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विदेश नीति : क्षेत्रीय संतुलन और पाकिस्तान, समय की मांग है पुनर्विचार

Thu, 20 Jun 2024 06:56 AM IST
K S Tomar केएस तोमर
Updated Thu, 20 Jun 2024 06:56 AM IST
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सार
विदेश नीति पर पुनर्विचार समय की मांग है। ऐसे में, नई सरकार के समक्ष पाकिस्तान समेत सभी सार्क देशों के साथ संतुलन बनाने की चुनौती होगी।      
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Modi 3.0 will have challenge of striking balance with all SAARC countries including Pakistan
शहबाज शरीफ, पीएम मोदी - फोटो : ANI

विस्तार

भारत की ‘पड़ोसी पहले’ की नीति 1947 से ही विदेशी संबंधों का अहम हिस्सा रही है। यह पड़ोसियों से संबंध मजबूत बनाने, क्षेत्रीय सहयोग को बढ़ावा देने, पड़ोसियों के साथ साझा मुद्दों का हल निकालने पर केंद्रित है, जिसे चीन की खतरनाक विस्तारवादी और कर्ज नीति से निपटने के लिए शीर्ष प्राथमिकता देने की जरूरत है।



प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के तीसरे कार्यकाल के शपथ ग्रहण समारोह में पड़ोसी देशों एवं हिंद महासागर क्षेत्र के नेताओं की मौजूदगी से स्पष्ट है कि नई दिल्ली इन देशों को कितना महत्व देती है। समारोह में बांग्लादेश, भूटान, नेपाल, मॉरिशस के प्रधानमंत्री एवं सेशेल्स के उपराष्ट्रपति और श्रीलंका तथा मालदीव के राष्ट्रपति मौजूद थे। मालदीव के राष्ट्रपति मुइज्जू का शामिल होना रणनीतिक दृष्टि से इसलिए अहम था, क्योंकि दोनों देशों के बीच संबंध तनावपूर्ण चल रहे हैं। भारत ने ‘पड़ोसी पहले’ की नीति के तहत दक्षिण एशियाई देशों के साथ संबंधों को मजबूत करने पर हमेशा जोर दिया है। इसका लक्ष्य क्षेत्र में शांति, सहयोग और विकास को बढ़ावा देना है। अतीत में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी द्वारा सार्क नेताओं को निमंत्रण देना, दक्षिण एशिया में नई शुरुआत का संकेत था। मोदी के तीसरे कार्यकाल में दक्षिण एशिया के छोटे देशों के जरिये क्षेत्र में चीन के बढ़ते प्रभाव को रोकने के लिए भारतीय दृष्टिकोण में  भू-राजनीतिक बदलाव की उम्मीद है। मालदीव की नकारात्कता के बावजूद भारत ने संयम बरता है, जिससे संबंधों में सुधार की गुंजाइश है।


मालदीव और नेपाल चीन के प्रलोभन में फंसे हुए हैं। इसलिए भारत को क्षेत्रीय संतुलन बनाकर राष्ट्रीय हितों को ध्यान में रखना होगा। वहीं, पाकिस्तान के प्रधानमंत्री शहबाज शरीफ और पूर्व प्रधानमंत्री नवाज शरीफ का एक्स पर प्रधानमंत्री मोदी को बधाई देना, इसके जवाब में मोदी का भी धन्यवाद कहना काफी कुछ बयां करता है। नवाज शरीफ ने लिखा कि 'आइए, हम नफरत को आशा में बदलें और दक्षिण एशिया के दो अरब लोगों की नियति को आकार देने के लिए अवसरों का लाभ उठाएं।' प्रधानमंत्री मोदी ने तुरंत जवाब दिया कि ‘भारत के लोग हमेशा शांति, सुरक्षा और प्रगतिशील विचारों के लिए खड़े हैं। अपने लोगों की भलाई और सुरक्षा के लिए आगे बढ़ाना हमेशा हमारी प्राथमिकता रहेगी।’

उल्लेखनीय है कि 2014 में जब मोदी पहली बार प्रधानमंत्री बने, तो नवाज शरीफ भी शपथ ग्रहण में शामिल हुए थे। नवाज शरीफ के प्रधानमंत्री मोदी के साथ बेहतर रिश्ते रहे हैं। मोदी ने पाकिस्तान से संबंधों को सामान्य बनाने का प्रयास भी किया था। वर्ष 2015 में मोदी अचानक नवाज शरीफ को 66वें जन्मदिन की बधाई देने लाहौर पहुंचे थे और उनकी नातिन मेहरुनिस्सा की शादी के रिसेप्शन में शामिल हुए थे। हालांकि पाकिस्तानी सेना को यह पहल पसंद नहीं आई थी। इससे पहले 2004 में अटल बिहारी वाजपेयी ने पाकिस्तान का दौरा करके संबंधों में नरमी लाई थी। कूटनीति के सिद्धांतों के अनुसार, भले ही दोनों देशों के बीच संबंधों की निरंतरता को शत्रुता नियंत्रित करती हो, फिर भी बातचीत जारी रहनी चाहिए। अगर पाकिस्तान ईमानदारी दिखाए और सीमा पार आतंकवाद को प्रायोजित करना बंद करे, तो भारत फिर से बातचीत शुरू कर सकता है। विशेषज्ञ इस पर एकमत हैं कि चीनी राष्ट्रपति भारत के साथ शत्रुता का भाव रखते हैं, जबकि पाकिस्तान से बातचीत शुरू होने पर अमेरिका भी सहज महसूस करेगा।

हालांकि अब स्थितियां बदली हैं और नवाज शरीफ और सेना भारत से रिश्ते में सुधार के लिए एकमत होते दिख रहे हैं, लेकिन आईएसआई को कश्मीर में हिंसा को बढ़ावा देने वाले आतंकियों को समर्थन देना बंद करना होगा। वहीं, प्रधानमंत्री शाहबाज शरीफ को पाकिस्तान को माली हालत से बाहर निकालने के लिए आर्थिक मुद्दों पर ध्यान केंद्रित करना चाहिए। पुलवामा हमले के बाद भारत ने पाकिस्तान से व्यापार रोक दिया था। भारत अभी जल्दबाजी में पाकिस्तान के साथ व्यापार का कोई निर्णय भी नहीं लेगा।

नरेंद्र मोदी का लगातार तीसरी बार प्रधानमंत्री बनने से पड़ोसी देशों पर गहरा असर हुआ है। मोदी अगले पांच वर्ष तक देश की कमान संभालेंगे, ऐसे में विदेश नीति पर पुनर्विचार करना समय की मांग है। साथ ही, सार्क देशों के साथ संबंध सुधारते हुए पाकिस्तान के साथ गतिरोध खत्म करने की पहल करनी होगी, पर पाकिस्तान को कश्मीर फोबिया से बचना होगा।

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