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स्थानीय कोशिशों से ही बचेगा पर्यावरण

Wed, 13 Jul 2016 07:29 PM IST
भारत डोगरा
भारत डोगरा Updated Wed, 13 Jul 2016 07:29 PM IST
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Local efforts to save the environment
भारत डोगरा

आज विश्व स्तर पर पर्यावरण का संकट वह रूप ले चुका है, जिससे धरती की जीवनदायिनी क्षमता ही खतरे में पड़ रही है। जलवायु परिवर्तन के अलावा भी कई अन्य रूपों में यह संकट प्रकट हो रहा है। जैसे, विभिन्न प्रजातियों के लुप्त होने की गति में तेज वृद्धि होना, भूमंडलीय नाइट्रोजन चक्र में बदलाव और समुद्रों का अम्लीकरण। एक ओर वैश्विक समस्याओं पर सम्मेलन हो रहे हैं, दूसरी ओर, बुंदेलखंड और मराठवाड़ा जैसे क्षेत्रों में लोगों को अपने जीवन का आधार खिसकता लग रहा है।

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धरती की जीवनदायिनी क्षमता का संकट में पड़ना अब केवल चर्चा का विषय ही नहीं है, बल्कि बुंदेलखंड और मराठवाड़ा के करोड़ों लोगों के लिए सच्चाई बन चुका है। इनके अलावा भी देश के बहुत जिले और गांव ऐसे हैं, जहां कई परिवार बिगड़ते माहौल के बीच अस्तित्व बचाने के लिए संघर्ष कर रहे हैं।
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हाल के वर्षों में एक नारा बहुत सुना गया है-थिंक ग्लोबल, ऐक्ट लोकल। यह बहुत अच्छा नारा है, पर क्या इसे व्यापक स्तर पर व्यावहारिक रूप दिया जा सकता है? क्या हम ऐसी योजनाएं बना सकते हैं, जिनसे एक ओर बुंदेलखंड और मराठवाड़ा के लोगों को राहत मिलने के साथ जलवायु परिवर्तन और प्रजातियों के लुप्त होने जैसी विश्वव्यापी समस्याओं के समाधान में भी सहायता मिले? अगर इस तरह के सुनियोजित प्रयासों में लोग भागीदारी करते हैं, तो क्या वह आर्थिक मदद भी मिलेगी, जिसका वायदा अंतरराष्ट्रीय सम्मेलनों में किया जाता है? यदि सूखाग्रस्त क्षेत्रों के लिए ऐसी योजना बनाई जाए, जिससे किसानों और ग्रामीणों की समस्याओं का समाधान होने के साथ ग्रीनहाउस गैसों के उत्सर्जन में कमी हो, तो यह लोकल व ग्लोबल के मिलन का बहुत अच्छा उदाहरण माना जाएगा।
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हाल के समय में इस बारे में समझ बढ़ी है कि यदि जैविक (आर्गेनिक) खेती को अपना कर मिट्टी की गुणवत्ता में सुधार किया जाए व मिट्टी में ह्यूमस को बढ़ाया जाए, तो इससे ग्रीनहाउस गैसों को सोखने में मदद मिलेगी। ऑर्गेनिक खेती को सही ढंग से अपनाने पर किसानों का खर्च कम करने, पानी की खपत और उसका प्रदूषण कम करने तथा समग्र रूप से गांव का पर्यावरण सुधारने में भी मदद मिलेगी। यदि गांव में स्थानीय प्रजातियों पर आधारित वनीकरण को तेजी से बढ़ाया जाए, तो इससे चारे का संकट कम करने में उपयोगी लघु वनोपज बढ़ाने में मदद मिलेगी। साथ में गांववासियों की आय भी बढ़ सकेगी और पर्यावरण सुधरेगा।

अनेक गांवों में बिजली की आपूर्ति अनियमित है। यदि इन गांवों में अक्षय ऊर्जा के तरह-तरह के स्रोतों को मिलाकर वैकल्पिक-विकेंद्रित ग्रामीण ऊर्जा व्यवस्था स्थापित की जाए, तो गांववासियों का ऊर्जा संकट हल करने के अलावा स्थानीय रोजगारों का सृजन होगा, तथा ग्रीनहाउस गैसों के उत्सर्जन में भी कमी हो सकेगी।


इस तरह स्थानीय व विश्व स्तर के सरोकारों को जोड़कर आगे बढ़ना जरूरी है तथा इन प्रयासों के लिए वैश्विक आर्थिक सहायता की व्यवस्था भी हो सकती है। लेकिन इन प्रयासों की सफलता के लिए क्रियान्वयन में सुधार करना जरूरी है, क्योंकि कई बार बहुत अच्छी योजनाओं को भी क्रियान्वयन के स्तर पर विफलता मिली है। अतः गवर्नेंस में सुधार बहुत जरूरी है।

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