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न्यायिक सुधार : जजों की संपत्ति की घोषणा का कानून बने, विधि आयोग की यह चिंता भी है वाजिब

Wed, 09 Apr 2025 06:53 AM IST
virag gupta विराग गुप्ता
Updated Wed, 09 Apr 2025 06:53 AM IST
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सार
जस्टिस वर्मा के बंगले पर नकदी जलने के बाद न्यायिक सुधारों ने जोर पकड़ा है। विधि आयोग न्याय-पालिका में भाई-भतीजावाद पर चिंता जाहिर कर चुका है। दूसरी ओर, 25 उच्च न्यायालयों के 12.3 फीसदी जजों ने ही संपत्ति की घोषणा वेबसाइट पर जारी की है। संविधान के संरक्षकों को नैतिक आदर्शों पर खरा उतरने की जरूरत है। 
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law should be made for declaration of assets of judges, this concern of Law Commission is also justified
सांकेतिक तस्वीर। - फोटो : अमर उजाला

विस्तार

दिल्ली हाईकोर्ट में जज के बंगले में नकदी जलने वाले कांड के बाद दो बड़े न्यायिक सुधारों की मांग बढ़ती जा रही है। पहली-जजों की नियुक्ति और स्थानांतरण की पारदर्शी व्यवस्था के लिए संसद से राष्ट्रीय न्यायिक नियुक्ति आयोग (एनजेएसी) की तर्ज पर नया कानून बने। दूसरी-जजों के खिलाफ शिकायत और भ्रष्टाचार की जांच के लिए लोकपाल की तरह स्वतंत्र व्यवस्था बने। नियुक्तियों के लिए कॉलेजियम के वर्तमान सिस्टम में बदलाव के लिए संविधान में संशोधन करना होगा, जिसमें राजनीतिक सहमति का अभाव है, लेकिन भ्रष्टाचार रोकने पर कानून बनाने में समाज के साथ संसद में भी सरकार को समर्थन मिलेगा।



सुप्रीम कोर्ट में एनजेएसी कानून की सुनवाई के दौरान केएन गोविंदाचार्य की अर्जी पर बहस के दौरान हमने कहा था कि अफसर, विधायक, सांसद और मंत्री की तरह जजों को भी नियुक्ति के पहले शपथ-पत्र देना चाहिए। संविधान की तीसरी अनुसूची और साल-1954 और 1958 के कानून के अनुसार, शपथ-पत्र को तीन हिस्सों में बांटा जा सकता है। पहले हिस्से में जज और उनके परिवारजनों की चल और अचल संपत्तियों का विवरण। दूसरे हिस्से में जज, वरिष्ठ वकील, राज्य और केंद्र सरकार के मंत्री और बड़े अधिकारियों के विवरण से जज बनने वाले उम्मीदवारों के रिश्ते का खुलासा हो। तीसरे हिस्से में यह घोषणा कि गलत या अधूरा शपथ-पत्र देने पर महाभियोग की कठिन प्रक्रिया के बगैर ही प्रशासनिक प्रक्रिया से दागी जजों को हटाया जा सकता है।


एनजेएसी का जस्टिस चैलमेश्वर ने अल्पमत से समर्थन किया था। कुरियन जोसेफ ने बहुमत के फैसले का साथ देने के बावजूद कॉलेजियम की सड़ांध को दूर करने के लिए ग्लास्तनोव यानी पारदर्शिता और पेरोस्त्रोइका यानी पुनर्निर्माण पर जोर दिया था। जजों की नियुक्ति में बड़े पैमाने पर भाई-भतीजावाद के दो बड़े दुष्परिणाम हैं-पहला-नियुक्ति में कुछ खास परिवारों का आधिपत्य होने से समाज के सभी वर्गों का प्रतिनिधित्व नहीं हो पा रहा। दूसरा-कुलीनता पर ज्यादा जोर से युवा और योग्य वकीलों को सफलता नहीं मिलने के साथ गरीब जनता के हिस्से में तारीख आती है। अधिकांश जजों के बच्चे, रिश्तेदार या जूनियर उन्हीं हाईकोर्ट में प्रैक्टिस करते हैं, जिसकी वजह से भ्रष्टाचार बढ़ता है। मर्ज को पहचानते हुए विधि आयोग ने 2009 की 230वीं रिपोर्ट में अदालतों में अंकल जजों के माध्यम से बढ़ रहे भ्रष्टाचार और भाई-भतीजावाद पर गंभीर चिंता व्यक्त की थी।

संसद में सरकारी जवाब के अनुसार, 80 फीसदी से ज्यादा जज उच्च जातियों से जुड़े थे। दूसरी तरफ द प्रिंट की रिपोर्ट में विधि आयोग के अंकल जजों वाली चिंता की पुष्टि होती है। रिपोर्ट के अनुसार, सुप्रीम कोर्ट के 33 में से 20 जज पूर्व जजों और बड़े वकीलों के परिवार से जुड़े हैं। लगभग चार जज बड़े अफसरों और राज्यपाल आदि के परिवार से जुड़े हैं। इस तरह से देश की सर्वोच्च अदालत में लगभग तीन-चौथाई जज बड़े वकील, नेता, अफसर और जजों के परिवारों से जुड़े हैं। शपथ-पत्र के माध्यम से पूरे विवरण सार्वजनिक हों, तो दो-तिहाई से ज्यादा जजों का रिश्ता रसूखदार परिवारों से उजागर होगा। भाई-भतीजावाद और भ्रष्टाचार के साथ इस समस्या का एक दूसरा गंभीर पहलू है। आईआईटी की तर्ज पर बनी नेशनल लॉ यूनिवर्सिटी से हजारों योग्य युवा वकील निकल रहे हैं। देश में 25 लाख से ज्यादा वकीलों के बावजूद जजों के पद खाली रहना दुर्भाग्यपूर्ण है। राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू ने जजों की नियुक्ति के लिए आईएएस की तर्ज पर अखिल भारतीय न्यायिक सेवा के गठन पर जोर दिया है। इससे युवाओं को रोजगार के साथ आम जनता को जल्द न्याय मिलेगा।

महात्मा गांधी ने कहा था कि अधिकारों का समर्पण ठीक है, लेकिन कर्तव्यों की अवहेलना पाप है। न्यायपालिका पर लोगों का भरोसा बरकरार रखने के लिए साल-1997 में सर्वोच्च न्यायालय के सभी न्यायाधीशों ने संपत्ति की स्वैच्छिक तौर पर घोषणा करने का सामूहिक संकल्प लिया, लेकिन उसे सार्वजनिक नहीं किया। अक्तूबर 2009 में स्वैच्छिक तौर पर संपत्ति का विवरण वेबसाइट के माध्यम से सार्वजनिक करने के लिए जजों ने संकल्प लिया। संसदीय समिति ने जजों की संपत्ति की घोषणा को बाध्यकारी करने के लिए कानून में बदलाव की सिफारिश की थी। कानून मंत्री ने राज्यसभा में बताया कि संसदीय समिति की सिफारिशों पर केंद्र सरकार ने सुप्रीम कोर्ट की राय मांगी है। इस बारे में सुप्रीम कोर्ट के जजों की समिति विचार कर रही है।

जस्टिस वर्मा विवाद के बाद यह खबर आई कि सुप्रीम कोर्ट के सभी जजों ने संपत्ति का ब्यौरा सार्वजनिक करने का निर्णय लिया है। कुल 33 जजों में से 30 ने संपत्ति का ब्यौरा दिया है। खबरों के अनुसार, तकनीकी कारणों से जजों की संपत्ति के ब्यौरे की फाइलें वेबसाइट पर सार्वजनिक नहीं हो पा रहीं। सनद रहे कि विवादों के घेरे में आए जस्टिस वर्मा ने संपत्ति का विवरण डमी फाइल के माध्यम से दिल्ली हाईकोर्ट की वेबसाइट पर अपलोड किया था।

25 उच्च न्यायालयों में 769 न्यायाधीश हैं, जिनमें से सिर्फ 95 यानी 12.3 फीसदी जजों ने ही संपत्ति की घोषणा वेबसाइट पर की है। दिल्ली हाईकोर्ट, जहां से विवाद की शुरुआत हुई, वहां 38 जजों में से महज सात ने वेबसाइट पर अपनी संपत्ति की घोषणा की है। पंजाब में 53 में से 30 और हिमाचल प्रदेश में 12 में से 11 जजों ने संपत्ति का विवरण वेबसाइट पर अपडेट करके स्वस्थ परंपरा स्थापित की है। लेकिन इलाहाबाद, पटना, रांची, आंध्र प्रदेश, बॉम्बे, कलकत्ता, गुवाहाटी, गुजरात, मध्य प्रदेश, राजस्थान और उड़ीसा समेत 18 हाईकोर्ट के किसी जज ने संपत्ति का ब्यौरा वेबसाइट पर सार्वजनिक नहीं किया।  
संविधान के संरक्षक जजों को लोकसेवक के कानूनी और नैतिक आदर्शों का पालन करने की जरूरत है। सभी जजों की संपत्ति का सालाना अपडेटेड केंद्रीकृत विवरण लोकपाल के पास होना चाहिए। आम जनता को जल्द न्याय और अर्थव्यवस्था में ईज ऑफ डूइंग को बढ़ाने के लिए इस बारे में सरकार को कानून में जल्द बदलाव की पहल करनी चाहिए।    

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