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उस भाषण की याद

Sun, 01 Dec 2019 06:47 PM IST
Raman Singh तवलीन सिंह
तवलीन सिंह Published by: Raman Singh Updated Sun, 01 Dec 2019 06:47 PM IST
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Memory of that speech
तवलीन सिंह - फोटो : a

पिछले दिनों मुझे नरेंद्र मोदी का एक भाषण बहुत याद आया। उन्होंने वह भाषण पेरिस में प्रवासी भारतीयों के एक समूह को संबोधित करते समय दिया था। वह उनके प्रधानमंत्री बनने के कुछ ही महीने बाद की बात थी, जब मोदी के हर भाषण में नया जोश, नई उमंगें दिखती थीं। सो अपने श्रोताओं में नौजवानों को देखकर उन्होंने थोड़ा भावुक होकर कहा था कि बतौर प्रधानमंत्री उनकी कोशिश भारत को एक ऐसा देश बनाने की होगी, जिसमें रोजगार के इतने सारे अवसर होंगे कि किसी नौजवान को देश छोड़कर नौकरी की तलाश में किसी दूसरे देश में जाने की आवश्यकता नहीं पड़ेगी।


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उस भाषण की याद मुझे इसलिए आ रही है, क्योंकि मैं यह लेख न्यूयॉर्क से भेज रही हूं और यहां भारतीय नौजवानों को छोटी-मोटी नौकरियां करते देखकर मुझे अच्छा नहीं लगता। मेरी आदत सुबह उठकर बाहर निकल टहलने की है, सो यहां भी इस महानगर के विशाल सेंट्रल पार्क में मैं ऐसा करती हूं। वापस लौटते वक्त अक्सर भारतीय नौजवान मजदूरी करते हुए दिखते हैं। आज सुबह वापस आते समय कुछ सिख नौजवान दिखे, सो मैंने रुककर उनसे पंजाबी में बातें कीं। जब उनसे मैंने पूछा कि देश से इतनी दूर आकर क्या उनका दिल लग गया है, तो उन्होंने मुस्कराकर कहा कि उन्हें भारत छोड़े कोई पंद्रह वर्ष हो गए हैं, तो दिल लग ही गया है। दिल इसलिए लगाना पड़ता है कि पंजाब में खेती से उन्हें किसी भी तरह इतनी कमाई नहीं हो सकती, जो यहां मज़दूरी करने से होती है। देश की याद आती तो है, लेकिन मजबूरी है, सो यहां आना पड़ा है। न्यूयॉर्क में हर दूसरा मजदूर या तो भारत से आया है, या पाकिस्तान से। यहां आकर ये लोग वे सारे काम करते हैं, जो अमरिकी नहीं करना चाहते।

भारत में भी बांग्लादेश से आए जिन लोगों को गृह मंत्री ‘दीमक’ कहते हैं, वे असल में आर्थिक शरणार्थी हैं। सो इनके साथ सहानुभूति होनी चाहिए, क्योंकि हमारे देशवासी भी मजबूर होकर रोजगार की तलाश में देश छोड़कर बाहर जाते हैं। दलालों को लाखों रुपये देकर अवैध रास्तों से भी अमेरिका आते हैं।

नरेंद्र मोदी के प्रधानमंत्री काल में गरीबों के जीवन को बेहतर बनाने के लिए बहुत कुछ किया गया है। दूर-दराज में मैंने गांव देखे हैं, जहां घरों में गैस सिलेंडर हैं, गरीबों के घरों में बिजली पहुंच गई है। प्रधानमंत्री आवास योजना के तहत कच्चे मकानों में रहने वाले गरीब लोगों को पैसा मिला है। इन सब चीजों के बावजूद अब तक मोदी रोजगार नहीं दे पाए हैं। रोजगार के नए अवसर पैदा इसलिए नहीं हुए हैं, क्योंकि निजी क्षेत्र में अभी तक इतनी गहरी मंदी छाई हुई है कि क्षमतावान निवेशक सामने आने को तैयार नहीं हैं। जो हिम्मत करके तैयार हो भी जाते हैं, उन्हें बैंकों से ऋण नहीं मिलता है, क्योंकि बैंकों की हालत बहुत कमजोर है।

बैंक इसलिए कमजोर हैं कि नीरव मोदी जैसे लोगों ने बैंकों के आला अफसरों को रिश्वत देकर तकरीबन डाका डालने का काम किया है। हाल में पंजाब ऐंड महाराष्ट्र को-ऑपरेटिव बैंक (पीएमसी) में हुए घोटाले ने मुझे हैरान कर दिया है। विश्वास करना मुश्किल है कि चोरों को बार-बार ऋण कैसे दिया गया! समस्या यह है कि जब तक सरकारी बैंकों में सुधार नहीं आता या उनका निजीकरण नहीं होता है, आर्थिक मंदी दूर होती नहीं दिखती है। और न ही रोजगार के नए अवसर पैदा होने की संभावनाएं दिखती हैं। सो निकट भविष्य में भी भारत के नौजवान रोजी-रोटी की तलाश में विदेशों में पलायन करते रहेंगे।

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