श्रम सुधार की दिशा में पहला बड़ा कदम
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यकीनन अब देश में कारोबार मुश्किलें कम होने की उम्मीदें उभरकर सामने आ रही हैं। भारत को बेहतर कारोबारी देश बनाने के लिए मोदी सरकार ने 40 केंद्रीय श्रम कानूनों में से 16 को सरल और कारगर बनाने की रूपरेखा तैयार की है। हाल ही में सरकार ने श्रम कानूनों में संशोधन के लिए लोकसभा में फैक्टरीज (संशोधन) बिल, 2014 और अप्रेंटिसेज (संशोधन) बिल, 2014 पेश किया, जिनमें महिलाओं के रात-पाली में काम करने के नियमों में ढील देने, ओवर टाइम सीमा बढ़ाए जाने और गैर-स्नातक इंजीनियरों के लिए प्रशिक्षण की व्यवस्था करने जैसी बातें शामिल हैं। मंत्रिमंडल ने पिछले हफ्ते इनकी मंजूरी दी थी।
इसी तरह से सरकार ने श्रम और कारोबार क्षेत्र में ‘इंस्पेक्टर राज’ खत्म करने का संकेत देते हुए इंस्पेक्टरों के विवेकाधीन अधिकार खत्म कर उन्हें ज्यादा जिम्मेदार बनाने की बात कही है। इस परिप्रेक्ष्य मे श्रम मंत्रालय आगामी एक सितंबर से नई उदार निरीक्षण योजना शुरू करने जा रहा है, जिसके तहत निरीक्षक अपनी मर्जी से जांच के लिए नहीं जा सकेगा। साथ ही निरीक्षक की अनिवार्य जांच कुछ खास मामलों तक ही सीमित होगी। मंत्रालय दो अक्तूबर से एकीकृत वेब पोर्टल भी शुरू करेगा, जो उद्योगों के लिए मंजूरी प्रक्रिया को आसान बनाएगा। इस पोर्टल पर कंपनियां सालाना रिटर्न भी दाखिल कर सकेंगी।
अंतरराष्ट्रीय रिपोर्टों में कहा गया है कि यदि सरकार कारोबार के लिहाज से भारत को बेहतर बनाना चाहती है, तो उसे प्रशासनिक और नियामकीय सुधारों के जरिये लाल फीताशाही कम करना होगा। अध्ययनों में यह तथ्य भी उभरकर सामने आया है कि देश में उदारीकरण की प्रक्रिया को बढ़ाने के लिए श्रम सुधारों को गति देना जरूरी है।
भारतीय उद्योगों को विश्व भर में प्रतिस्पर्धात्मक बनाने के उद्देश्य से विभिन्न क्षेत्रों में नीतिगत बदलाव किए गए हैं, लेकिन श्रम एवं प्रशासनिक कानूनों में बदलाव भी जरूरी दिखाई दे रहे हैं। हालांकि पिछली सरकारों ने भी इस दिशा में कुछ कदम उठाए, लेकिन कोई सार्थक क्रियान्वयन नहीं हो सका। मसलन, देश में श्रम सुधार के मद्देनजर दो श्रम आयोग बने। प्रथम श्रम आयोग की सिफारिशें मोटे तौर पर श्रम सुधार और श्रम संरक्षण पर केंद्रित थीं, जबकि द्वितीय श्रम आयोग की कई सिफारिशें नई श्रम जरूरतों को रेखांकित करती हैं, मसलन राष्ट्रीय छुट्टियों में कटौती, उद्योगों को बिना सरकारी इजाजत बंद करने और कर्मचारियों की छंटनी करने का अधिकार, आदि। द्वितीय श्रम आयोग ने चीन को मॉडल बनाकर श्रम कानूनों को उपयुक्त बनाने की भी सिफारिशें की, लेकिन उन सिफारिशों को सरकार ने ठंडे बस्ते में डाल दिया।
निश्चित रूप से इस दौर में श्रम और प्रशासनिक सुधारों की ओर से आंखें मूंदना बेमानी है। देश में औद्योगिक उत्पादन में वृद्धि के साथ-साथ दुनिया के बाजार में भारतीय उद्यम अपने पैर मजबूती से तभी जमा सकेंगे, जब देश श्रम एवं प्रशासनिक सुधारों की उपयुक्त डगर पर आगे बढ़ेगा। ऐसे सुधारों से रोजगार के नए रास्ते भी खोले जा सकते हैं।