतना दूर रखा है कि प्रधानमंत्री बनने के बाद उन्होंने एक भी प्रेस कॉन्फ्रेंस को संबोधित नहीं किया है। वह स्वयं यदि नहीं मिलना चाहते थे, तो कोई प्रवक्ता तो नियुक्त किया होता, जो राष्ट्रीय मुद्दों पर उनकी तरफ से बोल सके। उन्होंने ऐसा भी नहीं किया, सो पिछले चार साल में प्रधानमंत्री और मीडिया के बीच दूरियां बढ़ती ही गई हैं।

जब लोकसभा चुनाव पास आता जा रहा है और मोदी को मीडिया की जरूरत है, तब मीडिया में उनके दुश्मन ज्यादा हैं और दोस्त बहुत कम। इसका नुकसान उनको ज्यादा और मीडिया को कम हुआ है। वह इस बात से साबित होता है कि कांग्रेस के महाधिवेशन में राहुल गांधी के साधारण से भाषण को मेरे दोस्तों ने सुर्खियों में ऐसे पेश किया है, जैसे वह अब बहुत बड़े राजनेता बन गए हैं। इसमें कुछ दोष प्रधानमंत्री जी, आपका भी है।

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