हिंदी पत्रकारिता : वरदान हैं अस्थिरता की भविष्यवाणियां... और कोई न कोई रोशनी की दस्तक दे रही खिड़कियां
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विस्तार
कलम के सिपाहियों का महानायक सेनापति संपादक ही कहा जा सकता है। जमाना तलवार, तोप, टैंक, लड़ाकू विमान या जहाज अथवा मिसाइलों का हो, सेनापति निरंतर तैयारी करते हैं। उन्हें युद्ध अवश्य लगातार नहीं करने होते, लेकिन संपादक का वैचारिक द्वंद्व व्यूह रचना, अपनी कलम के चमत्कार दिखाते हुए अपनी संपादकीय टीम को निरंतर सजग, सटीक, संयमित धारदार, ईमानदार, निष्पक्ष और सफल बनाने की चुनौती हर दिन बनी रहती है। सैनिकों के घाव दिखते ही उपचार की व्यवस्था होती है। लेकिन संपादक के घाव-दर्द को देखना-समझना आसान नहीं और उपचार भी बहुत कठिन। कलम के चमत्कार देखकर लाखों-करोड़ों लोग अभिभूत होते हैं-प्रशंसा करते हैं, असहमत रहने पर आलोचना भी करते हैं। संपादक की निष्पक्षता और गरिमा से उन्हें ‘स्टार’ मानते हैं। लेकिन उनके संघर्ष की भनक बहुत कम लोगों को मिलती है। इसलिए आज के वक्त में आधुनिक भारत के श्रेष्ठतम हिंदी संपादकों में अग्रणी राजेंद्र माथुर (जन्म-7 अगस्त, 1935) से जुड़ी संघर्ष यात्रा की एक झलक पेश करना जरूरी है।
इंदौर के प्रतिष्ठित कॉलेज में प्राध्यापक रहते हुए राजेंद्र माथुर ने प्रदेश के प्रमुख अखबार नईदुनिया में लिखना प्रारंभ किया। राष्ट्रीय-अंतरराष्ट्रीय मामलों पर उनकी टिप्पणियों ने पाठकों को ही नहीं, प्रबंधकों और उनके वरिष्ठतम पार्टनर प्रधान संपादक राहुल बारपुते को भी चमत्कृत कर दिया। इसलिए 1970 में अखबार की पृष्ठ संख्या 8 से 12 तक रखने के लिए संपादकीय विस्तार के साथ राजेंद्र माथुर को प्राध्यापक की नौकरी छोड़ पूर्णकालिक संपादक के रूप में जोड़ लिया गया। 60 के दशक में उनके साप्ताहिक लेख ‘पिछला सप्ताह’ के तहत बहुत प्रसिद्ध हुए। 1980 में उन्हें द्वितीय प्रेस आयोग का सदस्य मनोनीत किया गया। आपातकाल के बाद के चुनावों में उनके लेखों की गूंज अब तक है। 1982 में वह दिल्ली ‘नवभारत टाइम्स’ के प्रधान संपादक के तौर पर आए। यहीं 9 अप्रैल, 1991 को उनका आकस्मिक निधन हो गया।
इस वक्फे में हिंदी पत्रकारिता पर पड़े उनके प्रभाव को अंकित किया जाना बहुत जरूरी है। इतिहास की परतें निकालने के साथ 21वीं सदी की रेखाओं को असाधारण ढंग से कागज पर उतार देने की क्षमता अन्यत्र देखने को नहीं मिलती, इसलिए 1963 से 1969 के बीच राजेंद्र माथुर द्वारा लिखे गए लेख आज भी सामयिक और सार्थक लगते हैं। अगस्त, 1963 में उन्होंने लिखा था, ‘हमारे राष्ट्रीय जीवन में दो बुराइयां घर कर गई हैं, जिन्होंने हमें सदियों से एक जाहिल देश बना रखा है। पहली तो अकर्मण्यता, नीतिहीनता और संकल्पहीनता को जायज ठहराने की बुराई, दूसरी पाखंड की बीमारी, वचन और कर्म के बीच गहरी दरार की बुराई।’ उन्हें भी अखबार के विस्तार के बिना छटपटाहट होती थी। 1990 या 2000 के बाद जो लोग संपादक के वर्चस्व का मुद्दा उठाते हैं, उन्हें ऐसे तथ्यों को भी देखना चाहिए कि अज्ञेय, राजेंद्र माथुर, मनोहर श्याम जोशी, एस. निहाल सिंह, कुलदीप नैयर, बीजी वर्गीज, खुशवंत सिंह जैसे नामी संपादकों को भी प्रबंधकीय सीमाओं से निपटना पड़ता था।
राजेंद्र माथुर ने पुरानी मशीनों की तरह घिसी-पिटी पत्रकारिता को बदलने के लिए सारे मोर्चे खोले। उनकी विशेषता यह थी कि राजनेता या प्रबंधकों के विचार या संबंध कैसे भी हों, अपनी बात की निष्पक्षता और पैनेपन में कमी नहीं आने देते थे। उसे प्रकट करने के उनके अपने तरीके थे। एक बार मैंने चंद्रास्वामी के राजनीतिक षड्यंत्रों को उजागर करने वाली विस्फोटक खबर लिखी। पहले समाचार संपादक की नजर पड़ी। वह दौड़ते हुए मेरी मेज के पास आकर बोले, ‘जानते हैं यह कौन है? उनकी किनसे करीबी है?’ मैंने सहजता से उत्तर दिया, ‘क्या होगा-यह माथुर साहब जानें।’ वह खबर ही नहीं, कम से कम पांच-सात खबरें चंद्रास्वामी के भंडाफोड़ पर छपीं। प्रवर्तन निदेशालय द्वारा न्यायालय तक पहुंचाए गए प्रकरण के आधार पर आतंकवादी गतिविधियों से जुड़े संदिग्ध की राष्ट्रपति भवन के अतिथि कक्ष में रुकने की खबर हो या तत्कालीन मुख्यमंत्री लालू यादव के चारा घोटाले की, जब प्रमाणिकता हो, तो हमेशा उनकी संपादकीय दृढ़ता हर हस्तक्षेप से बचाती थी।
उन दिनों व्यापक बदलाव से हिंदी पत्रकारिता को एक नई दिशा मिल रही थी। उनके लेखन में गांधी, नेहरू, मार्क्स, लोहिया के विचारों का अद्भुत समन्वय देखने को मिलता है। आप उन्हें किसी एक धारा से नहीं जोड़ सकते। उनका जोर भारतीय परंपराओं और संस्कृति का हवाला देते हुए संकीर्णता की बेड़ियां काट आधुनिक दृष्टिकोण अपनाने पर था। वह सभ्यता को अक्षुण्ण रखने के लिए जंगली जिंदादिली को जरूरी मानते थे। फरवरी 1990 में पत्रकारों के एक प्रशिक्षण कार्यक्रम को संबोधित करते हुए उन्होंने अपने सहज अंदाज में कहा था, ‘जीवन से ज्यादा चरित्र महत्वपूर्ण माना जाता है। जिंदगी क्या है, आदमी मर जाना पसंद करेगा, लेकिन अपने यश का मर जाना मर जाने से ज्यादा महत्वपूर्ण है। किसी की यश-हत्या कोई आसानी से कैसे कर सकता है।’
1981 से 1991 के बीच पूरे दशक में भारतीय राजनीति और सामाजिक बदलाव के दौर में माथुर जी के लिखे लेख पत्रकारिता के इतिहास में सदैव याद रखे जाएंगे। इस दौर में पंजाब का आतंकवाद चरम पर पहुंचा और ‘ब्लू स्टार ऑपरेशन’ के बाद इंदिरा गांधी की निर्मम हत्या हुई। फिर राजीव गांधी, विश्वनाथ प्रताप सिंह और चंद्रशेखर सत्ता में आए। देश के इतिहास ने इस अवधि में अनेक करवटें लीं। आर्थिक उदारीकरण का सिलसिला भी इन्हीं वर्षों में शुरू हुआ। रूस, चीन और अमेरिका जैसे देशों में भी बड़ी उथल-पुथल हुई। माथुर साहब ने हर घटना में आशा की एक नई किरण दिखाई। सिद्धांतपरक राजनीति में उनकी गहरी आस्था के कारण ही उन्होंने लिखा, ‘यूरोप में भले ही विचारधारा की लड़ाइयां खत्म हों और इतिहास का अंत हो गया हो, लेकिन भारतीय उपमहाद्वीप में इतिहास का अंत अभी नहीं हुआ, क्योंकि सारा खेल लंबी प्रतीक्षा का है। इसलिए जिसका धैर्य टूटेगा, वह हार जाएगा।’ उन्होंने भारत और पाकिस्तान द्वारा परमाणु बम बनाने से पंद्रह वर्ष पहले ही लिख दिया था, ‘आज नहीं तो कल पाकिस्तान और भारत, दोनों के पास एटम बम होगा और हमें सोच रखना चाहिए कि तब क्या होगा? एटम बम तैयार कर लेने के बाद दोनों देशों को अपना घर ज्यादा संभालना होगा। संभले हुए देश की एकता को एटम बम मजबूत करेगा, लेकिन टूटते देश की टूटन को वह अधिक सुगम बना सकता है।’
राजीव गांधी की निर्मम हत्या के बाद जब कई पत्रकार देश के टूटने तक की बात लिख रहे थे, तब उन्होंने लिखा, ‘वरदान हैं अस्थिरता की भविष्यवाणियां।’ इसी शीर्षक से एक लेख में उन्होंने कहा, ‘विनोबा ने एक धर्मग्रंथ का हवाला देते हुए कभी पूछा था कि यदि आपको यह जानकारी हो कि कल ही मरना है, तो आज का दिन आप कितनी सात्विक हड़बड़ी में बिताएंगे? और उन्होंने सलाह दी थी कि आदमी को अपनी जिंदगी का हर दिन इसी एहसास के साथ जीना चाहिए कि यही आखिरी दिन है...खिलकर मुरझाने वाली कुमुदिनी तीन सौ साल तक खड़े रहने वाले बरगद से कहीं ज्यादा सुंदर है। यदि खिले हुए फूल की पंखुड़ियों पर इस फिक्र की सलवटें पड़ने लगीं कि सारी खूबसूरती आनी-जानी है, तो बताइए इस संसार का क्या होगा!’
इस तरह के विचार लिखते समय उन्हें क्या कभी यह महसूस होता था कि अचानक भारतीय पत्रकारिता का सूर्य सुदूर बादलों में कहीं छिप जाएगा?