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मोरबी का सबक : पर्यटकों के आकर्षण का केंद्र और हादसों को रोकने की कवायद
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मोरबी हादसा
- फोटो :
ANI
विस्तार
गुजरात के मोरबी पुल की त्रासदी ने पूरे देश को हिला दिया है। मच्छु नदी पर बनाया सस्पेंशन ब्रिज यानी झूलने वाला पुल पर्यटकों के आकर्षण का बड़ा कारण था। लेकिन कौन जानता था, वहां पहुंचे लोगों में बड़ी संख्या के लिए यह अंतिम दिन होगा। किसी भी त्रासदी में सौ से अधिक लोगों का अंत हो जाना सामान्य घटना नहीं होती। गुजरात जैसे प्रदेश में, जहां बचाव और राहत की मजबूत टीमें हैं, इतनी संख्या में लोगों की मृत्यु बताती है कि घटना कितनी विकराल थी।
वहां एनडीआरएफ और एसडीआरएफ के साथ तैराकों, दमकलों व वायुसेना के कमांडो, रेस्क्यू नाव आदि सब कुछ होने के बावजूद दूसरे दिन भी लापता लोगों का पता नहीं लग सका और इस कारण मृतकों की संख्या बताना कठिन हो गया। यह प्राकृतिक आपदा नहीं है। न बाढ़ आया, न तूफान और निरपराध लोग जान गंवा बैठे। पुल के रख-रखाव की जिम्मेदारी वाले ओरेवा ग्रूप पर गैर इरादतन हत्या का मामला दर्ज हो गया है। जांच के लिए समिति भी बना दी गई है। निस्संदेह, इस समय आप किसी भी कारण को खारिज नहीं कर सकते।
अभी तक की जानकारी इतनी है कि पुल कमजोर था। करीब डेढ़ सौ वर्ष पुराना पुल कमजोर और जोखिम भरा था, तभी मरम्मत के लिए छह माह पहले बंद कर दिया गया था। ओरेवा ग्रुप ने इसकी मरम्मत की तथा 26 अक्तूबर को लोगों के लिए खोला गया। यानी चार दिन पहले खुला और पांचवें दिन की शाम को पुल टूट गया। यह कैसे संभव है कि एक कंपनी पुल की मरम्मत में इतनी कोताही बरते कि वह चार दिन भी न चल पाए? वहां के नगर निगम का कहना है कि उस पुल की क्षमता 100 लोगों की है, लेकिन 500 से अधिक लोग उस पर इकट्ठा थे।
तो निर्धारित संख्या से ज्यादा लोग आए क्यों? यदि निर्धारित संख्या तक ही टिकट काटा जाता तथा समय सीमा तय कर लोगों को बाहर निकाल कर फिर नए लोगों को प्रवेश कराया जाता, तो यह हादसा नहीं होता। इतने पुराने पुल पर तय संख्या से ज्यादा टिकट काटकर लोगों को जाने दिया गया, तो दुर्घटना को निमंत्रण देने जैसा व्यवहार था। नगर निगम का तर्क है कि फिटनेस सर्टिफिकेट लिए बिना ही कंपनी ने इसे चालू कर दिया। यह हैरत की बात है कि नगर निगम की सहमति के बगैर कंपनी ने पुल को खोल दिया होगा। कंपनी प्रशासन को रिपोर्ट दे सकती है और फैसला प्रशासन का ही होता है।
आखिर इतने लोगों की जान चली जाए, सैकड़ों परिवार तबाह हो जाएं और उसके लिए केवल मेंटेनेंस करने वाली कंपनी को जिम्मेदार मानना एकपक्षीय फैसला होगा। इस घटना को व्यापक परिप्रेक्ष्य में भी देखने की आवश्यकता है। यह पुल 20 फरवरी, 1879 को जनता के लिए खोला गया था। हमारे देश में सामान्य यातायात वाले प्राचीन पुलों की संख्या बहुत ज्यादा है। समय-समय पर अनेक पुलों की मरम्मत होती रहती है। बावजूद इसके ऐसे पुलों की संख्या हजारों में है, जिन्हें देखने से ही लगता है कि कभी भी बड़ा हादसा हो सकता है।
वास्तव में पुलों, फुटओवर ब्रिजों आदि को लेकर संबंधित विभाग को जितना सतर्क होना चाहिए, वह प्रायः नहीं दिखता। जब बड़ी घटनाएं होती हैं तो हाय तोबा मचता है, लेकिन कुछ समय बाद फिर वही स्थिति। कोई उससे सबक लेकर अपने यहां के पुलों की समीक्षा नहीं करता। जाहिर है, मोरबी त्रासदी पूरे देश के लिए चेतावनी होनी चाहिए। हर श्रेणी के पुलों तथा फ्लाई ओवरों की गहन समीक्षा होनी चाहिए। सभी राज्य इसके लिए आदेश जारी कर एक निश्चित समय सीमा के अंदर समीक्षा रिपोर्ट मंगवाए और उसके अनुसार जहां जैसी मरम्मत या बदलाव की जरूरत हो, वह किया जाए।
समीक्षा हो, तो ऐसे अनेक पुल मिलेंगे, जिन्हें तत्काल बंद करने का ही विकल्प दिखाई देगा। कुछ ऐसे पुल हैं, जिन्हें तोड़कर नए सिरे से बनाना होगा। समस्या को टालने से वह और विकराल होती है। जो समस्या सामने है उसका समाधान भविष्य का ध्यान में रखते हुए किया जाना चाहिए। मोरबी त्रासदी ने हम सबको झकझोरा है, लेकिन अगर देश ने इसे सबक नहीं लिया, तो ऐसी त्रासदी बार-बार होती रहेंगी। स्वयं मोरबी और राजकोट प्रशासन को आगे यह निर्णय करना होगा कि पुल को रखा जाए या नहीं, और नहीं रखा जाए तो इसका विकल्प क्या हो सकता है।