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आपदा: भुला दी गई नदियां मचा रहीं तबाही.. सुप्त हो गए बहाव पर बस्ती नहीं बसाना समय की मांग; वायनाड से यही संदेश

Wed, 07 Aug 2024 02:42 AM IST
Pankaj chaturvedi पंकज चतुर्वेदी
Updated Wed, 07 Aug 2024 02:42 AM IST
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सार
वायनाड भूस्खलन में सबसे बड़ी भूमिका उन नदियों की है, जिनको गैर जरूरी मानकर कभी इन्सान ने समाप्त करने का प्रयास किया था।
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Lessons from Wayanad Tragedy Rivers pushed to Oblivion reason of disaster know why
वायनाड में तबाही का मंजर (फाइल) - फोटो : पीटीआई

विस्तार

वायनाड-नीलगिरी पर्वतमाला के ऊंचे पहाड़ों से होकर कभी एक नदी बहती थी। तेज गति वाली नदी गर्मी में उदास रहती थी, लेकिन बरसात के छह महीने तेज वेग में नीचे जाकर पश्चिमी घाट की नदियों में मिल जाती। सन 1876 में इंग्लिश और स्कॉटिश कॉपरेटिव सोसायटी ने यहां के पहाड़ों पर सीढ़ीनुमा क्यारियां बनाकर असम और चीन की चाय की संकर नस्ल की खेती शुरू की। वहां कई छोटी-छोटी जल सरिताएं थीं। अंग्रेज बागान मालिक ने उन सरिताओं पर मिट्टी डलवा दी और उस पर मजदूरों के लिए बस्ती बसा दी।



वायनाड में आई भयावह तबाही में सबसे ज्यादा नुकसान वेल्लारीमाला पर्वतमाला के नीचे मुंदक्कई और चूरलमाला में हुआ है। असल में इन दोनों जगहों पर घर और इमारतें भुला दी गई नदी के ऊपर बने हुए थे। वेल्लारमाला स्कूल की विशाल इमारत भी उस नदी के बहाव मार्ग पर बनी थी, जो कुछ साल पहले अपना रास्ता तो बदल चुकी थी, लेकिन शायद उसे भूली नहीं थी। विदित हो कि वेल्लारीमाला पर्वतमाला कोझिकोड जिले में थिरुवंबाडी पंचायत से वायनाड जिले में मेप्पाडी पंचायत तक फैली हुई है। वायनाड के ऊंचे पहाड़ से नीचे उतरकर जब मलप्पुरम जिले की तरफ आते हैं, तो शायद दुनिया का एकमात्र सागवान की लकड़ी का संग्रहालय नीलांबुर में मिलता है। इस छोटे से कस्बे की सुंदरता और जैव विविधता जिस चलियार नदी के कारण है, वह इन्सानों की लाशों से पट गई। यह नदी वायनाड जिले में इलमपिलेरी पहाड़ियों से निकलती है।


वायनाड से लगभग 90 किलोमीटर दूर इन्सानों के शव के टुकड़े मिलना बताते हैं कि वायनाड भूस्खलन से हुई तबाही में सबसे बड़ी भूमिका उन नदियों की है, जिनको गैर-जरूरी मानकर कभी इन्सान ने समाप्त करने का प्रयास किया था। विकास के नक्शे बनाने वाले यह भूल गए कि सभी नदियां जीवित जीव की तरह होती हैं और उनकी याददाश्त 200 साल की होती है।

इस तबाही के मूल में वेल्लारीमाला पर्वतमाला का भूस्खलन है और इसके लिए जलवायु परिवर्तन के साथ मानवीय दखल जिम्मेदार है, लेकिन मलबे के तेजी से बहने के पीछे लुप्त नदी का अचानक जीवंत होना भी बड़ा कारण है। वर्ष 2020 में केरल में घटित जलवायु परिवर्तन, खासकर तापमान में वृद्धि की घटनाओं को समूचे तंत्र ने नजरअंदाज किया। उस वर्ष केरल में भयंकर जल प्लावन के बाद  जैव विविधता के लिए जगजाहिर वायनाड में अचानक केंचुए और कई प्रकृति प्रेमी कीट गायब हो गए थे। कई शोध बताते हैं कि तापमान में बढ़ोतरी से पश्चिमी घाट के आसपास के इलाकों में अचानक भारी बरसात होगी ही और जब ऐसे में प्रकृति पर मानवीय दखल बढ़ा, जंगल कम होने से मिट्टी की पकड़ ढीली हुई, तो भारत के इतिहास के सर्वाधिक भयावह भूस्खलन में से एक वायनाड में घटित हो गया।

वेल्लारीमाला पर्वतमाला घने जंगल और छोटी-बड़ी जलनिधियों से संपन्न ऊंट की पीठ के आकार की पर्वतमाला है। बार-बार इसे विशेष क्षेत्र घोषित कर सभी तरह के निर्माण रोकने की मांग होती रही, लेकिन पहाड़ खोद कर कोझिकोड राजमार्ग को चौड़ा करना जारी रहा। वेल्लारीमाला का भूस्खलन एक सैडल (ऊंची जमीन के दो क्षेत्रों के बीच एक निचला बिंदु) से उत्पन्न हुआ है। सैडल दो तरह से बन सकते हैं, या तो दरारों द्वारा या फिर कटाव से। आमतौर पर कटाव वाले सैडल चूना पत्थर में होते हैं, जो यहां है नहीं। स्पष्ट है कि वेल्लारीमाला का भूस्खलन दरारों के कारण हुआ था। जब इस तरह की दरारों में लंबे समय तक पानी जमा होता है और मिट्टी की पकड़ ढीली पड़ती जाती है, तो यह अचानक फट पड़ता है। कोई 100 मीटर सीधी ऊंचाई से ढेर सारा मलबा नीचे आना और फिर उससे लुप्त हो गई नदी के बहाव का जुड़ जाना कल्पना से परे है कि मानव निर्मित कोई संरचना इस वेग में खड़ी रह सकती थी। फिर दो घंटे में 37 सेंटीमीटर बारिश का प्रकोप, तो था ही।

एक बात और जिस स्थान पर सबसे अधिक तबाही हुई, उसमें से एक है चूरलमाला। चूरल अर्थात बांस और माला अर्थात पहाड़। कभी यहां बांस का घना जंगल था और वह यहां के जमीन के कटाव को रोके रखता था। यह स्थापित तथ्य है कि नदी से हो रहे भ-कटाव और मिट्टी के कमजोर होने से रोकने में बांस की बड़ी भूमिका रही है। कुछ साल पहले यहां लोगों ने अधिक भूमि के लोभ में बांस के झुरमुटों को उजाड़ दिया था। अब किसान समझ गए कि यदि नदी को अपने खेत में आने से रोकना है, तो इसका एकमात्र इलाज बांस लगाना है। दुर्भाग्य से चूरलमाला में लगे-लगाए बांस को बेपरवाही से उजाड़ा गया। आज वायनाड में पुनर्वास का काम चल रहा है। कम से कम तीन कस्बे फिर से बसाने होंगे। ऐसे में यह ध्यान रखना जरूरी है कि अब किसी भूली बिसराई नदी के सुप्त हो गए बहाव पर बस्ती नहीं बसाई जाए। साथ ही प्रचुर मात्रा में बांस लगाए जाएं।

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