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समोसे की लग्जरी
निर्मल गुप्त
Updated Mon, 18 Jan 2016 07:27 PM IST
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बिहार सरकार ने समोसा, जलेबी, नमकीन और मच्छर भगाने वाली टिकिया समेत कई चीजों पर लग्जरी टैक्स लगा दिया है। यानी वह विलासिता के खिलाफ है और वही अय्याशी बर्दाश्त करेगी, जिस पर उसे टैक्स मिलेगा। इसका एक मतलब यह भी हुआ कि लग्जरी चाहिए, तो जेब ढीली करो।
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बिहार में मच्छर भगाना विषय भोग है। जबकि मच्छर से खुद को कटवाना हठयोग है। निरंतर कष्टों से जूझते रहना यथार्थ बोध है। डेंगू या मलेरिया यद्यपि रोग है, लेकिन इससे निजात दिलवाने के लिए स्वास्थ्य विभाग मुस्तैद है। मच्छरों का बने रहना विभाग की कार्यकुशलता के लिए जरूरी है। इससे सरकार के तात्कालिक सरोकार का पता लगता है।
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बेसिकली सरकारें सुखवाद के खिलाफ होती हैं। उन्हें पता है कि सुखद वातावरण में कर्मठता का क्षय होता है। मच्छर रहित माहौल में रहता आदमी दिन चढ़े तक सोता है। जागता है तो ऐसे अंगड़ाई लेता है, मानो कोई एहसान कर रहा हो। पहली चाय के साथ अखबार पढ़ते हुए वह कहता है कि जो सरकार निकम्मी है, वह सरकार बदलनी है। भले वह घर में लगा फ्यूज बल्ब न बदल पाता हो, पर सरकार बदलने की रट लगाता है।
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समोसा तिकोना होता है, जिसके भीतर आलू, मटर और मसाला होता है। वह गर्म तेल में देर तक तलने से पकता है। इसे खाने के लिए लाल-हरी चटनी की जरूरत होती है। जो व्यंजन इतनी तामझाम के बाद बने और खाया जाए, उसे तो लग्जरी की श्रेणी में रखना ही होगा।
जलेबी को घुमा-घुमाकर वृत्ताकार रूप दिया जाता है। तलने के बाद उसे चीनी के उस मिनी पूल में डाला जाता है, जिसमें पहले से मधु मक्खी और चींटे स्विमिंग कर रहे होते हैं। इतनी जद्दोजहद के बाद जो व्यंजन तैयार होता हो, उसे साधारण श्रेणी में कैसे रखा जा सकता है!
नमकीन तो हमेशा से राजसी वस्तु रही है। दारू चाहे जिस क्वालिटी की हो, उसके साथ नमकीन की सुस्वादु गमक हमेशा मौजूद रहती है। ध्यान रहे, बिहार की सरकार लग्जरी के खिलाफ नहीं, पर खाली-पीली विलासिता के खिलाफ है।