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स्वतंत्रता के साथ जवाबदेही भी हो: न्यायपालिका लोकतंत्र का प्रहरी, सर्वोच्च मानकों के प्रति प्रतिबद्धता जरूरी
सार
हाल ही में वरिष्ठ अधिवक्ता हरीश साल्वे के सवाल ने न्यायिक जवाबदेही को फिर चर्चा में ला दिया है। न्यायपालिका लोकतंत्र का प्रहरी है, इसकी प्रतिष्ठा की रक्षा के लिए जरूरी है कि वह स्वयं भी विधि, प्रक्रिया और जवाबदेही के सर्वोच्च मानकों के प्रति प्रतिबद्ध हो।
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सुप्रीम कोर्ट
- फोटो : पीटीआई
विस्तार
न्यायमूर्ति यशवंत वर्मा से जुड़े नकदी-विवाद के संदर्भ में वरिष्ठ अधिवक्ता हरीश साल्वे द्वारा उठाया गया प्रश्न न्यायिक जवाबदेही के विषय को फिर चर्चा के केंद्र में ले आया है। बीते 14 सितंबर, 2026 को छठे राम जेठमलानी स्मृति व्याख्यान में साल्वे ने पूछा कि यदि ऐसी घटना किसी मंत्री के घर हुई होती, तो क्या कानून उसी प्रकार आगे बढ़ता, जिस प्रकार न्यायमूर्ति वर्मा के प्रकरण में हुआ। उन्होंने यह भी प्रश्न उठाया कि न्यायिक स्वतंत्रता को जवाबदेही से अलग कैसे माना जा सकता है। आगे उन्होंने यह भी कहा कि दोनों एक-दूसरे के विरोधी नहीं, बल्कि पूरक हैं।
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हरीश साल्वे ने उन नागरिकों की चिंता को स्वर दिया है, जो न्यायपालिका को लोकतंत्र का अंतिम सांविधानिक प्रहरी मानते हैं और उसकी प्रतिष्ठा को शिखर पर देखना चाहते हैं। नागरिक अपने अधिकारों की रक्षा, सत्ता पर नियंत्रण और कानून के शासन के लिए न्यायपालिका की ओर देखते हैं। इसलिए न्यायिक स्वतंत्रता की रक्षा आवश्यक है। लेकिन स्वतंत्रता का अर्थ जवाबदेही से मुक्ति नहीं हो सकता। स्वतंत्रता न्यायाधीश को बाहरी दबाव से मुक्त होकर निर्णय लेने की शक्ति देती है, जबकि जवाबदेही यह सुनिश्चित करती है कि उस शक्ति का प्रयोग कानून, नैतिकता और संस्थागत मर्यादा के अनुसार हो।
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भारतीय संविधान ने इस संतुलन को स्पष्ट रूप से महत्व दिया है। अनुच्छेद 14 कानून के समक्ष समानता का आधार है और अनुच्छेद 50 न्यायपालिका को कार्यपालिका से अलग रखने की दिशा देता है। अनुच्छेद 124(4) के अनुसार सर्वोच्च न्यायालय के न्यायाधीश को सिद्ध कदाचार या अक्षमता के आधार पर, संसद के दोनों सदनों की विशेष बहुमत वाली प्रक्रिया के बाद हटाया जा सकता है। अनुच्छेद 124(5) संसद को इस जांच और सिद्धि की प्रक्रिया को कानून द्वारा निर्धारित करने की शक्ति देता है। अनुच्छेद 217 और 218 उच्च न्यायालयों के न्यायाधीशों के संदर्भ में इसी सांविधानिक व्यवस्था को लागू करते हैं। इसका उद्देश्य न्यायाधीशों को राजनीतिक व प्रशासनिक दबाव से बचाना है। लेकिन न्यायाधीश को पद से हटाने की कठिन सांविधानिक प्रक्रिया का यह अर्थ नहीं है कि गंभीर आचरण-संबंधी शिकायतों की जांच के लिए प्रभावी व्यवस्था की आवश्यकता ही समाप्त हो जाती है। न्यायपालिका ने न्यायाधीशों के विरुद्ध शिकायतों से निपटने के लिए ‘इन-हाउस प्रोसीजर’ जैसी व्यवस्था विकसित की है। इसका एक उद्देश्य निराधार शिकायतों और अनुचित दबाव से न्यायाधीशों की रक्षा करना भी है। लेकिन आंतरिक जांच, आपराधिक जांच और न्यायाधीश को पद से हटाने की सांविधानिक प्रक्रिया-तीनों अलग-अलग प्रकृति की हैं। इसलिए इनके बीच संबंध, सीमाएं और कार्रवाई की परिस्थितियां अधिक स्पष्ट होना जरूरी है।
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पारदर्शिता का अर्थ यह नहीं है कि हर शिकायत को सार्वजनिक कर दिया जाए। शिकायतकर्ता की गोपनीयता, न्यायाधीश की प्रतिष्ठा, जांच की निष्पक्षता और न्यायिक स्वतंत्रता—सभी का ध्यान रखना जरूरी है। स्वयं प्रधान न्यायाधीश न्यायमूर्ति सूर्यकांत ने उसी कार्यक्रम में कहा कि न्यायपालिका को निष्पक्ष, सूचनापरक और रचनात्मक आलोचना के लिए खुला रहना चाहिए। कोई भी संस्था स्वयं को जांच-पड़ताल से अलग नहीं रख सकती। उन्होंने न्यायाधीशों के विरुद्ध मौजूदा शिकायत-व्यवस्था को मजबूत और समयबद्ध बताते हुए उसमें सुधार की संभावना को भी स्वीकार किया।
न्यायिक जवाबदेही का प्रश्न केवल शिकायतों तक नहीं, बल्कि न्यायिक नियुक्तियों और स्थानांतरण से भी जुड़ा है। इसी संदर्भ में राष्ट्रीय न्यायिक नियुक्ति आयोग (एनजेएसी) का अनुभव महत्वपूर्ण है। 99वें संविधान संशोधन द्वारा नियुक्ति-व्यवस्था में परिवर्तन किया गया और अनुच्छेद 124ए, 124बी तथा 124सी जोड़े गए। किंतु 2015 में सर्वोच्च न्यायालय ने 99वें संविधान संशोधन और एनजेएसी अधिनियम को न्यायपालिका की स्वतंत्रता तथा संविधान की मूल संरचना के संदर्भ में असांविधानिक घोषित कर दिया।
इस निर्णय के बाद भी न्यायिक नियुक्तियों में सुधार का प्रश्न समाप्त नहीं होता। भविष्य में किसी न्यायिक आयोग पर विचार किया जाए, तो उसकी संरचना ऐसी होनी चाहिए, जिसमें न्यायपालिका की स्वतंत्रता सुरक्षित रहे, कार्यपालिका की भूमिका संतुलित हो, चयन-प्रक्रिया में पारदर्शिता आए और किसी एक संस्था को अनुचित नियंत्रण प्राप्त न हो।
इसी प्रकार अनुच्छेद 124(5) के अधीन एक आधुनिक न्यायिक जवाबदेही कानून पर भी विचार किया जा सकता है। इसमें गंभीर शिकायतों की प्रारंभिक छंटाई, स्वतंत्र जांच, समयबद्ध प्रक्रिया, हितों के टकराव से सुरक्षा, आवश्यक पारदर्शिता तथा जहां अपराध का प्रथमदृष्टया प्रश्न हो, वहां सक्षम आपराधिक कानून के साथ समन्वय की व्यवस्था हो सकती है। ऐसा कानून न्यायिक स्वतंत्रता को अधिक विश्वसनीय बना सकता है। न्यायिक स्वतंत्रता संविधान की मूल संरचना का महत्वपूर्ण तत्व है। इसलिए जवाबदेही की व्यवस्था भी ऐसी होनी चाहिए, जो बाहरी नियंत्रण के बजाय स्वतंत्रता के भीतर उत्तरदायित्व सुनिश्चित करे।
वास्तविक संस्थागत प्रतिष्ठा प्रश्नों को दबाने से नहीं, बल्कि उचित प्रश्नों का विश्वसनीय उत्तर देने से बनती है। जैसे निराधार आरोपों से न्यायाधीशों की रक्षा जरूरी है, वैसे ही गंभीर व विश्वसनीय आरोपों की निष्पक्ष जांच भी आवश्यक है। इन दोनों के बीच संतुलन ही न्यायिक गरिमा की वास्तविक कसौटी है। आज आवश्यकता किसी व्यक्ति या संस्था को कटघरे में खड़ा करने की नहीं, बल्कि ऐसी व्यवस्था बनाने की है, जिसमें न्यायिक स्वतंत्रता, समानता, निष्पक्ष प्रक्रिया, पारदर्शिता और जवाबदेही साथ-साथ चलें। हरीश साल्वे का प्रश्न इसी व्यापक सांविधानिक चिंता को सामने लाता है। इसका उत्तर किसी व्यक्ति विशेष के पक्ष या विपक्ष में नहीं, बल्कि व्यवस्था के सुधार में निहित है। यदि न्यायपालिका लोकतंत्र का अंतिम सांविधानिक प्रहरी है, तो उसकी प्रतिष्ठा की रक्षा के लिए जरूरी है कि वह स्वयं भी विधि, प्रक्रिया और जवाबदेही के सर्वोच्च मानकों के प्रति उतनी ही प्रतिबद्ध हो, जितनी प्रतिबद्धता वह समाज से अपेक्षा करती है। न्यायपालिका की प्रतिष्ठा बचाने के लिए उसकी जवाबदेही सुनिश्चित कीजिए, क्योंकि यह स्वतंत्रता विरोधी नहीं, अपितु उसकी विश्वसनीय संरक्षक है। लोकतंत्र की यही मांग है और जनता के भरोसे को दीर्घकाल तक अक्षुण्ण रखने का मार्ग भी।