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बदलाव का जनादेश
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जश्न मनाते झामुमो कार्यकर्ता
- फोटो : a
आदिवासी बहुल राज्य झारखंड विधानसभा चुनाव के नतीजे कई मायनों में महत्वपूर्ण हैं। भारतीय जनता पार्टी को इस चुनाव में न केवल भारी नुकसान उठाना पड़ा है, बल्कि सत्ता भी गंवानी पड़ी है। यानी भाजपा के हाथ से एक और राज्य फिसल गया है। झारखंड मुक्ति मोर्चा (झामुमो), कांग्रेस और राष्ट्रीय जनता दल (राजद) गठबंधन न केवल स्पष्ट बहुमत के साथ सरकार बनाने की स्थिति में है, बल्कि झामुमो राज्य में सबसे बड़ी पार्टी बनकर भी उभरी है।
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इन नतीजों से स्पष्ट है कि लोग मौजूदा सरकार से पूरी तरह परेशान थे और विकल्प के लिए विपक्ष की तरफ देख रहे थे। इसके अलावा, राज्य के लोगों ने राष्ट्रीय मुद्दों के बजाय स्थानीय मुद्दों पर ज्यादा ध्यान दिया। स्थानीय मुद्दों का मतलब, लोगों की आर्थिक परेशानी, रोजी-रोटी और जल, जमीन, जंगल जैसे आदिवासियों को प्रभावित करने वाले मुद्दे। वहां पर रघुबर दास की सरकार ने छोटानागपुर टेनेंसी ऐक्ट (सीएनटी) और संथाल परगना टेनेंसी ऐक्ट (एसपीटी) में संशोधन किया था, जो आदिवासियों को पसंद नहीं आया। आदिवासियों के साथ विपक्षी दलों ने यह कहकर इसका विरोध किया था कि इस संशोधन से आदिवासी कहीं के नहीं रहेंगे और अब उनके जल-जंगल-जमीन भी पूंजीपतियों को बांट दिए जाएंगे। उल्लेखनीय है कि झारखंड की करीब सवा तीन करोड़ की आबादी में 26 फीसदी से ज्यादा आबादी आदिवासियों की है। इन नतीजों से स्पष्ट दिखता है कि राज्य के नाराज आदिवासी मतदाता इस बार झामुमो के पाले में गए हैं और गैर आदिवासी मतदाताओं का वोट भी एकमुश्त भाजपा को नहीं मिला है। यह बहुत दिलचस्प बात है कि गैर-आदिवासी मतदाताओं का वोट विभिन्न दलों के बीच बंटा है। अगर गैर-आदिवासी मतदाताओं का वोट भी एकमुश्त भाजपा को मिलता, तो संभवतः भाजपा यह चुनाव जीत जाती।
इसके अलावा भाजपा ने महाराष्ट्र में गैर मराठा और हरियाणा में गैर जाट की तरह झारखंड में भी वर्चस्वशाली समुदाय की उपेक्षा करके गैर आदिवासी रघुबर दास को मुख्यमंत्री बनाया। इसको लेकर लोगों में नाराजगी थी, और यह नाराजगी इस चुनाव में भी दिखी। राज्य में गैर-आदिवासी मुख्यमंत्री का होना भी इस बार के चुनाव में एक बड़ा मुद्दा बना था। इससे भाजपा बहुत परेशान थी। इस वजह से चुनाव के उत्तरार्ध में नरेंद्र मोदी को चुनाव प्रचार में लाया गया और उनके नाम पर वोट देने की अपील की गई। लेकिन लगता है कि रघुबर दास के कारण जो भाजपा को नुकसान हुआ था, उसकी भरपाई नरेंद्र मोदी भी पूरी तरह से नहीं कर पाए। जिस तरह महाराष्ट्र में मराठा वोट शरद पवार और शिवसेना की तरफ चला गया था, उसी तरह झारखंड में आदिवासी वोट लगभग पूरी तरह से हेमंत सोरेन की पार्टी झामुमो के पक्ष में गया। साफ है कि गैर-आदिवासी मुख्यमंत्री के प्रयोग को राज्य के लोगों ने नकार दिया।
राज्य के मतदाताओं ने लोकसभा चुनाव के विपरीत रोजी-रोटी के सवाल पर और आर्थिक मुश्किलों के मुद्दे पर मतदान किया है। भाजपा ने अपने चुनाव प्रचार में स्थानीय मुद्दों को नहीं उठाया, बल्कि राष्ट्रीय मुद्दों को ज्यादा तवज्जो दी। जबकि विपक्षी दलों ने स्थानीय मुद्दों को ज्यादा उठाया, जैसे स्थानीय लोगों को रोजगार में ज्यादा तवज्जो देना, गरीबों, किसानों को आर्थिक सहायता देना आदि। जिस तरह से महाराष्ट्र में शिवसेना ने किसानों की समस्या को, सामाजिक कल्याण कार्यक्रमों को अपने एजेंडे में प्रमुखता दी, उसी तरह से झामुमो गठबंधन ने भी इन सब बातों को चुनाव में उठाया, जिसका फायदा उसे मिला।
इसके अलावा भाजपा ने एक और गलती की, अपने सहयोगी दलों के साथ गठबंधन न करके। भाजपा को लग रहा था कि अगर हम अपने सहयोगी दलों के साथ गठबंधन करेंगे, तो हमें उन्हें ज्यादा सीटें देनी पड़ेंगी। भाजपा को लगा कि अगर हम अपने बूते बेहतर नतीजे लाते हैं, तो सहयोगी दलों के साथ सीटें क्यों साझा करें? और अगर चुनाव के बाद सरकार गठन के लिए थोड़ी-बहुत सीटें घटीं, तो फिर इन्हीं दलों के साथ चुनाव के बाद गठबंधन कर लेंगे। इससे भाजपा को बड़ा नुकसान हुआ। अगर भाजपा ने अपने सहयोगी दलों के साथ गठबंधन किया होता, तो उसे निश्चित रूप से हार का मुंह नहीं देखना पड़ता। भले ही आजसू को उम्मीद के मुताबिक सीटें नहीं मिल पाईं, लेकिन उसने अलग चुनाव लड़कर भाजपा को बहुत नुकसान पहुंचाया। तो इस नतीजे का भाजपा के लिए स्पष्ट संदेश है कि वह आगे के चुनावों में, खासकर बिहार में अपने सहयोगी दलों के साथ गठबंधन करके चुनाव में उतरे। इसके साथ ही भाजपा के कई मौजूदा विधायकों के टिकट काटे गए, उसका भी पार्टी को नुकसान उठाना पड़ा। सरयू राय का टिकट काट दिया गया, जिसके कारण उन्होंने बगावत करके रघुबर दास के खिलाफ निर्दलीय उम्मीदवार के रूप में चुनाव लड़ा। नतीजा यह हुआ कि रघुबर दास अपनी सीट भी नहीं बचा पाए।
एक और दिलचस्प बात है कि भाजपा के खिलाफ नाराजगी का फायदा कांग्रेस को उतना नहीं मिल रहा है, जितना क्षेत्रीय पार्टियां उठा रही हैं। ऐसा ही महाराष्ट्र और हरियाणा के चुनाव में भी दिखा था। कांग्रेस के मुकाबले झारखंड में झामुमो की सफलता की दर बहुत ज्यादा है। इसी तरह महाराष्ट्र में भी एनसीपी की सफलता की दर कांग्रेस से ज्यादा थी और कांग्रेस को वहां जो सफलता मिली, वह भी एनसीपी के साथ होने की वजह से। इसलिए कांग्रेस के लिए यह संदेश है कि उसे कनिष्ठ सहयोगी के रूप में ही रहना होगा।
झामुमो गठबंधन को सफलता इसलिए भी मिली कि उसने इस बार एकजुट होकर चुनाव लड़ा और गठबंधन ने पहले ही मुख्यमंत्री के प्रत्याशी के रूप में हेमंत सोरेन का चेहरा सामने कर दिया था। आगे के चुनावों में भी विपक्ष अगर इसी तरह एकजुट होकर स्पष्ट चेहरे के साथ स्थानीय और जनसरोकार से जुड़े मुद्दों को लेकर चुनाव लड़ेगी, तभी उसे सफलता मिल सकती है, क्योंकि भाजपा की चुनावी मशीनरी बहुत मजबूत है। भाजपा के लिए भी संदेश है कि वह वर्चस्वशाली समुदाय का ख्याल करे, गठबंधन सहयोगियों को साथ लेकर चले, खासकर तब, जब लोग आर्थिक संकट का सामना कर रहे हैं और जन सरोकार से जुड़े स्थानीय मुद्दों को तवज्जो दे।