फ्री ई-पेपर
पर्सनलाइज़्ड फ़ीड
पर्सनलाइज़्ड नोटिफ़िकेशन
चलते-फिरते ख़बरें
लॉयल्टी रिवॉर्ड्स
डाउनलोड करें

सब्सक्राइब करें
Hindi News ›   Columns ›   Opinion ›   Modi and identity of India

मोदी और भारत का विचार

Tue, 27 May 2014 07:24 PM IST
जगदीश उपासने
जगदीश उपासने Updated Tue, 27 May 2014 07:24 PM IST
विज्ञापन
Modi and identity of India

रईस (नाम परिवर्तित) कबाड़ी मेरी सोसाइटी के पीछे के गांव में ऐसी बस्ती में रहता है, जिसे बुद्धिजीवी ‘गेटो’ (गंदी, घनी बस्ती) कहते हैं। हाल में उसने दो मामलों में राय मांगी—एक ग्रेजुएशन के आखिरी साल की परीक्षा दे चुकी अपनी बेटी के बी.एड. में एडमिशन पर और, ग्रेजुएशन कर रहे बेटे के लिए सिविल सर्विस परीक्षाओं की कोचिंग के वास्ते। बेटी के लिए मेरठ के एक अल्पसंख्यक शिक्षा संस्थान में एडमिशन की कोशिश की सलाह उसने नरमाई से ठुकरा दी, ‘किसी अच्छे कॉलिज में दाखिला हो सके, तो देखना जी,’ उसका जवाब था। मुसलमानों के बच्चों को मदद-इमदाद की केंद्र और राज्य सरकार की कई सारी योजनाओं की याद दिलाने पर उसने निराशा में हाथ झ्टक दिए। चुनाव में वोट किसे दिया, मैंने उससे नहीं पूछा। असली बात थी वह हसरत, जो उसमें और उसकी दो बालिग संतानों में धधक रही थी—अच्छी तालीम और समाज में इज्जत की जिंदगी। यह था वह नया भारत, जिसने देश की सियासी शक्ल बदलकर रख दी।

विज्ञापन


लोकसभा चुनाव के लिए मतदान से पहले ब्रिटेन का प्रमुख अंतरराष्ट्रीय अखबार गार्जियन यूरोप, अमेरिका और भारत के भी उन अखबारों में शामिल था, जिन्होंने भारतीय मतदाताओं से ‘विभाजनकारी नरेंद्र मोदी को न चुनने’ की सेक्यूलर बुद्धिजीवियों की अपीलें छापी थीं। मोदी की भारी जीत के बाद 18 मई को गार्जियन ने संपादकीय में लिखा: 'मोदी की जीत दिखाती है कि अंग्रेज आखिरकार भारत से चले गए।' नियति से एक और साक्षात्कार शीर्षक के संपादकीय का जोर इस बात पर है: '...भारत एक केंद्रीकृत, बाड़ों में बंद, सांस्कृतिक रूप से दबा हुआ और पूर्ववर्तियों की तरह अपेक्षाकृत छोटे, अंग्रेजी बोलने वाले संभ्रांत वर्ग द्वारा शासित देश था, जिसका आम लोगों के प्रति नजरिया उनको नजराने बांटने और उनसे फायदा उठाने का तो था, लेकिन सबको साथ लेकर चलने वाला (समावेशी) कभी नहीं था....।' इस अखबार समेत कई विचारक अब मान रहे हैं कि यह ‘नया भारत’ खैरात नहीं, अवसर और अपनी पहचान चाहता है, और यह किसी की धौंस में आने को राजी नहीं है। मोदी का ‘इंडिया फर्स्ट’ इसकी प्रतिध्वनि है।
विज्ञापन


मोदी ने हमेशा कहा कि वे राष्ट्रवादी हैं और राष्ट्र उनके लिए सबसे पहले है; बल्कि ऐन चुनाव प्रचार की बेला में एक इंटरव्यू में उन्होंने यह स्वीकारने में भी गुरेज न किया चूंकि वे हिंदू हैं और राष्ट्रवादी भी, इसलिए प्रश्नकर्ता उन्हें ‘हिंदू राष्ट्रवादी’ कह सकता है, 'मैं अपने धर्म को मानता हूं और दूसरों के धर्म का सम्मान करता हूं।’ मोदी कोई नई बात नहीं कह रहे थे। हिंदू धर्म, (मोदी जिस संघ परिवार से हैं, वह इसे ‘जीवन जीने की एक पद्धति’ मानता है) का सार भी यही है। फिर ‘भारत का विचार’ सुरक्षित रहने के अंदेशे दरअसल क्या हैं? एक, जनादेश बहुसंख्यक समाज के ध्रुवीकरण का नतीजा है, जिसमें भारत की आबादी के 13.4 फीसदी मुसलमान छूट गए हैं (चुनाव-बाद सर्वेक्षणों के हिसाब से देश भर में महज 10-12 फीसदी मुस्लिम वोट भाजपा को मिला); दो, मोदी के नेतृत्व में देश की सांस्कृतिक मुख्यधारा एकजुट होने से उम्मीदें और डर जगा है; तीन, कोई गारंटी नहीं कि भाजपा जनादेश के दुस्साहस भरे अर्थ न निकाले और उसके परकोटे पर बैठे तत्व राष्ट्रीयत्व की पुनर्व्याख्या की कोशिश न करें; और अंत में मोदी का उभार सेक्यूलरिज्म की मौत का फरमान है!
विज्ञापन
विज्ञापन


1984 में सहानुभूति की आंधी में राजीव गांधी को मिला जनादेश बहुसंख्यक समाज का ध्रुवीकरण था, लेकिन तब किसको ध्यान आया कि नरसंहार के बाद हतबल हुए देश के सिख इसमें छूट गए हैं; सांस्कृतिक मुख्यधारा तब भी एकजुट हुई, लेकिन कहीं डर नहीं पनपा; और न ही ‘सेक्यूलर’ कांग्रेस को मिले भारी बहुमत को दो सीटों तक सिमटी भाजपा के हिंदुत्व (हिंदूपन) के खात्मे का परवाना माना गया! पर नरेंद्र मोदी की जीत स्यापे का सबब इसलिए बन गई, क्योंकि सेक्यूलर सियासी ढांचा तिया-पांचा हो गया। पर यह सेक्यूलर राजनीति की निस्सारता का भी बयान है, जो टोपियों-इफ्तार पार्टियों, खैरात-सुविधाओं तथा भयादोहन तक सिमटकर रह गई। नया भारत इसका प्रतिकार कर रहा है।

चर्चित समाचार वेबसाइट हफिंगटन पोस्ट में ब्लॉगर वामसी जुलुरी ने इस सेक्यूलरिज्म को 'हिंदूफोबिया' बताया और लिखा कि यह जनादेश ‘जितना सुशासन और विकास के लिए है, उससे कहीं अधिक इस नए, उभरते विचार की घोषणा के लिए भी है कि विश्व में हिंदू, और भारतीय होने का क्या मतलब है; सर्व धर्म समादर और शांतिपूर्ण सह-अस्तित्व जिसके सभ्यतागत जीवन-मूल्य हैं। यह नया रूप 1980-90 दशक के हिंदू राष्ट्रवादी उभार से अलग है। भारतीयत्व का यह बोध उग्र-राष्ट्रवाद और अल्पसंख्यकों की लानत-मलामत को तवज्जो नहीं देता, फर्जी सेक्यूलरवाद और उद्धत राष्ट्रवादी अतिरेक (बंगलूरू में पढ़े-लिखे युवाओं का पिंक-चड्डी विरोध अभियान याद है?) दोनों को नकारता है....प्रचलित धारणा के उलट भारत के लोगों ने ठीक ही सोचा कि यह चुनाव सेक्यूलरवाद और हिंदू उग्रवाद के बीच नहीं, हिंदूफोबिया और ‘भारत सबके लिए’ के बीच है।’ मोदी के चुनावी भाषणों से लगता है कि वे इसे समझते हैं।


बहरहाल, कमान अब मोदी के हाथ में है। ‘भारत सबके लिए’ की अवधारणा को क्या वह साकार कर पाएंगे? पार्टी और परिवार ने उन्हें फ्री हैंड दिया है और ट्रैक-रिकॉर्ड उनकी ऐसी क्षमता की गवाही देता है। सो, दूसरे तमाम मोर्चों की बनिस्बत उनकी असली परीक्षा इसी मोर्चे पर होगी।

विज्ञापन
विज्ञापन
विज्ञापन
विज्ञापन
विज्ञापन

एड फ्री अनुभव के लिए अमर उजाला प्रीमियम सब्सक्राइब करें

Next Article

AU ऐप में पढ़ें

Followed