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मालदीव से संदेश: इरादे जताने के बाद भी नये राष्ट्रपति के लिए आसान नहीं है चीन से निकटता

Thu, 05 Oct 2023 06:30 AM IST
Mahendra Ved महेंद्र वेद
Updated Thu, 05 Oct 2023 06:30 AM IST
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सार
राष्ट्रपति चुने जाने के तत्काल बाद चीन समर्थक मुइज ने मालदीव में तैनात भारतीय सैनिकों को हटाने की बात कर अपने इरादे साफ कर दिए हैं। हालांकि चीन के कर्ज में डूबे श्रीलंका की बदहाली को देखते हुए मालदीव की नई सरकार का चीन की तरफ झुकना उतना आसान भी नहीं होगा।
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Maldives new president Mohamed Muizzu relation with China and india
Mohamed Muizzu - फोटो : सोशल मीडिया

विस्तार

एक समय था, जब भारत कहता था और सभी गणमान्य नेता बिना कुछ किए इस बात से सहमत होते थे कि हिंद महासागर क्षेत्र में शांति होनी चाहिए। पिछली शताब्दी के शीतयुद्ध काल के नारे और भावनाओं ने बढ़ती भारत-चीन प्रतिद्वंद्विता को जन्म दिया, जिसमें अन्य शक्तिशाली देश गहरी दिलचस्पी ले रहे हैं।



इस क्षेत्र के तीन देशों-नेपाल, श्रीलंका और मालदीव ने हाल के वर्षों में या तो भारत समर्थक या चीन समर्थक सरकारें चुनी हैं। बीते रविवार यानी एक अक्तूबर को हुए राष्ट्रपति चुनाव में मालदीव ने एक ऐसे व्यक्ति को चुना है, जो घोषित रूप से चीन समर्थक है। मोहम्मद मुइज ने 54 फीसदी से अधिक वोट पाकर इब्राहिम सोलिह को निर्णायक रूप से हरा दिया। वर्ष 2008 के बाद से वहां कोई भी राष्ट्रपति दोबारा चुनाव नहीं जीत सका है।


चुनाव जीतने के बाद मुइज ने इस नतीजे को 'मालदीव की स्वतंत्रता वापस पाने के लिए एक मजबूत निर्णय' बताया। संदेश यह है कि हर चुनाव के साथ स्वतंत्रता आती-जाती रहती है, जो इस बात पर निर्भर करता है कि कौन जीतता है और कौन हारता है। पांच साल पहले जब सोलिह जीते थे, तो उनके पूर्ववर्ती चीन-समर्थक अब्दुल्ला यामीन को भ्रष्टाचार के आरोप में 11 वर्ष की जेल की सजा हुई थी। मुइज चाहते हैं कि सोलिह यामीन को 17 नवंबर को होने वाले सत्ता हस्तांतरण से पहले जेल से निकाल दें और उन्हें नजरबंद कर दें।

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने मुइज को बधाई दी और सहायता व परियोजनाओं समेत संबंधों को जारी रखने के प्रति भारत की प्रतिबद्धता को दोहराया। लेकिन मालदीव की राजधानी माले से आने वाली सभी खबरें बताती हैं कि यह परिवर्तन भारत से हिंद महासागर द्वीपसमूह के लिए चीन समर्थक बदलाव की शुरुआत कर सकता है। मुइज के प्रोग्रेसिव एलायंस गठबंधन ने अतीत में खुलेआम चीन के साथ संबंधों का समर्थन किया है। इससे सोलिह के कार्यकाल के दौरान की 'इंडिया फर्स्ट' नीति समाप्त हो जाएगी, जिसके संकेत भी मिलने लगे हैं।

चुनाव जीतते ही मुइज ने कहा है कि वह अपने चुनावी वादे पर डटे हुए हैं और भारतीय सेना को मालदीव के द्वीपसमूह से हटाएंगे। पारंपरिक रूप से मालदीव भारत के प्रभाव में रहा है। लेकिन नई दिल्ली और बीजिंग, दोनों ने बुनियादी ढांचे और विकास परियोजनाओं के लिए मालदीव को लाखों डॉलर ऋण और अनुदान के रूप में दिए हैं।

दोनों सामरिक रूप से महत्वपूर्ण मालदीव में अपनी उपस्थिति मजबूत बनाने की कोशिश कर रहे हैं, जो व्यस्त रहने वाले पूर्व-पश्चिम शिपिंग लेन तक फैला है। अपनी तेजी से बढ़ती नौसेना के साथ चीन रणनीतिक रूप से महत्वपूर्ण स्थान तक अपनी पहुंच बनाना चाहेगा, जिसे भारत रोकना चाहता है। बीजिंग खाड़ी से अपनी ऊर्जा आपूर्ति की भी रक्षा करना चाहेगा, जो उसी मार्ग से होकर गुजरती है। यह मालदीव में 'आयाराम-गयाराम' की स्थिति को बतलाता है। पश्चिमी जगत चाहेगा कि भारत वहां टिका रहे और रणनीतिक कारणों से अपने प्रभाव का विस्तार करे। इसके अलावा, मालदीव एक लोकप्रिय पर्यटन गंतव्य है। पर अब हर कोई सरकार में बदलावों के साथ-साथ राजनीतिक और आर्थिक प्राथमिकताओं से सहमत दिखता है।

मालदीव में भारत-चीन कारक हावी है। पिछले दशक में नई दिल्ली ने मालदीव को दो हेलिकॉप्टर और एक छोटा विमान दिया था। वर्ष 2021 में मालदीव के रक्षा बल ने कहा कि भारतीय विमानों के संचालन और रख-रखाव के लिए लगभग 75 भारतीय सैन्यकर्मी मालदीव में थे। उसके तुरंत बाद विपक्ष ने 'इंडिया आउट' अभियान शुरू किया, जिसमें मांग की गई कि भारतीय सुरक्षाकर्मी मालदीव से चले जाएं। विपक्ष ने भारत के साथ सोलिह के संबंधों पर लगातार ध्यान केंद्रित किया, खासकर मालदीव में भारतीय सुरक्षाकर्मियों की कथित तैनाती पर।

लेकिन मालदीव सरकार ने उस द्वीपीय राष्ट्र में किसी भी तरह की भारतीय सैन्य गतिविधि को खारिज कर दिया। मतदान से ठीक एक दिन पहले विदेश मंत्री अब्दुल्ला शाहिद ने इन्हीं चिंताओं को संबोधित करने के लिए एक इंटरव्यू दिया, जिसमें उन्होंने कहा कि हेलिकॉप्टर और डोर्नियर हवाई जहाजों को संचालित करने के लिए लाए गए भारतीय सैनिकों की संख्या में यामीन सरकार के बाद कोई बदलाव नहीं किया गया है। लेकिन इसका कोई असर नहीं हुआ और पासा भारत के खिलाफ तथा चीन के पक्ष में चला गया।

नवीनतम परिवर्तन का मतलब यह हो सकता है कि प्रमुख भारतीय परियोजनाओं का भविष्य भी अधर में लटक सकता है। वर्ष 2012 के तख्तापलट में नाशीद के अपदस्थ होने के बाद यामीन शासन ने माले अंतरराष्ट्रीय हवाई अड्डे के विकास और संचालन के लिए भारतीय कंपनी जीएमआर समूह के साथ किए अनुबंध को एकतरफा खत्म कर दिया।

जीएमआर समूह ने बाद में मालदीव सरकार से मुआवजा पाने का मध्यस्थता मुकदमा जीत लिया। उसके बाद बड़ी चीनी कंपनियां मालदीव आईं और प्रमुख बुनियादी ढांचे का निर्माण किया। लेकिन चीन की तरफ मालदीव का वापस लौटना आसान नहीं होगा, बल्कि मालदीव चीन के गहरे कर्ज में डूब जाएगा। मालदीव के पूर्व राष्ट्रपति और अब संसद के स्पीकर मोहम्मद नाशीद कहते हैं कि चीनी कर्ज 3.1 अरब डॉलर का है। इसमें सरकार से सरकार को ऋण, राज्य उद्यमों को दिया गया ऋण और मालदीव सरकार की गारंटी पर निजी क्षेत्र को दिया गया ऋण शामिल है।

हालांकि इस आंकड़े पर विवाद है। मालदीव के कुछ अधिकारियों और चीनी प्रतिनिधियों का अनुमान है कि माले पर चीन का बकाया 1.1 अरब डॉलर से 1.4 अरब डॉलर के बीच है, जो इस द्वीपीय देश के लिए तब भी बड़ी रकम है। मालदीव का जीडीपी करीब 4.9 अरब डॉलर है। यदि नाशीद के आंकड़ों को मानें, तो ऋण देश के वार्षिक जीडीपी के आधे से अधिक है। यदि सरकार के राजस्व में कमी होती है, तो उसे 2022-23 तक ऋण चुकाने में कठिनाई हो सकती है।

यदि मालदीव ऋण भुगतान करने से चूक जाता है, तो उसे भी पड़ोसी श्रीलंका जैसी स्थितियों का सामना करना पड़ सकता है, जिसके ऊपर चीन का अरबों डॉलर बकाया है। नेपाल में भी कई चुनावों में ऐसी सरकारें बनी हैं, जो या तो नई दिल्ली समर्थक रही हैं या बीजिंग समर्थक। मालदीव और श्रीलंका के विपरीत, नेपाल की भौगोलिक स्थिति यह तय करती है। जैसे-जैसे दक्षिण एशिया वैश्विक चीन बनाम अमेरिका के झगड़े में आता जा रहा है, लगता है कि यही उसकी नियति है।

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