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आकलन: पवार, पावर और राजनीतिक गुगली के बीच भाजपा की चुनावी चौसर

Thu, 11 May 2023 07:05 AM IST
Shankar Ayair शंकर अय्यर
Updated Thu, 11 May 2023 07:05 AM IST
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सार
महाराष्ट्र में लोकसभा की 48 सीटें हैं, जो भाजपा के मिशन-2024 के लिए मायने रखती हैं। आकलन यह है कि भाजपा को जीत के लिए राकांपा से गठबंधन की जरूरत है। ऐसे में, राकांपा नेताओं पर जांच एजेंसियों का दबाव बढ़ाया और सत्ता में हिस्सेदारी का विकल्प भी दिया जा सकता है। पर वोट बैंक की चाबी शरद पवार के पास है।
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Maharashtra Politics NCP Chief Sharad Pawar political power bjp plan for lok sabha elections 2024
शरद पवार (फाइल फोटो) - फोटो : पीटीआई

विस्तार

कहते हैं कि राजनीति में एक हफ्ते का समय काफी लंबा होता है। लेकिन महाराष्ट्र के उथल-पुथल भरे राजनीतिक परिदृश्य में आधा हफ्ता भी बहुत है। पिछले मंगलवार को शरद पवार ने घोषणा की कि वह राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी (राकांपा) के प्रमुख के रूप में अपने पद से हट रहे हैं। इस घोषणा से महाराष्ट्र और राष्ट्रीय राजनीति में हलचल मच गई तथा इसके कारणों और परिणामों के बारे में अटकलें लगाई जाने लगीं। इससे यह अंदाजा लगाया गया कि इसने उनके भतीजे अजित पवार के लिए रास्ता खोल दिया, जो अपने गुट के साथ भाजपा से जुड़कर मुख्यमंत्री बनने के अपने लक्ष्य से हटे नहीं हैं। लेकिन पता चला है कि शरद पवार का उत्तराधिकारी चुनने के लिए बनाई गई कमेटी ने उनके इस्तीफे को खारिज कर दिया। तीन दिन बाद 82 वर्षीय शरद पवार ने कमेटी की रिपोर्ट और जनभावना का हवाला देते हुए इस्तीफा वापस ले लिया।



भारत का राजनीतिक इतिहास इस्तीफे और उसकी वापसी से भरा पड़ा है। महत्व समय और राजनीतिक परिस्थिति का है। अब अटकलें ये हैं कि चतुर मराठा बाहुबली ने अजित पवार को प्रभावी रूप से अलग-थलग कर उनकी महत्वाकांक्षाओं को धता बता दिया है। शरद पवार की राजनीतिक चाल ही ऐसी है कि अजित पवार को सशक्त और अशक्त बनाने के दोनों सिद्धांत विश्वसनीय और निराधार हो सकते हैं। यहां तक कि री-लैट जैसे जुए के खेल में रूसियों को मात देने वाली क्रोएशियाई प्रतिभा को भी पवार की राजनीति को विश्लेषित करने में परेशानी होगी।


अपने करियर की शुरुआत में ही पवार ने दुस्साहसिक महत्वाकांक्षा प्रदर्शित की थी। वर्ष 1978 में युवा पवार ने (अपने गुरु वाई बी चव्हाण के फरमान पर) महाराष्ट्र में वसंतदादा पाटिल की सरकार गिरा दी थी और विभिन्न पार्टियों का गठबंधन तैयार कर 38 साल की उम्र में महाराष्ट्र के सबसे कम उम्र के मुख्यमंत्री बने थे। 1980 में सत्ता से बेदखल होने पर पवार ने महाराष्ट्र के हर जिले का दौरा किया और किंवदंती है कि वह महाराष्ट्र के 288 विधानसभा क्षेत्रों के राजनीतिक कार्यकर्ताओं को उनके नाम से जानते-पहचानते हैं।

जमीनी हकीकत से यह जुड़ाव पवार की ताकत के लिए अहम है। उनका यह कौशल चार दशक बाद काम आया था, जब उन्होंने प्रवर्तन निदेशालय से जुड़े एक मामले में लगाए गए आरोप का इस्तेमाल करते हुए भाजपा को बहुमत पाने से रोक दिया था। उन्होंने अजित पवार द्वारा भाजपा के साथ सरकार बनाने के प्रयास पर भी रोक लगाई-भले ही राजनीतिक गलियारों में कहा जाता है कि इसे पवार की मंजूरी थी। फिर उन्होंने महाविकास अघाड़ी के गठन के लिए शिवसेना, राकांपा और कांग्रेस का एक अभूतपूर्व गठबंधन बनाया। विडंबना यह है कि उनकी पार्टी में कई लोग मानते हैं कि अजित पवार भाजपा के साथ गठबंधन बनाने के लिए राकांपा को तोड़ने के लिए तैयार हैं और इसलिए अटकलों का बाजार गर्म है।

रणनीतिक स्वायत्तता के विचार को शरद पवार ने तब अपनाया था, जब भू-राजनीति में इसका चलन भी नहीं था, और जो कांग्रेस के आलाकमान की संस्कृति से बहुत अलग था। दरअसल चंद्रशेखर के साथ उनकी दोस्ती ने उन्हें 1990 में राजीव गांधी के साथ परेशानी में डाल दिया। पवार की विभिन्न दलों के नेताओं के साथ मित्रता रही है, चाहे वह दक्षिण में जयललिता या करुणानिधि रहे हों और उत्तर में शेख अब्दुल्ला या बादल। हालांकि उनकी पार्टी (पहले कांग्रेस-एस और अब राकांपा) ने शायद ही कभी रिकॉर्ड बनाए हों, पर पवार ने अपनी पार्टी के चुनावी प्रोफाइल से ज्यादा दम दिखाया है। दशकों तक पवार ने 'संभावित प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार' के उपनाम को बरकरार रखा। यह इसलिए कि राजनीति, व्यापार, खेल और समाज में व्यापक नेटवर्क के साथ उन्हें प्रशासन में महारत हासिल है और वह उदारीकरण के समर्थक हैं।

पवार की राजनीति की व्याख्या करने के लिए उनके व्यक्तित्व के लचीलेपन को समझने की आवश्यकता है। 1999 में वह सोनिया गांधी के विदेशी मूल के मुद्दे पर कांग्रेस से अलग हो गए और राकांपा बनाई। इसके बाद उन्होंने 1999 में महाराष्ट्र में कांग्रेस के साथ गठबंधन किया और फिर 2004 में यूपीए के सदस्य के रूप में केंद्र में मनमोहन सिंह सरकार में शामिल हो गए। हाल की घटनाओं ने उन्हें सुर्खियों में ला दिया। अप्रैल की शुरुआत में पवार ने विपक्षी नेताओं से खुद को अलग कर लिया, खासकर कांग्रेस से और यह कहा कि उन्होंने गौतम अदाणी की कंपनियों पर हिंडनबर्ग रिपोर्ट पर जीपीसी की मांग के बारे में सहयोगियों ने राय साझा नहीं की। यह सच है कि पवार ने राजनीतिक क्षेत्र में कारोबारी नेताओं पर निशाना साधने से किनारा कर लिया है। अटकलों को हवा देने वाली बात यह है कि बयान जारी करने के कुछ हफ्ते बाद पवार ने अदाणी से मुलाकात भी की।

घटनाओं और कथनों का राजनीतिक संदर्भ महत्वपूर्ण है। हफ्तों से मीडिया मंत्रालय में फेरबदल की अटकलों से घिरा हुआ है। शिंदे के नेतृत्व वाली सरकार के गठन पर सुप्रीम कोर्ट का फैसला लंबित है। शिंदे के नेतृत्व वाली शिवसेना और भाजपा के बीच भी असंतोष बढ़ रहा है। लेकिन चर्चा महाराष्ट्र की कम और 2024 के चुनावों की बहुत ज्यादा हो रही है।

महाराष्ट्र में लोकसभा की 48 सीटें हैं और राज्य का चुनावी गणित भाजपा के मिशन-2024 की योजना में मायने रखता है। भाजपा ने 'मिशन महाविजय' का नारा गढ़ा है और 45 सीटों का लक्ष्य निर्धारित किया है-यहां तक कि ‘सी-वोटर इंडिया टुडे’ पोल ने भी भाजपा को एमवीए गठबंधन से पीछे रखा है। स्पष्ट है कि एमवीए और एनडीए के बीच का अंतर ग्रामीण और मराठा वोटों का है। आकलन यह है कि भाजपा को उन वोटों के लिए राकांपा के साथ गठबंधन करने की जरूरत है। ऐसे में, राकांपा नेताओं पर जांच एजेंसियों का दबाव बढ़ाया जा सकता है और सत्ता में हिस्सेदारी का विकल्प भी दिया जा सकता है। और वोट बैंक की चाबी शरद पवार के पास है।

कहा जाता है कि पवार की बेटी और बारामती सांसद सुप्रिया सुले ने दो राजनीतिक भूकंपों की भविष्यवाणी की थी, एक महाराष्ट्र में और एक दिल्ली में। जाहिरा तौर पर पहला शरद पवार का इस्तीफा और वापसी था। अब दूसरे भूकंप का इंतजार है।

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