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कानून बदला है, तंत्र नहीं

Sun, 14 Apr 2013 10:08 PM IST
तवलीन सिंह
तवलीन सिंह Updated Sun, 14 Apr 2013 10:08 PM IST
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law has changed, not mechanism

हम कितनी जल्दी भूल गए हैं निर्भया को। न भूले होते, तो बुलंदशहर में जो हुआ दस साल की एक दलित बच्ची के साथ, वह हो सकता था क्या? निर्भया के बाद जरा भी परिवर्तन आया होता, तो बुलंदशहर के महिला थाने में पुलिस वाले उस बच्ची के साथ इंसानियत से पेश आते। क्या फायदा महिला थाने का, अगर वहां भी वही सुलूक हो पीड़ित महिलाओं के साथ, जो आम थानों में होता है?

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वह बच्ची बाजार से कुछ लाने निकली थी अपनी छोटी भतीजी के साथ। बलात्कारी गुंडा मिला रास्ते में और उसे घसीट कर ले गया किसी खेत में, जहां उस छोटी बच्ची के साथ बर्बरता की गई। वह अपनी मां के साथ बलात्कार की रिपोर्ट लिखवाने कोतवाली गई।
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इस साहस का परिणाम यह हुआ कि पुलिस वालों ने पीड़ित बच्ची को सारी रात लॉकअप में बंद कर दिया। उसकी जांच डॉक्टर से करवाने की तकलीफ भी नहीं की। अगले दिन जब बच्ची को महिला थाने ले जाया गया एफआईआर दर्ज करने, तो वहां भी संवेदना नहीं मिली, सिर्फ सलाह उसके परिवार वालों की दी गई एफआईआर न दर्ज करने की। बात शायद वहीं खत्म हो जाती, अगर टीवी पत्रकारों ने इसे बड़ी खबर न बनाया होता।
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इसके बाद हरकत में आए लखनऊ में बैठे वरिष्ठ पुलिस अधिकारी। और जब अखबारों में खूब हल्ला मचने लगा, तो सर्वोच्च न्यायालय ने दखल दिया। इसके बावजूद बुलंदशहर के पुलिस वालों ने बलात्कारी को गिरफ्तार नहीं किया इस बहाने कि वह फरार हो गया है। इस बात की भी अनदेखी की गई कि 'फरार' गुंडे ने बच्ची के घर पहुंच कर उसके पूरे परिवार को ऐसा धमकाया कि वे गांव छोड़कर भागने की तैयारी करने में लग गए।

बुलंदशहर थोड़ी ही दूर है दिल्ली से, पर इस बच्ची के समर्थन में मोमबत्तियां लिए नहीं पहुंची हैं वे महिलाएं, जो इंडिया गेट पर दिसंबर की ठंडी रातों में बैठी रहती थीं निर्भया के समर्थन में। ऐसा क्यों? शायद इसलिए कि निर्भया की मौत के बाद ही इन शहरी महिलाओं को पता लगा होगा कि देहातों में बलात्कार की घटनाएं रोज होती हैं, क्योंकि बलात्कारियों को न कानून का डर है, न समाज का। उत्तर प्रदेश जैसे राज्य में तो समस्या और भी गंभीर है, क्योंकि पुलिस वाले कानून से ज्यादा डरते हैं अपराधियों से। फिर उत्तर प्रदेश की ही बात क्यों करें, जब अन्य राज्यों की विधानसभाओं में चुनकर आते हैं अपराधी, और संसद का भी यही हाल है।

निर्भया की शर्मनाक हत्या के बाद राजनेताओं ने घड़ियाली आंसू बहाते हुए वायदा किया बलात्कार कानून में सख्ती लाने का और ऐसा हुआ भी। लेकिन ऐसे कानून से कोई फर्क नहीं पड़ने वाला है, जब तक बलात्कारियों को राजनीतिक शरण मिलती रहेगी। कुछ वरिष्ठ पुलिस अधिकारी मेरे दोस्त हैं, और जब भी मिलते हैं, मैं पूछती हूं कि राजनेताओं और अपराधियों के रिश्ते को कैसे तोड़ा जा सकता है। जवाब में वे अक्सर कहते हैं कि इस रिश्ते को तभी तोड़ा जा सकेगा, जब राजनीतिक दल चुनाव आयोग के निर्देश के मुताबिक प्रत्याशी चुनेंगे।

समस्या का हल लेकिन आसान नहीं है। उत्तर प्रदेश और बिहार जैसे राज्यों में राजनीतिक अपराधियों की एक खास औकात होती है। बाहुबली कहलाते हैं ऐसे लोग। उत्तर प्रदेश की बात करें, तो कुंडा मामले के बाद राजा भैया को मंत्री पद से हटा जरूर दिया गया, लेकिन शुरुआत में उनको जेल मंत्री बनाया तो गया था। ऐसे हाल में कानून-व्यवस्था कैसे मजबूत होगी? उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री अगर वास्तव में परिवर्तन लाना चाहते हैं, तो इतना जरूर कर सकते हैं कि बुलंदशहर की घटना से जुड़े उन दोषी पुलिसवालों को जरूर जेल में डालें, जिन्होंने उस बच्ची को लॉकअप में बंद रखा।


निर्भया की कहानी से कुछ सीखा होता हमने, तो जान गए होते कि समस्या कानून में सख्ती लाने की नहीं है, समस्या कानून-व्यवस्था में सख्ती लाने की है। कानून में सख्ती लाना आसान है, कानून-व्यवस्था में सख्ती लाना उस समय तक असंभव रहेगा, जब तक संसद और विधानसभाओं में ऐसे लोगों को बैठने की इजाजत रहेगी, जिनकी असली जगह सलाखों के पीछे है। दोष मतदाताओं का नहीं है, क्योंकि उनको अपराधियों से बचाने वाला कोई नहीं है। दोष है राजनीतिक दलों का, जो टिकट देते हैं गुंडों को।

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