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केरल में पटरी पर लौटती जिंदगी

Mon, 17 Sep 2018 07:13 PM IST
पत्रलेखा चटर्जी
पत्रलेखा चटर्जी Updated Mon, 17 Sep 2018 07:13 PM IST
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Life back on track in Kerala
स्वास्थ्य जांच

बाढ़ पीड़ित केरल के एर्नाकुलम जिले के सबसे बुरी तरह से प्रभावित इलाकों में से एक पुथियाकावु के एक लोअर प्राइमरी स्कूल के बड़े से हॉल में ढेर सारे बच्चे आनंद मनाते हुए उछल-कूद कर रहे थे। उनमें से कुछ बच्चे नाच रहे थे, तो कुछ बच्चे गा रहे थे। वे सभी काफी खुश दिखाई दे रहे थे। दर्शक के रूप में उनके अभिभावक ताली बजाकर उनका उत्साह बढ़ा रहे थे। क्या यह वही जगह है, जो कुछ हफ्ते पहले भीषण बाढ़ के पानी में बुरी तरह डूबा हुआ था? हैरानी और अविश्वास से मैंने अपनी आंखें रगड़ीं।


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मंच पर लंबे कुर्ते में एक प्रौढ़ उम्र का व्यक्ति शांत बच्चों को गीतों से जोड़ने की कोशिश में लगा था। उस व्यक्ति ने बाद में मुझे अपना परिचय दिया। उसका नाम जयचंद्रन है और वह स्थानीय लोगों का मनोरंजन करता है। दसियों हजार लोगों की तरह केरल की भीषण बाढ़ उसका भी सारा सामान बहाकर ले गई। लेकिन एक हल्की मुस्कान के साथ अटक-अटक कर अंग्रेजी में उसने मुझे बताया कि कैसे वह राज्य भर के राहत शिविरों और स्कूलों तक की यात्रा कर रहा है और उन छोटे-छोटे बच्चों का मनोरंजन कर रहा है, जिनकी किताबें, खिलौने और पालतू पशु भीषण बाढ़ में बह गए। यह सब कुछ वह स्वयंसेवी भावना से करता है।

यही तो केरल की खासियत है, जो एक महीने भी नहीं हुए, शताब्दी की सबसे भयंकर बाढ़ से किसी तरह उबरा है। यह स्कूल जिले के सबसे पुराने स्कूलों में से एक है, जिसकी स्थापना 1913 में की गई थी। यहां की प्रधानाचार्या गर्व से मुझे बताती हैं कि उनके स्कूल के शिक्षक और वह स्वयं भी, बच्चों एवं उनके अभिभावकों को मनो-सामाजिक मदद उपलब्ध कराने की कोशिश कर रहे हैं, ताकि वे अपने सामान्य जीवन में वापस लौटने की कोशिश कर सकें।

ऐसा नहीं है कि इस स्कूल के शिक्षक और उसकी प्रधानाचार्या बाढ़ से अछूते थे, उन्हें भी बाढ़ का सामना करना पड़ा। लेकिन स्कूल में कक्षाएं फिर से शुरू हो गई हैं। और छोटे बच्चों (जिनमें ज्यादातर चार से दस वर्ष की उम्र तक के बच्चे हैं) को व्यस्त रखने के लिए अध्ययन के साथ-साथ किस्से-कहानी सुनाने, गीत-संगीत गतिविधियों पर बहुत ध्यान केंद्रित किया जाता है और आपदा के बाद की स्थितियों का सामना करने में उनकी मदद की जाती है।

जब मैं स्कूल के कर्मचारियों के साथ दोपहर के भोजन में शामिल हुई, जिसे स्कूल के कर्मचारियों ने ही तैयार किया था, उसी समय डॉक्टरों की एक टीम स्कूल पहुंची, जो बच्चों और उनके माता-पिता को पोषक किट और मनोवैज्ञानिक प्राथमिक चिकित्सा प्रदान करने आए थे। यह सब देखकर मैं आश्चर्यचकित हुए बिना नहीं रह सकी।
 
निश्चित रूप से गांव में हर जगह आपदा के स्पष्ट संकेत दिख रहे थे-सबसे बुरे दिनों के दौरान लोगों के जो घरेलू सामान निकाल कर राहत शिविरों में पहुंचाए गए, वे कबाड़ बन चुके हैं, बाढ़ के पानी के निशान घरों की दीवारों पर साफ दिख रहे हैं और कई जगहों पर कीचड़ के ढेर लगे हुए हैं।

लेकिन केरल उल्लेखनीय बदलाव दिखा रहा है। उस भयानक आपदा में तीन सौ से ज्यादा लोग मारे गए। मरने वालों की संख्या और ज्यादा हो सकती थी, अगर सरकारी एजेंसियां और केरल के लोग अपने घरों में फंसे हजारों लोगों को बचाने के लिए नहीं आगे आते। कोचिन हवाई अड्डे से उड़ान भरते हुए यह विश्वास करना मुश्किल था कि यह बाढ़ में डूबा हुआ था और दो हफ्ते तक इसे लोगों के लिए बंद करना पड़ा था। वहां सब कुछ सामान्य लग रहा था।

फिर से पुथियाकावु की बात करते हैं, जहां मैं एक आशा कार्यकर्ता से मिली, जो घर-घर जा रही है और यह पता लगा रही है कि जो लोग अपने घर वापस लौट रहे हैं, उनके साथ सब कुछ ठीक-ठाक तो है। मलयालम में एक कहावत है, केडाप्पडम पोई, जिसका अर्थ है, मैंने अपना बिस्तर खो दिया। यह किसी व्यक्ति की उदासी और पीड़ा को दर्शाता है, जिसने अपना सब कुछ खो दिया है। लेकिन स्थानीय प्रशासन यह सुनिश्चित करने के लिए अपनी तरफ से पूरी कोशिश कर रहा है कि कोई भी व्यक्ति उपेक्षित महसूस न करे।

देश के कई अन्य राज्यों की तुलना में केरल इतनी जल्दी विनाशकारी आपदा से निपटने में कैसे सक्षम हुआ? इसका जवाब है यहां की सामुदायिक सहयोग प्रणाली। यहां की सुप्रसिद्ध सामुदायिक सहयोग प्रणाली के बारे में काफी कुछ लिखा गया है, जो समाज के हर तबके के स्वयंसेवकों को आकर्षित करती है। ये स्वयंसेवक खुद आपदा से प्रभावित होने के बावजूद दूसरों की मदद करने के लिए इच्छुक रहते हैं।

इसका एक और महत्वपूर्ण सबक है-यदि बाढ़ से बुरी तरह प्रभावित केरल में स्कूल, अस्पताल और स्वास्थ्य केंद्र बाढ़ से तबाह लोगों की मदद करने में पूरी तरह सक्षम थे, तो केवल इसलिए कि वे सामान्य दिनों में पूरी तरह से कार्यशील थे। यदि कोई संस्था सामान्य दिनों में ठीक से संचालित नहीं है, तो किसी आपदा के दौरान आप उसका लाभ नहीं उठा सकते हैं।

क्या केरल की कहानी में अन्य राज्यों के लिए सीखने के लिए कोई सबक है? पांच वर्ष पहले उत्तराखंड की सुरम्य केदारनाथ घाटी में आई भयंकर बाढ़ ने उसे तबाह कर दिया था। उस समय बाढ़ के मैदानी इलाकों में अवैध निर्माण कार्यों और संवेदनशील हिमालयी पारिस्थितिकी तंत्र में बुनियादी ढांचों के विकास पर लोगों का ध्यान केंद्रित किया गया था, लेकिन उससे क्या सबक सीखा गया? किसी आपदा के बाद पुनर्निर्माण और पुनर्वास के लिए सामुदायिक सहयोग की खातिर कौन-सा तंत्र विकसित किया गया? यह सुनिश्चित करने के लिए राज्य कितना सक्रिय हुआ है कि आपदा के बाद प्रभावितों की पीड़ा का उपचार हो जाएगा और आम लोग फिर से अपना सामान्य जीवन जीने लगेंगे?

आज ये सवाल शेष राज्यों से पूछे जाने की आवश्यकता है।

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