भागवत के भाषण का मतलब
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राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ वैसे तो पिछले नब्बे साल या नौ दशक से अस्तित्व में है, लेकिन पिछले वर्ष जून से जो ताकत और प्रभाव उसके पास है, इससे पहले उनकी कल्पना नहीं की जा सकती थी। इससे पहले 1998 से 2004 तक छह साल तक केंद्र में राजग की सरकार थी, लेकिन तब की तुलना में संघ अभी बहुत मजबूत स्थिति में है। संघ की इस बढ़ी हुई शक्ति के दो कारण हैं-एक तो यही कि संघ के सरसंघचालक मोहन भागवत और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के बीच बेहद मधुर संबंध हैं। इसके अलावा भारतीय जनता पार्टी के नेतृत्व में तीस साल बाद केंद्र में पूर्ण बहुमत की एक सरकार बनी है। ऐसे में, मोहन भागवत और नरेंद्र मोदी के बीच के सौहार्दपूर्ण रिश्ते को देखते हुए भाजपा के नेतृत्व वाली इस सरकार में संघ का प्रभाव अभूतपूर्व है।
संघ के सरसंचालक के पास वैसे तो साल भर में अनेक काम होते हैं, लेकिन दशहरा या विजयादशमी का उनका संबोधन सबसे महत्वपूर्ण माना जाता है, जो उसी दिन सुबह होता है। संघ के प्रथम सरसंघचालक केशव बलिराम हेडगेवार के समय से ही दशहरा संबोधन की प्रथा रही है। अमूमन इस भाषण में संघ के एक साल के कार्यकलापों का विवरण और इसके कार्यकर्ताओं के लिए अगले एक साल का दिशानिर्देश रहता है। लेकिन पिछले साल से इस संबोधन का स्वरूप थोड़ा बदला है। दरअसल वाजपेयी काल की तुलना में सरसंघचालक के विजयादशमी संबोधन में मीडिया की मौजूदगी अब अधिक रहती है। इसके अलावा मौजूदा केंद्र सरकार में भी इस भाषण की अनुगूंज सुनी जाती है।
इस दशहरे पर मोहन भागवत का संबोधन महत्वपूर्ण था। दरअसल मोदी सरकार के केंद्र में आने के बाद जो शुरुआती उत्साह था, वह अब खत्म हो गया है। इतना ही नहीं, हाल की कुछ घटनाओं ने इस सरकार की चुनौतियां भी बढ़ा दी हैं। लिहाजा यह उत्सुकता थी कि अपने वार्षिक संबोधन में भागवत दादरी या दूसरी उन घटनाओं का उल्लेख करेंगे या नहीं, जिन पर इन दिनों सर्वाधिक चर्चा हुई है। भागवत ने इन घटनाओं की अनदेखी तो की, लेकिन पूरी तरह नहीं। उन्होंने कहा कि छोटी-छोटी घटनाएं होती हैं, लेकिन उन्हें बढ़ा-चढ़ाकर पेश किया जाता है...। छोटी घटनाएं होती रहती हैं, लेकिन ये भारतीय संस्कृति, हिंदू संस्कृति को नष्ट नहीं कर सकतीं। प्राचीन काल से ही यह संस्कृति विविधता का सम्मान करती है, विविधता में एकता स्थापित करती है... यही हिंदुत्व है।
भागवत ने जब दादरी सहित ऐसी दूसरी घटनाओं को समाज में असहिष्णुता बढ़ाने वाली घटनाएं मानने से इन्कार किया, तो अपने हिसाब से वह सही रहे होंगे। लेकिन इसका मतलब यह नहीं कि हम भी इन घटनाओं को उसी तरह देखें, जिन्होंने समाज में बहस का मुद्दा बदल दिया है, यहां तक कि बिहार के विधानसभा चुनाव में भी इन घटनाओं की अनुगूंज है। बल्कि ज्यादा गहराई से सोचें, तो भागवत के विचारों की व्याख्या इस तरह से की जा सकती है कि इस देश के अल्पसंख्यकों को उसी तरह रहना होगा, जैसा कि बहुसंख्यक समाज तय कर करेगा। अगर भागवत के ये विचार उत्तर प्रदेश के, जो कि सांप्रदायिक असहिष्णुता के मामले में बारूद के ढेर पर है, विधानसभा चुनाव से पहले आते, जो कि 2017 में तय है, तो इसके निहितार्थ बेहद गंभीर हो सकते थे। लेकिन इसके अलावा भी भागवत के दशहरा संबोधन के कई अन्य पहलुओं पर विचार करना जरूरी है।
भागवत ने अपने संबोधन में केंद्र सरकार के कई कार्यक्रम का अनुमोदन किया और यह बताया कि मोदी सरकार सही रास्ते पर है। दिलचस्प यह है कि खुद मोदी भी कई बार इस तरह की बातें कर चुके हैं। उदाहरण के लिए, भागवत ने कहा कि जनता अगर अपना जीवन स्तर सुधारने या दूसरी बेहतर चीजों के लिए सरकार से ही उम्मीद करे, तो यह गलत है। मोदी ने भी खासकर स्वच्छता के प्रसंग में यह बात कही है कि किस तरह आम लोग साफ-सफाई का काम अपने हाथ में लेकर भारत को एक स्वच्छ देश बना सकते हैं।
लेकिन सुझावों के मामले में दोनों नेताओं में फर्क है। मोदी जहां स्वयं सहायता को समाधान बताते हैं, वहीं भागवत लोगों का संगठित होना जरूरी मानते हैं। यह अंतर बताता है कि जब दो स्वयंसेवक अलग-अलग भूमिकाओं में होते हैं, तो उनके लक्ष्य में भी फर्क होता है। जाहिर है, यहां एक स्वयंसेवक सत्ता राजनीति के शीर्ष पर है, तो दूसरा संघ में है और पूरी तरह संगठन और समाज निर्माण के काम में लगा हुआ है। एक तरफ मोदी हैं, वर्ष 1980 में भाजपा में भेजे जाने के बाद जिन्होंने पार्टी को सत्ता तक पहुंचाने में ज्यादा जोर लगाया, और अब जिनका लक्ष्य अपनी स्थिति मजबूत करना है, तो दूसरी तरफ संघ के नेता हैं, जो हिंदुत्व की ताकतों को एकजुट करने में लगे हुए हैं। जाहिर है, इस मुद्दे पर संघ में कोई भ्रम नहीं है, क्योंकि भागवत ने अपने संबोधन में कहा कि संघ और उसके नेता पिछले नौ दशकों से हिंदुत्व के आधार पर हिंदू समाज को संगठित करने के अपने लक्ष्य में लगे रहे, और भविष्य में भी उनका यही लक्ष्य रहेगा!
भागवत का संबोधन साफ तौर पर बताता है कि पिछले नब्बे वर्षों से संघ ने हिंदू समाज की ताकत मजबूत करने की कोशिश की है, चाहे वह सकारात्मक मुद्दों के जरिये हो या नकारात्मक अभियान के द्वारा, जब संघ के नेताओं ने गैरहिंदू समाजों के बारे में पूर्वाग्रह फैलाने की कोशिश की। जब सरसंघचालक ने एक ही साथ 'वोट बैंक राजनीति' और 'जनसंख्या नीति' की बात की, तो साफ हो गया कि संघ अपनी पुराने एजेंडे पर है। भागवत चाहते, तो इसका जिक्र नहीं भी कर सकते थे। बढ़ती आबादी एक समस्या है, इसमें संदेह नहीं, लेकिन इसे पूर्वाग्रहग्रस्त नजरिये से नहीं देखा जा सकता।
वरिष्ठ पत्रकार और नरेंद्र मोदी-द मैन, द टाइम्स के लेखक