जीवन धारा: हंसी से दिल जीतने का वरदान मनुष्य के ही पास, चेहरे पर लाएं मुस्कान
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विस्तार
मानव-वंश की विशेषताओं में हंसी की भी गिनती होती है। सभी प्राणियों में मनुष्य ही हंसता है, ऐसा लोगों का विश्वास रहा है। यद्यपि इस धारणा का खंडन जगदीशचंद्र बसु के प्रयोगों ने कर दिया है और अब माना जाने लगा है कि जीव-जंतु की क्या बात, पेड़-पौधे भी हंसते हैं। किंतु तो भी मनुष्य की हंसी, उसकी अन्य कई विशेष खूबियों की तरह, कुछ और ही है। उच्च अट्टहास से लेकर मधुर-मुस्कान तक, हास्य की एक ऐसी सरणी उसके जीवन से जुड़ी है कि जब-जब उसकी कल्पना कीजिए, विस्मय विमुग्ध हो जाना पड़ता है! जीव-जंतु के जीवन में भी हास्य की धारा प्रवाहित होती होगी, पेड़-पौधों के रेशों में भी गुदगुदी दौड़ती होगी, मानता हूं। किंतु भी जोरों का ठहाका लगाकर छतों को हिला देना, कभी खिलखिलाहट से सारे कमरे को फूलों की सुवास से भर देना और कभी हल्की मुस्कराहट से किसी के दिल को जीत लेना, यह वरदान तो मनुष्य को ही मिला है।
और, यह वरदान है तो हम मानवों में, जिनमें से कुछ लोगों पर इसकी अजस्र वर्षा की गई, उनमें स्वर्गीय पंडित जगन्नाथप्रसाद चतुर्वेदी का नाम पहली पंक्ति में लिखा जाएगा। जैसी उन्मुक्त हंसी मैंने चतुर्वेदीजी में पाई थी, वैसी हंसी अन्यत्र नहीं मिली। चतुर्वेदीजी को उनके जीवन में ‘हास्यरसावतार’ की उपाधि हिंदी-संसार ने सर्वसम्मति से दे रखी थी। वह जहां भी रहते, हंसी की फुलझड़ियां छूटती रहतीं। जिस साहित्य-गोष्ठी में वह पहुंच जाते, वहां का सारा वातावरण ही हास्य-रस से ओतप्रोत हो जाता। जहां चतुर्वेदीजी हों, वहां मनहूसियत रह नहीं सकती थी। प्रकृति ने उन्हें ऐसा रूप दिया था, जिस पर हंसी वैसी ही खिलती थी, जैसी कुमुद-वन में शरद की शुभ्र चांदनी खिलती है। गोरा-चिट्टा चेहरा, सजे-संवरे बाल, सिर पर कलंगीदार मुरेठा, पतली भवों के नीचे हंसती हुई आंखें, उन पर सुनहले फ्रेम का चश्मा, काली मूंछें, चमकीले दांत, छोटी ठुड्डी, मैंने 1918 में, जबकि वह बिहार-प्रादेशिक हिंदी साहित्य सम्मेलन के प्रथम अधिवेशन का सभापतित्व कर रहे थे, उन्हें इस रूप में देखा था। सभापति को गंभीर होना चाहिए, यह धारणा तो आज तक बनी हुई है, किंतु जब चतुर्वेदीजी अगणित मालाओं से लदे अपना सभापति का भाषण सुनाने के लिए उठे, और, एक मंद मुस्कराहट से, सोनपुर मेले में ठसाठस भरे विशाल हॉल में दर्शकों की ओर देखा, तो ऐसा लगा कि सबके हृदय को वह तार छू गया, जो आनंद की लहर दौड़ा देता है और जब उन्होंने भाषण शुरू किया, तो भाव-विमुग्ध ही न रहे, बल्कि बीच-बीच में सभा-भवन अट्टहास से गुंजित होता रहा। एक दिन उनकी धर्मपत्नी अपने दोनों बेटों को बड़े प्रेम से खिला रही थीं और वह तालियां बजाकर गा रहे थे-‘कल्लू मल्लू दोनों भाई, बैठे प्रेम से खाते हैं। बैठी माता खिला रही है, खड़े पिताजी गाते हैं।।’ चतुर्वेदीजी और लोगों को प्रफुल्लित करने के उनके अनेक किस्से हैं। कहने का मतलब यह है, हमारे पूर्वजों की वह उन्मुक्त हंसी और जिंदादिली हमारे जीवन में उतरे और हमारे अनुवर्ती उनका अनुसरण करें, यही हमारी कामना है।
सूत्र:चेहरे पर लाएं मुस्कान
मौजूदा दौर में इन्सान के जीवन में इतनी भागदौड़ है कि वह अपनी अलग ही धुन में भागा चला जा रहा है। काम का बोझ है, गृहस्थी के कलेश हैं, किसी को शरीर का कष्ट है, तो कोई आर्थिक तंगी से जूझ रहा है। ऐसे में हम यदि किसी के चेहरे पर कुछ पल के लिए मुस्कान ला दें, तो इससे बड़ा कोई काम नहीं।