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स्मृति : जीवन को कविता बनाना चाहिए, आज की सियासी जमात से पूछा जाए- यह कैसे होगा

Tue, 27 May 2025 07:39 AM IST
शिव शुक्ला ध्रुव शुक्ल
ध्रुव शुक्ल Published by: शिव शुक्ला Updated Tue, 27 May 2025 07:39 AM IST
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सार
पंडित नेहरू की 'जीवन की खोज' भारत की सभ्यता को एक लंबी कविता की तरह पढ़कर उसका मर्म जानने की रही है। 
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Life should be made into a poem, today's political community should be asked - how will this happen
पंडित जवाहरलाल नेहरू - फोटो : अमर उजाला

विस्तार

पंडित जवाहरलाल नेहरू ने कविवर शिवमंगल सिंह ‘सुमन’ की डायरी में बहत्तर साल पहले यह वाक्य लिखा था, ‘अपने जीवन को कविता बनाना चाहिए।’ यह वाक्य नेहरू जी इसलिए लिख पाए होंगे, क्योंकि उनकी ‘भारत की खोज’ भारत की सभ्यता को एक लंबी कविता की तरह पढ़कर उसका मर्म जानने की रही है। नेहरू विश्व इतिहास की झलक पाकर यह भी पहचान सके कि वहां तो खंडहरों के सूनेपन के बीच मुरझाए जीवन की दास्तान ही ज्यादा सुनाई देती है। पर जीवन तो निरंतर रची जा रही बहुरंगी कविता जैसा ही है।



जीवन कैसे कविता बनता है, यह प्रश्न केवल कवियों से ही नहीं, उन राजनेताओं से भी पूछा जाना चाहिए, जो भारत के जीवन को कविता से दूर ले जाने में संलग्न हैं। सबका जीवन उस कविता के घेरे में ही रह सकता है, जिसकी चौपाइयों में उज्ज्वल कमलनियां खिल उठती हैं। हृदय के काव्य सरोवर में बहुरंगी कमलों के समूह कई प्रकार के जीवन छंदों की तरह बसे रहते हैं, जहां भाषा की सुगंध पूरे जीवन पर छाने के लिए आतुर रहती है। यह लंबी कविता सदियों से जीवन की उपमा खोज रही है और कह रही है कि जीवन की कोई उपमा नहीं, गुण-अवगुण से सना जीवन तो जीवन की तरह ही है। ऐसे जीवन को परस्पर आश्रय में साधे रहने की कला को ही वास्तविक राजनीति कहा जाएगा।


जीवन को राजनीतिक हठों के किनारों से नहीं बांधा जा सकता। उसे बांधने की कोशिशें देश को विपदा के सागर तक लिए चली जाती हैं। बहुरंगी जीवन के स्वभाव के विरुद्ध उसकी नौका की राह रोकने वाली कोई भी राजनीति-काल महासागर की लहरों पर कभी ठहर नहीं पाई है। इतिहास साक्षी है कि सागर उसे बहा ले गया। कवि, कविता और समूचा जीवन उस अनादि प्रकृति के महाकाव्य में बसे हुए हैं, जिसे सदा अर्थपूर्ण बनाए रखने के लिए सामाजिक और राजनीतिक व्यवस्थाओं की परिकल्पना भी की जाती रही है। पर अगर समाज और राजनीति ही उससे बेपरवाह होते चले जाएंगे, तो जीवन से वह काव्य तत्व खोता चला जाएगा, जिसमें सुजल-सुफल से भरी भारत माता बसी हुई है।

मेरे लोककवि पिता कहते कि कवि होना भी नेता होना है। वे कहते कि कवि भी तो कविताएं रचकर देश के जीवन के सुख-दुख में हाथ बंटाता है। वह देश का मन परखता है और जीवन की व्यथाओं का भार उठाते लोगों को अपनी कविताओं से सांत्वना देता है। मैं पंडित नेहरू के देहावसान के समय ग्यारह बरस का था। बाद में जब कवि-भाव से भरने लगा, तो मेरे पिता ने चेता दिया कि किसी राजनीतिक छाते की छाया में कभी खड़े मत होना। अगर ऐसा करोगे, तो तुम्हें वह बड़ा साहित्य समाज दिखना बंद हो जाएगा, जिसकी रचनाओं की जड़ें देश की परंपरा की जमीन में बसी गहराई को पहचानती हैं।

आज बहुत-सी हिंदी कविता एक राजनीतिक प्रेस नोट जैसी लगती है। अपवाद स्वरूप जो कुछ उन्नतप्राण कवि साहित्य की धारा में अपनी नौका डाले हुए थे, उनका नाम प्रगतिशील कवियों की सूची से बाहर कर दिया गया। महात्मा गांधी ने हर पंथ के कवियों की कविताएं अपनी प्रार्थना सभा के लिए चुनीं और वे कवि भी हमारे वर्तमान के नेता बन सके, जो दैहिक रूप से नहीं थे। कवि गजानन माधव मुक्तिबोध को अपने आपसे किसी गहरे फलसफे की उम्मीद थी, जिसमें वे खोई हुई आत्मसंभवा अभिव्यक्ति को अपनी कविता में पा सकें। संसार होने और न होने की जगह जैसा है, जिसमें सब कवि अपने-अपने होने में बीत रहे हैं। जिन्हें संयोगवश प्रकृति सिद्ध कवि होने का निमित्त बना लेती है, वे ही अपने कवित-विवेक से अपनी होनी को इस तरह कह पाते हैं कि उनकी कविता में सबकी होनी दीखती है।

कविता रचने की शुरुआत अनंत में हेरने से हुई होगी। वे पहले हो गए कवि अपने हृदय के हवन कुंड में शब्दों की आहुति देकर अपनी स्मृतियों की घनी धुंध में कविता को बसाते रहे। इसी धुंध को पार करके वे उन काव्य-प्रकाशों तक भी जा पहुंचे, जो जीवन के होने को अनेक रूपों में प्रकाशित कर रहे थे। आदिकाल से जीवन के इतने रूपों की होनी को कहने के लिए कवि होते चले आ रहे हैं। आगे भी कवि होते रहेंगे। उनका होना कभी नहीं रुकेगा। अपने हृदय की सीपी में काव्यमुक्तारूप को पकाने वाले कवि अलग से पहचान लिए जाते हैं। ऐसे कवि ही कविता की राहों के अन्वेषी होते हैं। वे अपने होने के अकेलेपन के विस्तार में उस सर्वनाम की प्रतीति में डूबे रहते हैं, जो सबकी होनी में बसा हुआ है।

कवि गजानन माधव मुक्तिबोध की कविताओं में चकमक की चिंगारियों जैसी बेचैनी चिलकती है, जहां अधूरी और सतही जिंदगी के गर्म रस्तों पर भौंचक सनसनी के बीच मुक्तिबोध किसी झनझनाती आग का सामना कर रहे हैं-कोई चीखती कविता लिखना चाहते हैं। उनकी कविताएं हमारी भूल-गलतियों की ओर आज भी इशारा कर रही हैं। साहित्य ऐसी ही बेचैनियों और झनझनाती आग के बीच समृद्ध होता रहा है। झनझनाती आग के बीच कविता शांति की अपील है।

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