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भूस्खलन: क्यों खिसक रहे हैं पहाड़, आखिर चेतावनियों के प्रति उदासीनता कब तक
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भूस्खलन (फाइल फोटो)
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amar ujala
विस्तार
पिछले महीने महाराष्ट्र की राजधानी मुंबई से लगभग 80 किलोमीटर दूर रायगढ़ जिले के इरशालवाड़ी गांव में पहाड़ी खिसकने से 26 लोगों की मृत्यु हो गई, जबकि लगभग 80 लोगों का पता नहीं चल पाया। जुलाई, 2021 में इसी जिले में महाड तहसील के तलिये गांव में भीषण भूस्खलन में 87 लोगों की जान चली गई थी। जबकि पिछले साल रत्नागिरी के पेसरे बोद्धवाड़ी में 12, समारा के आंबेकर में 11 तथा मीरगांव में छह मौतें हुईं। राज्य के रत्नागिरी, कर्जत, दाभौल, लोनावाला आदि में पहाड़ सरकने से बहुत नुकसान हुआ।
बीते एक दशक से महाराष्ट्र के बड़े हिस्से में बारिश में भूस्खलन से भारी नुकसान हो रहा है। दूरस्थ अंचलों की तो बात छोड़ें, मुंबई में पिछले साल चेंबूर के भारत नगर में पहाड़ के तराई में स्थित छोटे-छोटे घरों पर एक बड़ी चट्टान खिसक कर गिर पड़ी थी।
भारतीय भूवैज्ञानिक सर्वेक्षण ने 2020 में बताया था कि महाराष्ट्र में 225 गांव ऐसे हैं, जहां कभी भी पहाड़ धसक सकते हैं। इनमें से 23 गांव पुणे जिले में ही हैं। वैज्ञानिकों ने वैसे गांवों के बारे में चेतावनी जारी की, जो एक तो पहाड़ की ढलान पर बसे हैं, दूसरे, पहाड़ किसी पत्थर का न होकर लाल मिटटी का है। 30 जुलाई, 2014 को पुणे जिले के अंबेगांव तहसील के मालिण गांव में यदि बस का ड्राइवर नहीं पहुंचता, तो पता भी नहीं चलता कि कभी वहां बस्ती भी हुआ करती थी। वह गांव एक पहाड़ के नीचे था और बारिश में ऊपर से मलबा गिरने पर पूरा गांव ही दब गया था। पुलिस की जांच से पता चला था कि पहाड़ खिसकने की वजह उस बेजान खड़ी संरचना के प्रति लापरवाही ही थी। वर्षों से उस पहाड़ की अंधाधुंध खुदाई नजदीक बन रही सड़क के लिए हो रही थी, जिससे पहाड़ नीचे से कट गया था। तेज बरसात हुई, तो वह ढह गया।
मालिण गांव की त्रासदी पर वैज्ञानिकों की टीम ने शोध किया, जो कि बाद में प्रसिद्ध अंतरराष्ट्रीय जर्नल, टेलर ऐंड फ्रांसिस के 2021 के पहले अंक में छपा। उसमें बताया गया कि यह गांव घोड़ नदी की सहायक मौसमी नदी के पास बसा था। गांव वाले पहाड़ी की ढाल पर बरसाती पानी रोककर धान की खेती करते थे। ग्रामीणों ने हरियाली काटकर भी खेत की जमीन बनाई थी। वहां पानी निकलने के रास्ते बंद थे, जिससे लगातार पानी रिसने से पहाड़ की मिट्टी ढीली हो चुकी थी। दुखद यह है कि चेतावनियां, बचाव के उपाय और संवेदनशील गांवों को नई जगह स्थापित करने की योजनाएं तब धरी की धरी रह जाती हैं, जब अचानक किसी रात इरशालवाड़ी जैसे किसी गांव में तबाही होती है।
भारत में 15 प्रतिशत भूभाग भूस्खलन के प्रति संवेदनशील हैं और भूस्खलन से सर्वाधिक प्रभावित हिस्से हिमालय, पश्चिमी घाट, नीलगिरि और विंध्य हैं। जो पर्यटन, धर्म और व्यापार के केंद्र हैं, वहां पहाड़ खिसकने पर उसकी चर्चा देर तक और दूर तक होती है। पर महाराष्ट्र के उन गांवों में, जहां कायदे से पहुंच मार्ग भी नहीं है, तबाही होने पर मुआवजे की खानापूर्ति काफी समझी जाती है।
महाराष्ट्र के जिन इलाकों में भूस्खलन हो रहा है, उनमें से अधिकांश सह्याद्रि पर्वतमाला के करीब हैं। उन सभी स्थानों पर अचानक एक दिन में तीन से चार सौ मिलीमीटर बरसात हो गई। पहाड़ों पर बस्ती बसाने और खेती के लिए वहां बेशुमार पेड़ काटे गए। जब मिट्टी पर पानी की बड़ी बूंदें गिरती हैं, तब ये मिट्टी को काटती हैं, फिर बहती मिट्टी करीबी जल निधि- नदी-जोहड़-तालाब को उथला करती है। इनसे पहाड़ कमजोर होता है। इन क्षेत्रों में निर्माण कार्य और खनन के लिए ताकतवर विस्फोटों का इस्तेमाल लंबे समय से हो रहा है।
दो साल पहले केंद्रीय पृथ्वी विज्ञान मंत्रालय द्वारा तैयार पहली जलवायु परिवर्तन मूल्यांकन रिपोर्ट में स्पष्ट चेतावनी दी गई थी कि समुद्र के आसपास के क्षेत्र और रत्नागिरी के पहाड़ी इलाके बदलते मौसम के लिए सर्वाधिक संवेदनशील हैं। आज जरूरत है कि नंगी पहाड़ियों पर हरियाली की चादर बिछाई जाए, पहाड़ और नदी के करीब बड़े निर्माण कार्यों से परहेज किया जाए और सड़क, पुल या बांध के लिए इन नैसर्गिक संरचनाओं से छेड़छाड़ न हो। आने वाले दिनों में जलवायु परिवर्तन के दुष्प्रभाव और गहराएंगे, ऐसे में, पहाड़ों को सहेजना जरूरी है।