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मोदी की चुनावी रणनीति

Wed, 11 Jul 2018 06:17 PM IST
नीरजा चौधरी, वरिष्ठ पत्रकार
नीरजा चौधरी, वरिष्ठ पत्रकार Updated Wed, 11 Jul 2018 06:17 PM IST
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Modi's election strategy
मोदी की चुनावी रणनीति
अलवर, अजमेर, गोरखपुर, फूलपुर, अररिया, भंडारा के उपचुनावों में विपरीत नतीजे आने के बाद महीनों तक प्रधानमंत्री ने सुविचारित चुप्पी साधे रखी। उन्होंने विपक्ष को एकजुट होते हुए देखा और देखा कि उनकी एकता ने चुनावी लाभांश दिया है। पर अब नरेंद्र मोदी ने खुद मोर्चा संभालने का विकल्प चुना है। उन्होंने यह जताने की कोशिश की है कि 2019 में विकास ही भाजपा का चुनावी मंत्र बनने जा रहा है।

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यह राजस्थान में भाजपा के चुनावी अभियान की आभासी शुरुआत थी, जब प्रधानमंत्री ने छह केंद्र प्रायोजित योजनाओं और राज्य की पांच प्रमुख योजनाओं के ढाई लाख लाभार्थियों से संवाद किया। इनमें उज्ज्वला, प्रधानमंत्री आवास योजना, मुद्रा योजना, प्रतिष्ठित स्वास्थ्य बीमा योजना और पालनहार शामिल है, जिसके जल्द शुरू होने की उम्मीद है। जयपुर के कार्यक्रम ने इस पर बल दिया कि 'विकास' 2019 के चुनाव के प्रथम चरण में मोदी का युद्धघोष बनने जा रहा है। वह 2014 की तरह समावेश की बात कर रहे हैं और सब तक पहुंचना चाहते हैं। लिहाजा अधिकारियों को समयबद्ध लक्ष्य पूरा करने का निर्देश दिया गया है। 

किसानों के लिए न्यूनतम समर्थन मूल्य में वृद्धि की घोषणा भी इसका संकेत है कि सरकार किसानों के संकट को कम करने के लिए सुधार की दिशा में बढ़ रही है, हालांकि इससे खाद्य पदार्थों की कीमतें भी बढ़ेंगी और गरीब तबके में नाराजगी बढ़ेगी। पर यह संभव है कि सरकार गरीबों को राहत देने के लिए उनके खाते में प्रत्यक्ष लाभ हस्तांतरण का सहारा ले। कहा जा रहा है कि यह नमो रणनीति का पहल चरण है। किसानों की नाराजगी, दलितों का गुस्सा, जम्मू-कश्मीर में पीडीपी के साथ अभी खत्म हुआ गठजोड़ जैसे मुद्दे सूरजकुंड में 2019 की रणनीति पर विचार के लिए आयोजित भाजपा और संघ की बैठक में सामने आए थे।

उनकी सरकार को लेकर असंतोष के बावजूद प्रधानमंत्री स्पष्ट रूप से उस भावना पर दांव लगा रहे हैं, जो अब भी मौजूद है। कई लोग अब भी कहते हैं कि जहां तक मोदी का सवाल है, 'गलतियां चाहे की हैं, पर इनकी नीयत तो ठीक है'। इस क्रम में वे अनौपचारिक क्षेत्र पर नोटबंदी के विनाशकारी प्रभाव और जल्दी में लागू किए गए जीएसटी का उल्लेख करते हैं, जिसने लघु स्तरीय क्षेत्र को बंधन में जकड़ लिया। लेकिन फिर वे कहते हैं, 'गलतियां किससे नहीं होती हैं।' उनकी टिप्पणी का सारांश यह है कि 'हम उन्हें कुछ और समय दे सकते हैं, कम से कम वह चीजों को बदलना चाहते हैं।' खासकर जब विपक्ष में कोई चेहरा नजर नहीं आता। विकास पर जोर, कार्यक्रमों की डिलिवरी, नई योजनाओं की घोषणा-इस भावना को भुनाने की कोशिश है। इसीलिए सरकार ने अपनी चौथी सालगिरह समारोह में 'साफ नीयत, सही विकास' के रूप में अभियान की शुरुआत की।

इस साल स्वतंत्रता दिवस पर लालकिले के प्राचीर से प्रधानमंत्री का आखिरी संबोधन निस्संदेह उनकी रणनीति को चित्रित करेगा, जिसे वह अपने कार्यकाल के नौ महीनों में आगे बढ़ाने की योजना बना रहे हैं। वह गांधी जयंती के अवसर पर भी कोई बड़ा आयोजन कर सकते हैं। कहने की जरूरत नहीं कि जो भी पहले एजेंडा स्थापित करने की पहल करेगा, वह 2019 में लाभान्वित होगा। मोदी पर निशाना साधने के अलावा विपक्ष ने अब तक अपने मुद्दों को रेखांकित नहीं किया है।

पर मोदी बनाम शेष अन्य की लड़ाई ऐसी है, जिसका भाजपा स्वागत करेगी, क्योंकि इसमें मोदी के पक्ष में ध्रुवीकरण की क्षमता है। मोदी ने पहले से ही विपक्ष पर निशाना साधना शुरू कर दिया है कि मोदी बनाम कौन? कई लोगों का मानना है कि आगामी महीनों में अगर सुप्रीम कोर्ट अयोध्या में मंदिर निर्माण के संबंध में अनुकूल फैसला देता है, तो यह दूसरा खरगोश हो सकता है, जिसे प्रधानमंत्री अपनी टोपी से निकालने की उम्मीद कर सकते हैं। अब यह देखना बाकी है कि सर्वोच्च न्यायालय इस साल के अंत तक फैसला सुनाती है या नहीं। विश्व हिंदू परिषद ने पहले ही धमकी दे दी है कि अगर अदालत अपना फैसला नहीं देती है, तो वे संतों और सांसदों से संपर्क करेगी। यह अगल बात है कि क्या मंदिर के प्रति लोगों का वैसा आकर्षण होगा, जैसा अतीत में था। अगर मुस्लिम समुदाय फैसले को स्वीकार नहीं करता और विरोध में सड़कों पर उतरता है, तो यह अतीत की तरह हिंदू-मुस्लिम लाइन पर ध्रुवीकरण कर सकता है।

फिर भी भाजपा को अपने मूल मतदाताओं के प्रति सावधान रहना होगा। माना जाता है कि यह पता लगाने के लिए अध्ययन किए गए हैं कि दक्षिणपंथी समर्थकों को कौन से मुद्दे उत्तेजित कर रहे हैं, तो पता चला कि इसमें मंदिर के अलावा अल्पसंख्यक शैक्षणिक संस्थानों को रियायत देने का मुद्दा और ट्रस्टों द्वारा संचालित मंदिरों को रियायत देने संबंधी मांग शामिल हैं। कुछ लोग मानते हैं कि भविष्य में मोदी को अपने दक्षिणपंथी समर्थकों से ही असली चुनौती मिलेगी। 

 2019 के अभियान के तीसरे चरण में उच्च-राष्ट्रवाद में वृद्धि देखी जा सकती है। यह किसी न किसी तरह से पाक पर प्रहार जैसा होगा। या कश्मीर से जुड़ा मुद्दा, जिसमें आजादी की मांग पर हिंदुओं की प्रतिक्रिया होगी। यह दिलचस्प है कि पीडीपी के बागियों और कुछ छोटी पार्टियों की मदद से जम्मू-कश्मीर में फिर से सरकार बनाने की कवायद चल रही है, पर भाजपा ने जोर देकर कहा है कि मुख्यमंत्री भाजपा का होना चाहिए। मुस्लिम बहुल राज्य में शासन करना पार्टी की टोपी में कलगी की तरह होगा, पर घाटी में बढ़ते अलगाव को देखते हुए, इसका घाटी में उन लोगों द्वारा विरोध किया जाएगा और यह विरोध स्वाभाविक रूप से जम्मू और देश के शेष हिंदुओं में एक प्रतिक्रिया पैदा करेगा। अमित शाह ने पहले से ही जता दिया है कि पार्टी पूरे देश में कश्मीर कार्ड का इस्तेमाल करेगी। 

हालांकि अंत में अगले साल की बड़ी लड़ाई मोदी बनाम संयुक्त विपक्ष पर ही केंद्रित होगी, पर उन अर्थों में नहीं जैसा विपक्ष चाहता है। यहां तक कि अगर मोदी की लोकप्रियता बरकरार है (2014 में 31 फीसदी) और अगर इसमें उन्होंने कुछ फीसदी की वृद्धि की, तो यह देखते हुए कि दूसरी तरफ कोई उन्हें टक्कर देने वाला नहीं है, तो भी शेष 69 फीसदी मतदाताओं को अपने पाले में करना उनके लिए कठिन होगा, खासकर उत्तर प्रदेश, बिहार, महाराष्ट्र, झारखंड, कर्नाटक में, जहां यह अंतर पैदा कर सकता है। 'विकास' का जाप मोदी को एजेंडा स्थापित करने के लिए उपयुक्त माहौल बनाने में भाजपा की मदद कर सकता है। पर अमित शाह की प्रभावी रणनीति यह हो सकती है कि विपक्ष किसी भी तरह एकजुट न हो।
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